कब और कितने वर्ष की कन्याओं को भोजन करवायें।।

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Kanya Poojan And Kanya Bhoj
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कब और कितने वर्ष की कन्याओं को भोजन करवायें, कन्या पूजन का विधान ।। Kanya Poojan And Kanya Bhoj.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, किसी भी नवरात्रि में जैसा की आप जानते हैं, आठवां दिन या अष्टमी देवी महागौरी को समर्पित होता है । इस दिन देवी माँ को नारियल प्रसाद के रूप में चढ़ाना चाहिये ।।

आठवीं शक्ति “माँ महागौरी” हैं भगवान शिव के कहने पर माँ महाकाली ने तपस्या कर ब्रह्मदेव सें अपने लिए गौर वर्ण का वरदान माँगा था । माँ महागौरी को नारियल, खिचड़ी एवं खीर का भोग भी बहुत ही प्रिय है ।।

मित्रों, नवरात्र के आठवें दिन हवन करना चाहिये जिसमें कंडे (गाय के गोबर के उपले) जलाकर उसमें घी, हवन सामग्री, बताशा, लौंग का जोड़ा, पान, सुपारी, कपूर, गूगल, इलायची, किसमिस, कमलगट्टा आदि से हवन करना चाहिये ।।

हो सके तो नवरात्रे के दसों दिन कुँवारी कन्याओं को भोजन करायें । संभव न हो तो कम-से-कम अष्टमी के दिन तो अवश्य ही करवाना चाहिये क्योंकि इस दिन इसका विशेष महत्व होता है ।।

कन्या भोजन के बिना नवरात्रि का उपवास एवं पूजन सब अधुरा माना जाता है । अन्य ग्रंथों में नवरात्रि के अवसर पर कन्या पूजन एवं कन्या भोजन को अत्यंत ही महत्वपूर्ण बताया गया है । नवरात्रियों में देवी मां के सभी साधक कन्याओं को मां दुर्गा का दूसरा स्वरूप मानकर उनकी पूजा करते हैं । सनातन धर्म के लोगों में सदियों से ही कन्या पूजन और कन्या भोज कराने की परंपरा चली आ रही है ।।

विशेषकर कलश स्थापना करने वालों और नवरात्री का व्रत रखने वालों के लिए कन्या भोज को तो बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है । भोजन हेतु जिन नौ बच्चियों को बुलाया जाता है उन्हें मां दुर्गा के नौ रूप मानकर ही उनकी पूजा की जाती है । कन्याओं की उम्र के अनुसार उनके नाम भी दिए गए हैं ।।

दो वर्ष की कन्या को कन्या कुमारी, तीन साल की कन्या को त्रिमूर्ति, चार साल की कन्या को कल्याणी, पांच साल की कन्या को रोहिणी, छह साल की कन्या को कालिका, सात साल की कन्या को चंडिका, आठ साल की कन्या को शाम्भवी, नौ साल की कन्या को दूर्गा और 10 साल की कन्या को सुभद्रा का स्वरूप माना जाता है ।।

यही कारण है, कि कन्या भोज या कन्या पूजन के लिए 10 साल से कम उम्र की बालिकाओं को ही महत्वपूर्ण माना जाता है । इनकी पूजा से पहले सुबह स्नान करके प्रसाद में खीर, पूरी और हलवा आदि बनाकर तैयार करना चाहिए । इसके बाद कन्याओं को बुलाकर शुद्ध जल से उनका पांव धोना चाहिए । कन्याओं के पांव धुलने के बाद उन्हें साफ-सुथरे आसन पर बैठाना चाहिए ।।

कन्याओं को भोजन परोसने से पहले मां दुर्गा का भोग लगाना चाहिए । इसके बाद प्रसाद स्वरूप में कन्याओं को उसे खिलाना चाहिए । नौ कन्याओं के एक साथ एक छोटे बालक को भी भोज कराने का प्रचलन है । बालक भैरव बाबा का स्वरूप या लंगूर कहा जाता है ।।

कन्याओं को भरपेट भोजन कराने के बाद उन्हें तिलक लगाना एवं कलाई पर रक्षा बांधने का भी विधान है । कन्याओं को विदा करते समय अपनी सामर्थ्य के अनुसार अनाज, रुपया या वस्त्र भेंट करें और उनके पैर छूकर आशिर्वाद प्राप्त करें । अष्ठमी या नवमी को कन्या भोज करवाने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं ।।

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