सप्तम भाव में बैठा शनि छीन लेगा वैवाहिक सुख।।

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Saptamasth Shani and married life
Saptamasth Shani and married life

सप्तम भाव में बैठा शनि छीन लेगा वैवाहिक सुख, इस दुर्योग के निवारण का उपाय ।। Saptamasth Shani and married life.

हैल्लो फ्रेण्ड्सzzz,
मित्रों, भगवान श्री कृष्ण कहते हैं, कि – त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः । कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्‌ ।। (गीता १६/२१) अर्थात जीवात्मा का विनाश करने वाले “काम, क्रोध और लोभ” यह तीन प्रकार के द्वार मनुष्य को नरक में ले जाने वाले हैं । इसलिये मनुष्य को इन तीनों से दूर रहने का प्रयास करना चाहिये ।।

एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः । आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम्‌ ।। (गीता १६/२२) अर्थात जो मनुष्य इन तीनों नरक के द्वारों से मुक्त हो जाता है, वह मनुष्य अपनी आत्मा में स्थित रहकर संसार में कल्याणकारी कर्म का आचरण करता हुआ परमात्मा रूपी परमगति मोक्ष को प्राप्त हो जाता है ।।

मित्रों, जीवात्मा जल कि एक बूँद है और परमात्मा सागर है । बूँद का सागर बनना ही बूँद के जीवन का एकमात्र लक्ष्य होता है । बूँद जब-तक स्वयं के अस्तित्व को सागर के अस्तित्व से अलग समझती रहती है तब-तक बूँद के अन्दर सागर से मिलने की कामना उत्पन्न ही नहीं होती है ।।

तथा बूँद में इतना सामर्थ्य भी नहीं होता है कि वह अपने बल पर सागर से मिल सके । बूँद में जब-तक सागर से मिलने की कामना के अतिरिक्त अन्य कोई कामना शेष नहीं रह जाती है तब-तक बूँद का सागर से मिलन असंभव ही होता है । परन्तु जब बूँद में सागर से मिलने की पवित्र कामना उत्पन्न होती है तो एक दिन सागर की एक ऎसी लहर आती है जो बूँद को स्वयं में समाहित कर लेती है तब वही बूँद सागर बन जाती है ।।

मित्रों, जिस प्रकार पहली कक्षा को पास किये बिना कोई भी छात्र दूसरी कक्षा को पास नहीं कर सकता है । ठीक उसी प्रकार कामनाओं से ही सही धर्म के मार्ग में प्रवृत्त हुये बिना कोई आध्यात्मिकता के मार्ग पर नहीं चल सकता । इच्छाओं की पूर्ति होने पर ही कामनाओं का अन्त संभव होता है । लेकिन एक इच्छा पूर्ण होने के पश्चात नवीन कामना के उत्पन्न होने के कारण कामनाओं का अंत नहीं हो पाता है ।।

Saptamasth Shani and married life

इच्छाओं के त्याग करने से कामनाओं का मिटना असंभव जैसा होता है । परन्तु आज हम गृहस्थ जीवन कि सबसे बड़ी आवश्यता विवाह और विवाह में बाधक सप्तमस्थ शनिदेव के विषय में बात करेंगे । सप्तम भाव कुण्डली में सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है । लग्न से सातवाँ भाव ही दाम्पत्य एवं विवाह के लिए कारक माना है । इस भाव एवं इस भाव के स्वामी के साथ ग्रहों की स्थिति एवं दृष्टि सम्बन्ध के अनुसार उस जातक पर शुभ-अशुभ प्रभाव पड़ता है ।।

मित्रों, सप्तम भाव में शनि का होना विवाह और वैवाहिक जीवन के लिए शुभ संकेत नहीं माना जाता । इस भाव में शनि का होना ही व्यक्ति की शादी उसकी सामान्य आयु से देरी से होता है । सप्तम भाव में शनि अगर नीच राशि में हो तो यह संभावना बढ़ जाती है । यहाँ तक कि व्यक्ति काम पीड़ित होकर किसी ऐसे व्यक्ति से विवाह करता है जो उम्र में उससे अत्यधिक बड़ा हो ।।

शनि के साथ सूर्य की युति अगर सप्तम भाव में हो तो विवाह देर से होता है एवं कलह के कारण पूरा परिवार अशांत रहता है । चन्द्रमा के साथ शनि की युति होने पर व्यक्ति अपने जीवनसाथी के प्रति प्रेम नहीं रखता एवं किसी अन्य के प्रेम में गृह कलह को जन्म देता है । सप्तम शनि एवं उससे युति बनाने वाले ग्रह विवाह एवं गृहस्थी के लिए सुखकारक नहीं होते हैं ।।

मित्रों, नवमांश अथवा जन्मकुण्डली में जब शनि और चन्द्र की युति हो तो शादी 30 वर्ष की आयु के बाद ही करनी चाहिये, क्योंकि इससे पहले शादी की संभावना बनती ही नहीं है । जिनकी कुण्डली में चन्द्रमा सप्तम भाव में होता है और शनि लग्न में उनके साथ भी यही स्थिति होती है । इस प्रकार के जातकों की शादी ज्यादातर असफल होने की भी संभावना प्रबल होती है ।।

किसी भी कुण्डली में यदि लग्न से द्वादश शनि हो और सूर्य द्वितीय हो एवं लग्न यदि कमजोर हो तो उनकी शादी बहुत विलंब से होती है । ग्रहों की इस प्रकार कि स्थिति में ऐसे हालात बन जाता है कि जातक शादी ही नहीं करता । किसी कन्या की कुण्डली में यदि शनि सूर्य या चन्द्रमा से युति बना रहा हो अथवा दृष्ट होकर लग्न या सप्तम में हो तो उस जातक की शादी में भी बहुत सी बाधायें आती है ।।

मित्रों, शनि जिनकी कुण्डली में छठे भाव में, सूर्य अष्टम में तथा सप्तमेश कमजोर अथवा पाप पीड़ित हो तो उनके विवाह में भी काफी बाधायें आती हैं । शनि और राहु की युति जब सप्तम भाव में होती है तब विवाह सामान्य से बहुत अधिक आयु में होता है, यह एक ग्रहण योग भी होता है ।।

इस प्रकार की स्थिति तब भी होती है जब शनि और राहु की युति लग्न में होती है और वह सप्तम भाव पर दृष्टि डालते हैं । जन्मकुण्डली में शनि-राहु की युति हो तथा सप्तमेश एवं शुक्र यदि कमजोर हो तो विवाह अति विलंब से होता है । जिन कन्याओं के विवाह में शनि के कारण देरी हो उन्हें हरितालिका व्रत करना चाहिये । वर अथवा कन्या की जन्मकुण्डली के ग्रह स्थिति के अनुसार उनकी शान्ति करना ज्यादा लाभदायक होता है ।।

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।।। नारायण नारायण ।।।

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