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दीवाली या धनतेरस लक्ष्मी पूजन कब करें।।

दीवाली या धनतेरस लक्ष्मी पूजन कब करें।। Diwali Or Dhanteras Lakshmi Puja.

लक्ष्मी पूजन के दिन का परिचय।। Introduction.

मित्रों, प्रत्येक वर्ष दीपोत्सव के समय अनेक श्रद्धालुओं के मन में यह प्रश्न उठता है। कि माँ लक्ष्मी का मुख्य पूजन धनतेरस के दिन करें अथवा दीपावली की रात्रि में। इसका कारण यह है कि दोनों ही पर्वों में माँ लक्ष्मी तथा कुबेर देवता का पूजन किया जाता है। और दोनों ही पर्व धन-समृद्धि से जुड़े हुए हैं। इसी कारण अनेक जातक भ्रमित हो जाते हैं कि वास्तविक लक्ष्मी-पूजन का दिन कौन-सा माना जाए।।

परंतु मित्रों, शास्त्रीय परंपरा में दोनों पर्वों का उद्देश्य तथा विधान पृथक होता है। धनतेरस मुख्य रूप से भगवान धन्वंतरि, कुबेर देवता तथा यमराज के निमित्त दीपदान एवं शुभ खरीदारी का पर्व होता है। जबकि कार्तिक अमावस्या की रात्रि को माँ लक्ष्मी, श्रीगणेश तथा कुबेर देवता का विधिवत मुख्य लक्ष्मी-पूजन किया जाता है।।

परन्तु आप बिलकुल घबराएँ नहीं। आज हम इसी विषय पर विस्तार से समझेंगे। कि दोनों दिनों में पूजन का क्या अंतर है। वर्ष 2026 में किस दिन कौन-सा पूजन करना चाहिए। तथा सामान्य गृहस्थ के लिए सर्वश्रेष्ठ विधान क्या है। इतना ही नहीं आज हम दोनों दिनों के मुहूर्त भी आपलोगों को बताएँगे। ताकि आप बिना किसी भ्रम के पूजन कर सकें।।

संक्षिप्त उत्तर।। Short Answer.

मित्रों, यदि आप माँ लक्ष्मी का मुख्य एवं विधिवत पूजन अर्थात गणेश-लक्ष्मी-कुबेर पूजन। बही-खाता तथा तिजोरी पूजन करना चाहते हैं। तो वह दीपावली की रात्रि को प्रदोष काल में ही किया जाता है।।

धनतेरस पर भी माँ लक्ष्मी तथा कुबेर का पूजन किया जा सकता है। किंतु उसका मुख्य स्वरूप धन्वंतरि-पूजन, यम-दीपदान तथा शुभ खरीदारी होता है। अतः दोनों पर्वों को एक-दूसरे का विकल्प नहीं, बल्कि पूरक समझना चाहिए।।

वर्ष 2026 में दोनों पर्वों की तिथि एवं मुहूर्त।। Dates And Muhurat Of Both Festivals In 2026.

मित्रों, वर्ष 2026 में धनतेरस 6 नवंबर शुक्रवार को है। मुंबई के रेखांश के अनुसार पूजा का शुभ मुहूर्त सायं लगभग 6 बजकर 2 मिनट से रात्रि 7 बजकर 57 मिनट तक। तथा प्रदोष काल सायं लगभग 5 बजकर 33 मिनट से रात्रि 8 बजकर 9 मिनट तक रहेगा।।

वहीं दीपावली का मुख्य लक्ष्मी-पूजन 8 नवंबर रविवार की संध्या को होगा। मुंबई के रेखांश के अनुसार इसका सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त सायं 18:02 PM से लेकर 20:34 PM तक रहेगा। जिसमें प्रदोष काल तथा स्थिर वृषभ लग्न का संयोग भी है।।

निशीथ काल का मुहूर्त रात्रि लगभग 23:39 PM से 24:31 PM तक बताया गया है। परन्तु फिर भी मैं आपसे कहूँगा की स्थान-भेद से इन समयों में कुछ मिनटों का अंतर संभव है। अतः अपने नगर का स्थानीय पंचांग अवश्य देखें।।

दीपावली की रात्रि को मुख्य लक्ष्मी-पूजन क्यों।। Why Main Lakshmi Puja On The Night Of Diwali.

मित्रों, दीपावली का पर्व कार्तिक अमावस्या की रात्रि से जुड़ा है। और इस रात्रि को माँ लक्ष्मी की विशेष आराधना का काल माना गया है। मान्यता है कि इस रात्रि माँ लक्ष्मी भ्रमण करती हैं। तथा जिस घर में स्वच्छता, दीप-प्रकाश तथा श्रद्धापूर्ण पूजन होता है। वहाँ निवास करती हैं।।

इसके साथ ही निर्णय-ग्रंथों में इस पूजन के लिए प्रदोष काल की प्रधानता तथा स्थिर लग्न का महत्व बताया गया है। स्थिर लग्न में पूजन माँ लक्ष्मी के स्थायी वास का कारक माना जाता है। इसी कारण गणेश-लक्ष्मी की मुख्य मूर्ति-पूजा, कलश-स्थापना। कुबेर-पूजन तथा व्यापारियों का बही-खाता पूजन दीपावली की रात्रि में ही किया जाता है।।

धनतेरस पर क्या पूजन किया जाता है।। What Is Worshipped On Dhanteras.

मित्रों, धनतेरस पर समुद्र-मंथन से प्रकट हुए भगवान धन्वंतरि का पूजन आरोग्य की कामना से किया जाता है। इसी दिन कुबेर देवता का पूजन धन-संचय की भावना से, तथा अकाल-मृत्यु के निवारण के लिए यमराज के निमित्त दक्षिण दिशा में दीपदान किया जाता है। साथ ही स्वर्ण, रजत, पात्र तथा झाड़ू आदि की शुभ खरीदारी भी इसी दिन की जाती है।।

धनतेरस की संध्या को माँ लक्ष्मी तथा गणेश जी का सामान्य पूजन भी किया जाता है। जिसके उपरान्त ही दीपोत्सव का शुभारंभ होता है। किंतु इसे मुख्य लक्ष्मी-पूजन नहीं माना जाता है। क्योंकि मुख्य पूजन की विधि तथा काल दीपावली की रात्रि के लिए ही निर्धारित है।।

दोनों दिनों के पूजन का तुलनात्मक अंतर।। Comparison Of Worship On Both Days.

मित्रों, धनतेरस के मुख्य देवता भगवान धन्वंतरि बताये गये हैं। जबकि दीपावली की मुख्य देवी माता लक्ष्मी बतायी गयी हैं। धनतेरस का पूजन त्रयोदशी तिथि के प्रदोष काल में होता है। जबकि दीपावली का पूजन अमावस्या तिथि के प्रदोष काल में किया जाता है। धनतेरस पर खरीदारी तथा यम देवता के लिए दीपदान प्रमुख होता है। जबकि दीपावली पर कलश-स्थापना, गणेश-लक्ष्मी-कुबेर पूजन तथा बही-खाता पूजन प्रमुख है।।

धनतेरस का फल आरोग्य, धन-संचय तथा अकाल-मृत्यु के भय के निवारण से जुड़ा होता है। जबकि दीपावली का पूजन स्थायी लक्ष्मी-वास, वैभव तथा समृद्धि की कामना से किया जाता है। अतः दोनों दिनों के पूजन से पृथक-पृथक किंतु परस्पर पूरक फल की प्राप्ति मानी गई है।।

सामान्य गृहस्थ के लिए सर्वश्रेष्ठ विधान।। Best Approach For A General Householder.

मित्रों, सामान्य गृहस्थ को चाहिए कि वह धनतेरस की संध्या को प्रदोष काल में भगवान धन्वंतरि तथा कुबेर देवता का पूजन करे। यम देवता के लिए दीपदान करे तथा सामर्थ्य के अनुसार शुभ वस्तु की खरीदारी करे। इसके पश्चात दीपावली की रात्रि को प्रदोष काल तथा वृषभ लग्न के मुहूर्त में श्रीगणेश-लक्ष्मी-कुबेर का विधिवत मुख्य पूजन करे।।

यदि किसी कारणवश कोई एक ही पूजन संभव हो, तो दीपावली की रात्रि के लक्ष्मी-पूजन को प्राथमिकता देनी चाहिए। जो व्यापारी बही-खाता अथवा नवीन प्रतिष्ठान का पूजन करना चाहते हैं। उनके लिए भी दीपावली की रात्रि ही विशेष मानी गई है। इस विषय में अपनी कुल-परंपरा तथा विद्वान ब्राह्मण के मार्गदर्शन को ही सर्वोपरि मानना चाहिए।।

पूजन में सावधानियाँ।। Precautions In Worship.

मित्रों, दोनों ही पूजन से पहले घर की स्वच्छता, मुख्य द्वार पर रंगोली एवं तोरण तथा दीप-प्रज्वलन का विशेष ध्यान रखें। पूजन के दिन क्रोध, कलह तथा तामसिक आहार से बचना चाहिए।।

साथ ही सभी के साथ प्रेमपूर्वक व्यवहार करना चाहिए। धन-संबंधी उपायों के साथ-साथ ईमानदारी तथा आर्थिक अनुशासन को भी बनाए रखें। क्योंकि लक्ष्मी की स्थायी कृपा इन्हीं से बनी रहती है।।

शास्त्रीय प्रमाण।। Scriptural References.

मित्रों, भगवान धन्वंतरि के प्राकट्य तथा माँ लक्ष्मी की आराधना का वर्णन श्रीमद्भागवत महापुराण, विष्णु पुराण, पद्म पुराण तथा स्कंद पुराण जैसे ग्रंथों में प्राप्त होता है। माँ लक्ष्मी के पूजन हेतु श्री सूक्त का विशेष महत्व होता है।।

इस प्रकार के किसी भी पर्व का निर्णय तथा प्रदोष काल के नियम धर्मसिंधु एवं निर्णयसिंधु जैसे निर्णय-ग्रंथों में बताए गए हैं। परन्तु क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार पूजन-विधि में सूक्ष्म भेद संभव हो सकता है।।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न।। Frequently Asked Questions. (FAQ)

प्रश्न 1. क्या धनतेरस पर लक्ष्मी पूजन करने से दीपावली पूजन की आवश्यकता नहीं रहती।। Does Lakshmi Puja On Dhanteras Remove The Need For Diwali Puja.

उत्तर:- नहीं, धनतेरस का पूजन तथा दीपावली का पूजन पृथक-पृथक होता है। मुख्य माता लक्ष्मी का पूजन दीपावली की रात्रि को प्रदोष काल में किया जाता है। जबकि धनतेरस धन्वंतरि-पूजन, यम देवता के लिए दीपदान तथा खरीदारी का मुख्य पर्व होता है।।

प्रश्न 2. यदि एक ही दिन पूजन करना हो, तो किसे चुनें।। If Only One Day Is Possible, Which To Choose.

उत्तर:- यदि कोई एक ही पूजन संभव हो, तो दीपावली की रात्रि के मुख्य लक्ष्मी-पूजन को प्राथमिकता देनी चाहिए। क्योंकि इसमें श्रीगणेश-लक्ष्मी-कुबेर तथा बही-खाता पूजन का पूर्ण विधान है।।

प्रश्न 3. वर्ष 2026 में धनतेरस तथा दीपावली किस दिन है।। On Which Days Are Dhanteras And Diwali In 2026.

उत्तर:- वर्ष 2026 में धनतेरस 6 नवंबर शुक्रवार को तथा दीपावली 8 नवंबर रविवार को है। दोनों दिनों का पूजन संध्या के प्रदोष काल में किया जाता है।।

प्रश्न 4. क्या धनतेरस की खरीदारी के बिना दीपावली पूजन अधूरा है।। Is Diwali Puja Incomplete Without Dhanteras Shopping.

उत्तर:- नहीं, धनतेरस की खरीदारी एक शुभ परंपरा है। परंतु दीपावली का पूजन उस पर निर्भर नहीं है। सामर्थ्य के अनुसार ही खरीदारी करनी चाहिए।।

प्रश्न 5. लक्ष्मी-पूजन के लिए कौन-सा मुहूर्त सबसे श्रेष्ठ माना जाता है।। Which Muhurat Is Best For Lakshmi Puja.

उत्तर:- सामान्य गृहस्थों के लिए दीपावली के दिन प्रदोष काल तथा स्थिर वृषभ लग्न का संयुक्त मुहूर्त श्रेष्ठ माना गया है। जो वर्ष 2026 में मुंबई के रेखांश के अनुसार सायं लगभग 06:02 से 08:34 PM तक है।।

लेख का निष्कर्ष।। Conclusion.

मित्रों, धनतेरस तथा दीपावली दोनों ही पर्व धन-समृद्धि के उत्सव माने जाते हैं। किंतु उनका स्वरूप भिन्न-भिन्न होता है। धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि, कुबेर तथा यमराज का पूजन एवं शुभ खरीदारी की जाती है। जबकि माँ लक्ष्मी का मुख्य एवं विधिवत पूजन दीपावली की रात्रि को प्रदोष काल में स्थिर लग्न के मुहूर्त में करना शास्त्र-सम्मत माना गया है।।

और यहाँ मैं यही कहूँगा कि पूजन का वास्तविक फल दिन अथवा मुहूर्त से अधिक श्रद्धा, स्वच्छता, सत्य-निष्ठा तथा सेवा-भाव पर निर्भर करता है। इसलिए दोनों दिनों के पूजन को पूर्ण श्रद्धा के साथ अपनाया जाना चाहिए।।

परन्तु मेरी आपको यही सलाह है कि इस विषय पर किसी भी निर्णायक निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले किसी विद्वान, योग्य, अनुभवी वैदिक ज्योतिषी अथवा किसी विद्वान ब्राह्मण से अपने नगर के अनुसार सही मुहूर्त तथा अपनी कुल-परंपरा के अनुकूल विधि की जानकारी विधिपूर्वक अवश्य प्राप्त करनी चाहिए। ताकि सही एवं व्यक्तिगत मार्गदर्शन प्राप्त हो सके।।

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