HomeVedic Articlesजीवित्पुत्रिका (जितिया) व्रत कथा एवं विधि।।

जीवित्पुत्रिका (जितिया) व्रत कथा एवं विधि।।

जीवित्पुत्रिका (जितिया) व्रत कथा एवं विधि।। Jitiya Vrat Katha and Vidhi.

व्रत कथा सुनने की परंपरा का परिचय।। Introduction.

मित्रों, जितिया अर्थात जीवित्पुत्रिका व्रत में एक विशेष नियम अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह व्रत तभी पूर्ण माना जाता है, जब व्रती उपवास के साथ-साथ इससे जुड़ी कथा का श्रवण भी अवश्य करे। यह कथा दो भागों में प्रचलित है, एक भाग राजा जीमूतवाहन से जुड़ा है। जिनकी पूजा इस व्रत में की जाती है, तथा दूसरा भाग चील तथा सियारिन की लोककथा है। जो इस व्रत को नियमपूर्वक तथा श्रद्धा से करने की सीख देती है।।

बिहार, झारखंड तथा उत्तर प्रदेश के अधिकांश क्षेत्रों में व्रत के दिन महिलाएं एक साथ बैठकर इसी चील-सियारिन की कथा को सुनती अथवा सुनाती हैं। यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से आगे बढ़ती रही है। आज भी गाँवों तथा शहरों दोनों में समान श्रद्धा के साथ निभाई जाती है। कथा के बिना व्रत को अधूरा माना जाता है। चाहे उपवास कितनी भी कठोरता से क्यों न रखा गया हो।।

मित्रों, यह समझना भी आवश्यक है कि इस व्रत की विधि भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है जितनी इस व्रत की कथा। मिट्टी अथवा गोबर से चील तथा सियारिन की प्रतिमाएं बनाना चाहिए। साथ ही कुशा से जीमूतवाहन की प्रतिमा भी स्थापित करना चाहिए। उसके उपरान्त विधिपूर्वक एक साथ पूजा करना चाहिए। यह सभी चरण इस व्रत का अभिन्न अंग माने जाते हैं।।

तो चलिए आज हम विस्तार से जानेंगे कि चील तथा सियारिन की संपूर्ण कथा क्या है। इससे क्या सीख मिलती है। जीमूतवाहन की पूजा किस प्रकार की जाती है। तथा संपूर्ण व्रत-विधि किन-किन चरणों में संपन्न होती है। यह सब हम विधिपूर्वक आज देखेंगे। और इन सभी बातों का विधिपूर्वक वर्णन करेंगे।।

चील और सियारिन की कथा।। The Story of the Eagle and the Jackal.

मित्रों, कथा के अनुसार एक घने जंगल में एक विशाल पाकड़ के वृक्ष पर एक चील रहती थी। तथा उसी वृक्ष के नीचे एक सियारिन का बसेरा था। दोनों में गहरी मित्रता थी। एक दिन दोनों ने कुछ स्त्रियों को श्रद्धापूर्वक जितिया व्रत करते देखा। तो उनके मन में भी यह व्रत रखने की इच्छा जागृत हुई। दोनों ने भगवान जीमूतवाहन की पूजा-अर्चना करते हुए निर्जला व्रत रखने का संकल्प लिया।।

परन्तु जिस दिन व्रत रखा जाना था, उसी दिन नगर के एक बड़े व्यापारी का निधन हो गया। तथा उसका दाह-संस्कार पास के ही श्मशान में होने लगा। मांस की गंध पाकर सियारिन अपनी भूख पर नियंत्रण नहीं रख पाई। तथा चोरी-छिपे जाकर उसने कुछ मांस खा लिया। जिससे उसका व्रत भंग हो गया। इसके विपरीत चील ने पूर्ण संयम तथा श्रद्धा बनाए रखी। तथा नियमपूर्वक अगले दिन विधिवत पारण किया।।

समय बीतने पर दोनों सहेलियों ने अगले जन्म में एक ब्राह्मण परिवार में पुत्रियों के रूप में जन्म लिया। जहाँ उनके पिता का नाम भास्कर था। चील बड़ी बहन बनी, जिसका नाम शीलवती रखा गया। तथा उसका विवाह बुद्धिसेन नामक सुयोग्य वर से हुआ। सियारिन छोटी बहन बनी, जिसका नाम कपुरावती रखा गया, तथा उसका विवाह नगर के राजा मलयकेतु से हुआ।।

मित्रों, आगे चलकर शीलवती के सभी संतान स्वस्थ, दीर्घायु तथा सुखी रहे। क्योंकि पूर्वजन्म में उसने व्रत पूर्ण श्रद्धा तथा नियम से निभाया था। परन्तु कपुरावती की संतान बार-बार अकाल मृत्यु का शिकार होती रही। क्योंकि पूर्वजन्म में उसका व्रत अधूरा रह गया था। अंततः जब कपुरावती को अपने पूर्वजन्म की इस भूल का स्मरण हुआ। तो उसने भी श्रद्धापूर्वक जितिया व्रत करना आरंभ किया। जिसके पश्चात उसकी संतान को भी दीर्घायु का सुख प्राप्त हुआ।।

कथा की सीख।। The Moral of the Story.

मित्रों, यह कथा हमें यह गहरा संदेश देती है, कि किसी भी व्रत का वास्तविक फल केवल उसे आरंभ करने से नहीं। अपितु उसे पूर्ण श्रद्धा, नियम तथा संयम के साथ निभाने से ही प्राप्त होता है। शीलवती अर्थात चील का धैर्य तथा कपुरावती अर्थात सियारिन की चूक, दोनों मिलकर यह सिखाती हैं कि संतान की भलाई के लिए किया गया संकल्प कभी भी अधूरा नहीं छोड़ना चाहिए।।

यही कारण है कि आज भी इस व्रत के दिन महिलाएं मिट्टी अथवा गोबर से चील तथा सियारिन की छोटी प्रतिमाएं बनाकर उनकी पूजा करती हैं। तथा इस कथा को सुनकर अपने संकल्प को दृढ़ बनाती हैं। और बिना इस कथा को सुने भी यह व्रत पूर्ण नहीं माना जाता।।

जीमूतवाहन की पूजा-विधि।। Puja Vidhi of Jimutavahana.

मित्रों, व्रत के दिन घर के पूजा-स्थान में कुशा से जीमूतवाहन देवता की प्रतिमा बनाई जाती है। अथवा उनका चित्र स्थापित किया जाता है। इसके साथ-साथ मिट्टी अथवा गोबर से चील तथा सियारिन की छोटी प्रतिमाएं भी बनाई जाती हैं। तथा इन्हें एक साथ चौकी पर विराजमान किया जाता है।।

पूजा में जीमूतवाहन को धूप, दीप, चावल, पुष्प तथा नैवेद्य अर्पित किया जाता है। तथा चील एवं सियारिन की प्रतिमाओं के समक्ष भी विधिवत आरती की जाती है। पूजा के पश्चात ऊपर बताई गई संपूर्ण कथा का श्रवण किया जाता है। इसके बिना पूजा अधूरी मानी जाती है। पूजा संपन्न होने के पश्चात स्त्रियाँ एक-दूसरे को सिंदूर तथा प्रसाद देकर सुहाग एवं संतान की दीर्घायु की शुभकामनाएं देती हैं।।

व्रत के पारण से जुड़ी विशेष परंपरा।। Special Tradition Associated with the Vrat Paran.

मित्रों, व्रत के पारण के पश्चात महिलाएं गले में लाल रंग का धागा अर्थात जितिया धारण करती हैं। जिसे कई क्षेत्रों में जितिया का लॉकेट भी कहा जाता है। यह धागा संतान की सुरक्षा तथा दीर्घायु का प्रतीक भी माना जाता है। तथा इसे श्रद्धापूर्वक अगले वर्ष तक धारण किए रखा जाता है।।

पारण के दिन पारंपरिक व्यंजन जैसे मड़ुआ की रोटी, नोनी का साग तथा तोरई की सब्जी विशेष रूप से बनाए जाते हैं। तथा नहाय-खाय के दिन भी इन्हीं पारंपरिक व्यंजनों का सेवन किया जाता है। यह भोजन-परंपरा इस क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान का भी अभिन्न अंग मानी जाती है।।

लेख का निष्कर्ष।। Conclusion.

मित्रों, जितिया व्रत की कथा तथा विधि, दोनों मिलकर हमें यह सिखाते हैं कि संतान के प्रति एक माँ का समर्पण कितना गहरा तथा अटूट होता है। चील-सियारिन की कथा नियम तथा संयम का महत्व भी बताती है। जबकि जीमूतवाहन की पूजा त्याग तथा करुणा की सीख देती है।।

जो माताएं इस कथा को श्रद्धापूर्वक सुनकर, विधिपूर्वक व्रत तथा पूजा संपन्न करती हैं। वे न केवल अपनी संतान की दीर्घायु की कामना पूर्ण होते देखती हैं। अपितु इस परंपरा को आगे की पीढ़ी तक भी सहेजकर ले जाती हैं। इसलिए इस पावन व्रत के दिन कथा-श्रवण को कभी भी अनदेखा नहीं करना चाहिए।।

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