अथ श्रीशनि वज्रपञ्जर कवचम् ।।

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Shanidev Ko tel Kyon Chadhate Hai

शनि की बुरी से बुरी दशा की निवृत्ति हेतु इस शनि वज्र पञ्जर स्तोत्रं अथवा कवचम् का पाठ करें । इसकी विधि ये है, कि आप शनिदेव की प्रतिमा का पूजन मात्र करके इस स्तोत्र का परायण कर सकते हैं । “ॐ शं शनैश्चरायै नम:” इस मन्त्र से अगर सम्पुटित करके ग्यारह आवृत्ति करें तो और भी शीघ्र लाभ मिलेगा ।।

अथ श्रीशनि वज्रपञ्जर कवचम् ।। Shanivajra Panjara Kavacham.

श्री गणेशाय नमः ।।

नीलाम्बरो नीलवपुः किरीटी गृध्रस्थितस्त्रासकरो धनुष्मान् ।
चतुर्भुजः सूर्यसुतः प्रसन्नः सदा मम स्याद् वरदः प्रशान्तः ॥१॥

ब्रह्मा उवाच:-

शृणुध्वमृषयः सर्वे शनिपीडाहरं महत् ।
कवचं शनिराजस्य सौरेरिदमनुत्तमम् ॥२॥

कवचं देवतावासं वज्रपञ्जरसञ्ज्ञकम् ।
शनैश्चरप्रीतिकरं सर्वसौभाग्यदायकम् ॥३॥

ॐ श्रीशनैश्चरः पातु भालं मे सूर्यनन्दनः ।
नेत्रे छायात्मजः पातु पातु कणौं यमानुजः ॥४॥

नासां वैवस्वतः पातु मुखं मे भास्करः सदा ।
स्निग्धकण्ठश्च मे कण्ठं भुजौ पातु महाभुजः ॥५॥

स्कन्धौ पातु शनिश्चैव करौ पातु-शुभप्रदः ।
वक्षः पातु यमभ्राता कुक्षिं पात्वसितस्तथा ॥६॥

नाभिं ग्रहपतिः पातु मन्दः पातु कटिं तथा ।
ऊरू ममान्तकः पातु यमो जानुयुगं तथा ॥७॥

पदौ मन्दगतिः पातु सर्वाङ्गं पातु पिप्पलः ।
अङ्गोपाङ्गानि सर्वाणि रक्षेन् मे सूर्यनन्दनः ॥८॥

इत्येतत् कवचं दिव्यं पठेत् सूर्यसुतस्य यः ।
न तस्य जायते पीडा प्रीतो भवति सूर्यजः ॥९॥

व्यय-जन्म-द्वितीयस्थो मृत्युस्थानगतोऽपि वा ।
कलत्रस्थो गतो वाऽपि सुप्रीतस्तु सदा शनिः ॥१०॥

अष्टमस्थे सूर्यसुते व्यये जन्मद्वितीयगे ।
कवचं पठते नित्यं न पीडा जायते क्वचित् ॥११॥

इत्येतत्कवचं दिव्यं सौरेर्यन्निर्मितं पुरा ।
द्वादशाऽष्टमजन्मस्थदोषान्नाशयते सदा ।
जन्मलग्नस्थितान् दोषान् सर्वान्नाशयते प्रभुः ॥१२॥

।। इति श्री ब्रह्माण्डपुराणे ब्रह्म-नारदसंवादे शनिवज्रपञ्जरकवचम् सम्पूर्णम् ।।

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