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अशुभ मंगल व्यक्ति की ऊर्जा और साहस को असंतुलित करता है।।

अशुभ मंगल व्यक्ति की ऊर्जा और साहस को असंतुलित कर सकता है।। Ashubh Mangal Disrupts the energy balance
अशुभ मंगल व्यक्ति की ऊर्जा और साहस को असंतुलित कर सकता है।। Ashubh Mangal Disrupts the energy balance

अशुभ मंगल व्यक्ति की ऊर्जा और साहस को असंतुलित करता है।। Ashubh Mangal Disrupts the energy balance.

अशुभ मंगल की सूक्ष्म पहचान का परिचय।। Introduction.

मित्रों, हमने पिछले लेख में अनेकों ग्रहों की स्थितियों को डिग्री सहित समझा था। आज उसी क्रम में हम ग्रहों के सेनापति कहे जाने वाले मंगल की अशुभ स्थितियों पर चर्चा करेंगे। मंगल जब शुभ तथा बलवान होता है, तो जातक को साहस, पराक्रम, उत्साह तथा निर्णय लेने की दृढ़ता देता है। परंतु यही मंगल जब पीड़ित अथवा निर्बल स्थिति में हो, तो व्यक्ति की ऊर्जा तथा साहस, दोनों को असंतुलित कर देता है। यहाँ यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि मंगल की अशुभता केवल राशि देखकर नहीं। अपितु उसकी सटीक अंश अर्थात डिग्री, सूर्य से दूरी तथा भाव-स्थिति देखकर भी सूक्ष्मता से जानी जाती है।।

यहाँ एक रोचक बात यह है कि अशुभ मंगल का असंतुलन दो विपरीत रूपों में प्रकट होता है। किसी जातक में यह ऊर्जा की अति बनकर क्रोध, उतावलापन, आक्रामकता तथा दुर्घटना की प्रवृत्ति के रूप में दिखाई देता है। और किसी अन्य जातक में यही ऊर्जा की कमी बनकर भय, हिचक, निर्णय में असमर्थता तथा साहस के अभाव के रूप में दिखाई देता है। इसीलिए केवल यह कह देना कि मंगल खराब है, पर्याप्त नहीं होता। कुंडली में उसकी वास्तविक स्थिति का सूक्ष्म विश्लेषण आवश्यक होता है।।

मित्रों, तो आज हम विस्तार से समझेंगे कि मंगल किस राशि तथा किस डिग्री पर परम नीच का होता है। अस्त मंगल किस सीमा में बनता है। गंडांत मंगल क्या है। मांगलिक स्थिति तथा पाप-ग्रहों से पीड़ित मंगल का क्या प्रभाव पड़ता है। इन अशुभ स्थितियों से ऊर्जा तथा साहस में क्या असंतुलन उत्पन्न होता है। तथा इसके वैदिक एवं व्यावहारिक उपाय कौन-कौन से हैं।।

मंगल का स्वरूप एवं कारकत्व।। Nature And Significations Of Mars.

मित्रों, वैदिक ज्योतिष में मंगल को ग्रहों का सेनापति माना गया है। इसे ऊर्जा, साहस, पराक्रम, शक्ति, उत्साह तथा पुरुषार्थ का कारक कहा गया है। इसके अतिरिक्त भाई-बहन, विशेषकर छोटे भाई, भूमि तथा संपत्ति, रक्त, मांसपेशियाँ, अस्थि-मज्जा, अग्नि, शस्त्र तथा पुलिस, सेना एवं अभियांत्रिकी जैसे कार्य-क्षेत्र भी मंगल के अधिकार में माने जाते हैं। मेष तथा वृश्चिक, इन दो राशियों का यह स्वामी है, तथा इसका तत्व अग्नि माना गया है।।

मित्रों, जब कुंडली में मंगल सुदृढ़ होता है, तो जातक में स्वाभाविक रूप से नेतृत्व की क्षमता, जोखिम उठाने का साहस, शारीरिक स्फूर्ति तथा किसी भी चुनौती का सामना करने की इच्छा-शक्ति दिखाई देती है। इसी कारण खिलाड़ियों, सैनिकों, चिकित्सकों तथा शल्य-चिकित्सकों की कुंडलियों में मंगल की मजबूत स्थिति को विशेष रूप से देखा जाता है। परंतु इसी बलवान ऊर्जा का संतुलन बिगड़ते ही जातक के जीवन में असंतुलन भी आरंभ हो जाता है।।

मित्रों, यही कारण है कि ज्योतिषी जब किसी जातक के साहस, स्वभाव, स्वास्थ्य अथवा भूमि-संपत्ति से जुड़ी समस्याओं का विश्लेषण करते हैं, तो सर्वप्रथम मंगल की राशि, अंश, भाव तथा उस पर पड़ने वाले अन्य ग्रहों के प्रभाव को देखते हैं। मंगल को केवल क्रोध का ग्रह समझ लेना उसके साथ अन्याय होगा। वह तो जीवन को गति तथा साहस देने वाला ग्रह है, जिसका संतुलित रहना ही शुभ माना गया है।।

मंगल की नीच राशि एवं परम नीच अंश।। Debilitation Sign And The Deepest Debilitation Degree Of Mars.

मित्रों, मंगल कर्क राशि में नीच का माना जाता है। तथा इसका परम नीच अंश अठाईस अंश पर माना गया है। अर्थात यदि मंगल कर्क राशि के अठाईस अंश पर स्थित हो, तो यह मंगल की सर्वाधिक निर्बल स्थिति मानी जाती है। इसके ठीक विपरीत मकर राशि में मंगल उच्च का होता है, तथा वहाँ भी अठाईस अंश पर वह परम उच्च माना जाता है। जैसे-जैसे मंगल कर्क के अठाईस अंश के निकट आता है। उसकी नीचता की तीव्रता उतनी ही बढ़ती जाती है।।

मित्रों, कर्क राशि जल-तत्व की राशि है, जिसका स्वामी चंद्रमा है। इसीलिए अग्नि-तत्व का ग्रह मंगल यहाँ अपनी स्वाभाविक तीव्रता को ठीक से अभिव्यक्त नहीं कर पाता। ऐसे जातकों में साहस तो होता है, परंतु वह भावनाओं में उलझकर दिशाहीन हो सकता है। कई बार ऐसा व्यक्ति भीतर से क्रोध तथा असंतोष से भरा रहता है, किंतु उसे उचित रूप से व्यक्त नहीं कर पाता, जो अंततः मानसिक तनाव अथवा अचानक फूटने वाले आक्रोश के रूप में प्रकट होता है।।

मित्रों, इसके विपरीत यदि मंगल कर्क राशि में तो हो, परंतु अठाईस अंश से काफी दूर हो, जैसे आरंभिक अंशों में, तो उसकी नीचता अपेक्षाकृत कम तीव्र मानी जाती है। इसी प्रकार यदि कुंडली में नीच भंग योग बन रहा हो, तो इसका फल और भी भिन्न हो सकता है। इसीलिए केवल इतना जान लेना कि मंगल नीच राशि में है, पर्याप्त नहीं। उसकी सटीक डिग्री तथा नीच-भंग की स्थिति जानना भी अत्यंत आवश्यक माना जाता है।।

अस्त मंगल की डिग्री-सीमा।। The Degree Range For Combust Mars.

मित्रों, जब कोई ग्रह सूर्य के अत्यंत निकट आ जाता है, तो उसे अस्त अर्थात कमजोर माना जाता है। क्योंकि सूर्य के तीव्र तेज के सामने उस ग्रह की अपनी चमक तथा शक्ति धूमिल पड़ जाती है। मंगल के लिए यह दूरी सामान्यतः सत्रह अंश मानी गई है। अर्थात यदि मंगल सूर्य से सत्रह अंश के भीतर आ जाए, तो वह अस्त मंगल कहलाता है। यद्यपि अलग-अलग ग्रंथों तथा परंपराओं में अस्त होने की डिग्री में कुछ भिन्नता भी देखी जाती है।।

मित्रों, अस्त मंगल जातक के साहस तथा पहल करने की क्षमता को भीतर से कमजोर कर देता है। ऐसा व्यक्ति मन में योजनाएँ तो बहुत बनाता है, किंतु उन्हें कार्य-रूप देने में हिचकिचाता है। उसे अपने पराक्रम का उचित श्रेय भी नहीं मिल पाता, तथा कई बार वह दूसरों के दबाव में आकर निर्णय बदल देता है। यह स्थिति विशेष रूप से तब और गंभीर हो जाती है। जब मंगल सूर्य से एक-दो अंश के अत्यंत निकट हो, क्योंकि इसे अत्यंत प्रबल अस्त अवस्था माना जाता है।।

गंडांत मंगल।। Gandanta Mars.

मित्रों, जब कोई ग्रह जल-राशि के अंतिम कुछ अंशों तथा अग्नि-राशि के आरंभिक कुछ अंशों के संधि-स्थान पर स्थित हो, तो इसे गंडांत कहा जाता है। कर्क-सिंह, वृश्चिक-धनु तथा मीन-मेष, ये तीनों संधि-स्थान गंडांत के क्षेत्र माने जाते हैं। यह संधि-स्थान अत्यंत अस्थिर तथा संवेदनशील माना जाता है। क्योंकि यहाँ एक राशि की ऊर्जा समाप्त होकर दूसरी राशि की ऊर्जा आरंभ हो रही होती है।।

मित्रों, मंगल स्वयं मेष तथा वृश्चिक का स्वामी है, तथा इन्हीं राशियों के निकट गंडांत के संधि-स्थान पड़ते हैं। इसीलिए यदि मंगल इन बिंदुओं पर स्थित हो, तो जातक के जीवन में अचानक तथा अप्रत्याशित उथल-पुथल, विशेषकर स्वास्थ्य, भाई-बंधुओं तथा संपत्ति से जुड़ी, देखने को मिल सकती है। ऐसे जातकों के लिए जन्म के समय विशेष शांति-अनुष्ठान की परंपरा भी शास्त्रों में बताई गई है। परंतु इसका सटीक आकलन कुंडली के संपूर्ण विश्लेषण के बाद ही किया जाना चाहिए।।

मांगलिक स्थिति तथा पाप-ग्रहों से पीड़ित मंगल।। Manglik Placement And Mars Afflicted By Malefics.

मित्रों, जब मंगल जन्म-कुंडली में प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम अथवा द्वादश भाव में स्थित हो, तो इसे मांगलिक स्थिति कहा जाता है। कुछ परंपराओं में द्वितीय भाव को भी इसमें सम्मिलित किया जाता है, तथा लग्न के साथ-साथ चंद्रमा तथा शुक्र से भी यही गणना की जाती है। इन भावों में मंगल की ऊर्जा सीधे जातक के स्वभाव, गृह-सुख, दांपत्य जीवन तथा स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। परंतु यहाँ यह स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए कि मांगलिक दोष का अर्थ यह नहीं कि जीवन में अनिवार्य रूप से कष्ट ही होगा। अनेक स्थितियों में इसका परिहार भी होता है, तथा मंगल का प्रभाव अन्य ग्रहों की दृष्टि-युति पर निर्भर करता है।।

मित्रों, इसी प्रकार जब मंगल पर राहु, केतु अथवा शनि जैसे पाप-ग्रहों की युति अथवा दृष्टि हो, तो उसकी पीड़ा और बढ़ जाती है। राहु के साथ मंगल की युति को अंगारक योग कहा जाता है, जिसमें जातक के भीतर अत्यधिक उत्तेजना, अचानक क्रोध तथा जोखिम भरे निर्णय लेने की प्रवृत्ति देखी जा सकती है। शनि के साथ मंगल की युति में कई बार ऊर्जा का अवरोध उत्पन्न होता है, जिससे जातक कार्य करना तो चाहता है, परंतु बार-बार बाधाएँ उसे रोकती हैं तथा भीतर कुंठा जन्म लेती है।।

मित्रों, यदि मंगल के दोनों ओर अर्थात आगे तथा पीछे के भाव में पाप-ग्रह स्थित हों, तो इसे पापकर्तरी योग कहा जाता है। इस स्थिति में मंगल चारों ओर से दबाव में घिरा हुआ प्रतीत होता है, तथा वह जिस भाव में हो, उससे जुड़े जीवन-क्षेत्र विशेष रूप से संघर्षपूर्ण बन जाते हैं। यह स्थिति तब अधिक गंभीर मानी जाती है, जब घेरने वाले पाप-ग्रह मंगल के अत्यंत निकट डिग्री पर स्थित हों। क्योंकि निकट डिग्री का प्रभाव सदैव दूर की तुलना में अधिक प्रबल फल देता है।।

अशुभ मंगल से ऊर्जा तथा साहस में असंतुलन।। Imbalance Of Energy And Courage Due To Inauspicious Mars.

मित्रों, अब हम समझते हैं कि इन अशुभ स्थितियों में जातक के जीवन में ऊर्जा तथा साहस का असंतुलन किन रूपों में प्रकट होता है। जब मंगल की ऊर्जा अधिक अनियंत्रित हो जाती है, तो जातक में शीघ्र क्रोध, उतावलापन, जिद, दूसरों से अनावश्यक टकराव तथा बिना सोचे-समझे निर्णय लेने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। ऐसे जातक वाहन चलाते समय, खेल-कूद में अथवा जोखिम भरे कार्यों में चोट अथवा दुर्घटना के प्रति अधिक संवेदनशील माने जाते हैं। इसके साथ ही कार्यस्थल तथा परिवार में विवाद की संभावना भी बढ़ जाती है।।

मित्रों, इसके विपरीत जब मंगल की ऊर्जा निर्बल पड़ती है, तब जातक में आत्मविश्वास की कमी, भय, निर्णय लेने में हिचक, आलस्य तथा चुनौतियों से बचने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। ऐसा व्यक्ति अवसर सामने होने पर भी आगे बढ़कर पहल नहीं कर पाता। उसे लगता है कि उसमें वह शक्ति ही नहीं है। यही स्थिति कई बार अपने ही अधिकारों के लिए खड़े न हो पाने के रूप में भी दिखाई देती है, जिससे जातक का आत्म-सम्मान भी प्रभावित होता है।।

मित्रों, इन दोनों स्थितियों के अतिरिक्त पारंपरिक ज्योतिष में पीड़ित मंगल को रक्त-संबंधी विकार, उच्च रक्तचाप, चोट, जलन, सूजन तथा शल्य-चिकित्सा जैसी स्थितियों से भी जोड़ा जाता है। भाई-बहनों से मतभेद, भूमि-संपत्ति से जुड़े विवाद तथा दांपत्य जीवन में तनाव भी इसके सामान्य संकेत माने जाते हैं। परंतु यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि यह सब ज्योतिषीय संकेत मात्र हैं, कोई चिकित्सकीय निदान नहीं। स्वास्थ्य संबंधी किसी भी समस्या में सर्वप्रथम योग्य चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें।।

अशुभ मंगल के वैदिक उपाय।। Vedic Remedies For Inauspicious Mars.

मित्रों, अब हम इस असंतुलन को शांत करने के सरल तथा प्रभावी वैदिक उपायों को समझते हैं। मंगलवार का दिन मंगल देव तथा श्री हनुमान जी की उपासना के लिए विशेष माना गया है। इस दिन हनुमान चालीसा का पाठ, सुंदरकांड का पाठ अथवा हनुमान जी के मंदिर में दर्शन करना मंगल की उग्रता को शांत करने तथा साहस को सही दिशा देने में सहायक माना जाता है। इसके साथ ही “ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः” इस मंगल बीज-मंत्र का श्रद्धापूर्वक जप भी परंपरा में प्रचलित है।।

मित्रों, इसके अतिरिक्त मंगलवार के दिन लाल मसूर की दाल, गुड़, लाल वस्त्र अथवा तांबे की वस्तु का दान करना भी शुभ माना जाता है। ऋण-मुक्ति तथा मंगल-शांति के लिए ऋणमोचक मंगल स्तोत्र का पाठ भी बताया गया है। जिन जातकों के लिए मंगल कारक सिद्ध होकर निर्बल हो, उनके लिए विद्वान ज्योतिषी कुंडली देखकर मूंगा रत्न धारण करने की सलाह भी देते हैं। परंतु यह ध्यान रहे कि बिना कुंडली-विश्लेषण के रत्न धारण करना उचित नहीं। क्योंकि जिनके लिए मंगल अशुभ कारक हो, उनके लिए मूंगा समस्या बढ़ा भी सकता है।।

मित्रों, एक महत्वपूर्ण बात यह है कि मंगल के उपाय केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं हैं। मंगल ऊर्जा का ग्रह है, इसलिए इसे संतुलित करने के लिए ऊर्जा को सही दिशा देना भी आवश्यक है। जिन जातकों में ऊर्जा की अति हो, उनके लिए नियमित व्यायाम, योगासन, प्राणायाम तथा क्रोध पर नियंत्रण का अभ्यास बहुत सहायक होता है। और जिनमें ऊर्जा तथा साहस की कमी हो, उनके लिए धीरे-धीरे छोटे-छोटे लक्ष्य बनाकर उन्हें पूरा करना, शारीरिक सक्रियता बढ़ाना तथा आत्मविश्वास को क्रमशः मजबूत करना लाभदायक माना जाता है।।

शास्त्रीय प्रमाण।। Scriptural References.

मित्रों, बृहत्पाराशर होरा शास्त्र में ग्रहों के उच्च-नीच अंशों का वर्णन मिलता है, जिसमें मंगल का उच्च मकर राशि के अठाईस अंश पर तथा नीच कर्क राशि में बताया गया है। इसी ग्रंथ में ग्रहों के अस्त होने की अंश-सीमाओं का भी विवेचन है, जिसमें मंगल के लिए सूर्य से सत्रह अंश की दूरी का उल्लेख मिलता है। फलदीपिका में भी मंगल के कारकत्व तथा भाव-स्थिति के अनुसार उसके शुभाशुभ फलों का विस्तार से वर्णन किया गया है।।

सारावली तथा अन्य फलित-ग्रंथों में पीड़ित अथवा पाप-ग्रहों से घिरे हुए ग्रह के संबंधित भाव में संघर्ष उत्पन्न करने की चर्चा मिलती है। साथ ही गंडांत की अवधारणा पराशरी-परंपरा तथा नक्षत्र-विचार में प्रमुखता से मिलती है। यहाँ यह भी स्पष्ट कर देना उचित होगा कि अस्त होने की डिग्री तथा मांगलिक दोष के नियमों में अलग-अलग ग्रंथों तथा परंपराओं के बीच कुछ भिन्नता मिलती है। इसलिए इनका सटीक आकलन संपूर्ण जन्मकुंडली के अध्ययन के पश्चात ही किया जाना चाहिए।।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न।। Frequently Asked Questions. (FAQ)

प्रश्न 1. मंगल का परम नीच अंश कौन-सा है।। What Is The Degree Of Mars’s Deepest Debilitation.

उत्तर:- मंगल कर्क राशि में नीच का माना जाता है तथा कर्क के अठाईस अंश पर परम नीच का माना जाता है। यह उसकी सर्वाधिक निर्बल स्थिति होती है।।

प्रश्न 2. मंगल किस डिग्री पर अस्त माना जाता है।। At What Degree Is Mars Considered Combust.

उत्तर:- यदि मंगल सूर्य से सामान्यतः सत्रह अंश के भीतर आ जाए, तो उसे अस्त मंगल कहा जाता है। अलग-अलग ग्रंथों में इसमें कुछ भिन्नता भी मिलती है।।

प्रश्न 3. क्या मांगलिक होने का अर्थ है कि जीवन में कष्ट अवश्य होगा।। Does Being Manglik Mean There Will Definitely Be Hardship.

उत्तर:- नहीं, मंगल का प्रभाव उसकी राशि, अंश, भाव तथा अन्य ग्रहों की दृष्टि-युति पर निर्भर करता है। अनेक स्थितियों में मांगलिक दोष का परिहार भी होता है, इसलिए कुंडली का संपूर्ण विश्लेषण आवश्यक है।।

प्रश्न 4. अशुभ मंगल का साहस पर क्या प्रभाव पड़ता है।। What Is The Effect Of Inauspicious Mars On Courage.

उत्तर:- यह दोनों रूपों में प्रकट हो सकता है। कहीं ऊर्जा की अति से उतावलापन तथा क्रोध बढ़ता है, तो कहीं ऊर्जा की कमी से भय, हिचक तथा आत्मविश्वास का अभाव दिखाई देता है।।

प्रश्न 5. क्या सभी को मूंगा रत्न धारण कर लेना चाहिए।। Should Everyone Wear Red Coral.

उत्तर:- नहीं, बिना कुंडली के विश्लेषण के रत्न धारण करना उचित नहीं। जिनके लिए मंगल अशुभ कारक हो, उनके लिए मूंगा समस्या बढ़ा भी सकता है। इसलिए रत्न केवल योग्य ज्योतिषी की सलाह से ही धारण करें।।

लेख का निष्कर्ष।। Conclusion.

मित्रों, मंगल की अशुभता को समझने के लिए केवल राशि ही नहीं, अपितु उसकी सटीक डिग्री, सूर्य से दूरी, गंडांत-स्थिति, मांगलिक भाव तथा पाप-ग्रहों के प्रभाव जैसी सूक्ष्म बातों का भी अध्ययन आवश्यक है। परम नीच अंश, अस्त होने की सीमा तथा पीड़ित स्थिति, ये सभी मिलकर मंगल के असंतुलन की वास्तविक तीव्रता को निर्धारित करते हैं।।

वैदिक ज्योतिष के अनुसार इन सूक्ष्म स्थितियों को समझकर ही उचित उपाय अपनाए जाने चाहिए। और यहाँ मैं यही कहूँगा कि मंगल की ऊर्जा स्वयं में बुरी नहीं है। असंतुलन उसकी दिशा बिगड़ने से आता है। इसलिए पूजा-पाठ, संयम, व्यायाम तथा सही दिशा में किए गए प्रयासों के साथ, मंगल की ऊर्जा को साहस तथा पुरुषार्थ में बदला जा सकता है।।

परन्तु मेरी आपको यही सलाह है कि अपनी कुंडली में मंगल की सटीक डिग्री तथा वास्तविक स्थिति जानने के लिए किसी विद्वान, योग्य, अनुभवी वैदिक ज्योतिषी से संपूर्ण जन्मकुंडली का विश्लेषण विधिपूर्वक अवश्य करवाना चाहिए। ताकि सही एवं व्यक्तिगत मार्गदर्शन प्राप्त हो सके।।

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