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नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती पाठ का महत्व।।

नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती पाठ का महत्व।। Durga Saptashati Path in Navratri.

दुर्गा सप्तशती का परिचय।। Introduction.

मित्रों, हमने पिछले लेखों में नवरात्रि में अखंड ज्योति के नियम तथा व्रत के नियमों को विस्तार से समझा था। परंतु नवरात्रि की साधना का सबसे प्रमुख आधार दुर्गा सप्तशती का पाठ माना जाता है। जिस प्रकार दीपक के बिना पूजा-स्थान सूना होता है। उसी प्रकार सप्तशती के पाठ के बिना अनेक साधक नवरात्रि की उपासना को अधूरा मानते हैं। आज भी घर-घर में इन नौ दिनों में सप्तशती के श्लोकों की ध्वनि गूँजती है।।

दुर्गा सप्तशती को देवी माहात्म्य तथा चंडी पाठ भी कहा जाता है। यह मार्कण्डेय पुराण का एक अंश माना जाता है। जिसमें सात सौ श्लोक तेरह अध्यायों में संकलित हैं। इसी कारण इसे सप्तशती कहा जाता है। अर्थात सात सौ श्लोकों वाला ग्रंथ। इसमें माता दुर्गा के प्राकट्य, उनके पराक्रम तथा असुरों के संहार की कथाएँ वर्णित हैं। जो साधक को शक्ति, साहस तथा श्रद्धा का संदेश देती हैं।।

परंतु मित्रों, बहुत से श्रद्धालु पाठ तो करना चाहते हैं, पर उन्हें यह ज्ञात नहीं होता कि पाठ की विधि क्या है। अध्यायों का क्रम कैसे रखें, तथा यदि समय कम हो तो क्या किया जाए। इसी कारण कई बार वे या तो पाठ आरंभ ही नहीं कर पाते, या मन में भय लेकर करते हैं। इसीलिए आज हम इस विषय को सरल रूप में समझने का प्रयास करेंगे।।

तो आज हम विस्तार से समझेंगे कि सप्तशती का वास्तविक महत्व क्या है। इसके तीन चरित्र तथा तेरह अध्याय किस विषय का वर्णन किया गया है। सप्तशती के पाठ से पहले सप्तशती के पाठ का कौन-से अंग पढा जाता है। पाठ की विधि तथा नियम क्या हैं। नौ दिनों में पाठ का क्रम कैसे रखें। तथा यदि पूर्ण पाठ संभव न हो तो क्या उपाय है।।

दुर्गा सप्तशती का महत्व।। Significance of Durga Saptashati.

मित्रों, परंपरा में कलियुग के लिए चंडी की उपासना को विशेष फलदायी बताया गया है। सप्तशती के विषय में मान्यता है कि श्रद्धा से किया गया इसका पाठ साधक के भय, बाधा तथा मानसिक अशांति को शांत करता है। नवरात्रि में इसका महत्व इसलिए और बढ़ जाता है। क्योंकि ये नौ दिन देवी की उपासना के लिए विशेष माने गए हैं।।

सप्तशती में देवी स्वयं यह आश्वासन देती हैं कि जो भक्त शरद ऋतु की महापूजा में उनके माहात्म्य का श्रद्धा से श्रवण तथा पाठ करता है। वह प्रत्येक बाधाओं से मुक्त होकर धन, संतान तथा सुख प्राप्त करता है। यही कारण है कि शारदीय नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती के पाठ का सबसे अधिक महत्त्व बताया है।।

परन्तु यहाँ यह भी समझना आवश्यक है कि सप्तशती केवल कामना-पूर्ति का साधन मात्र नहीं है। अपितु एक गहन आध्यात्मिक ग्रंथ भी इसे कहा गया है। इसकी कथाओं में असुर बाहर के शत्रु ही नहीं, अपितु हमारे भीतर के दोषों, जैसे अहंकार, मोह तथा क्रोध के भी प्रतीक माने जाते हैं। इसलिए इस दुर्गा सप्तशती का पाठ आत्मशुद्धि का मार्ग भी है।।

तीन चरित्र तथा तेरह अध्याय।। Three Charitras and Thirteen Chapters.

मित्रों, दुर्गा सप्तशती को तीन चरित्रों में विभाजित किया गया है। प्रथम चरित्र में केवल पहला अध्याय है। जिसमें मधु तथा कैटभ नामक असुरों के वध की कथा आती है। इस चरित्र की अधिष्ठात्री देवी माता महाकाली मानी जाती हैं। तथा इस अध्याय या इस चरित्र में भगवान श्रीमहाविष्णु की योगनिद्रा के रूप में देवी के प्राकट्य का वर्णन किया गया है।।

मध्यम चरित्र में दूसरे से चौथे अध्याय तक महिषासुर के वध की कथा है। इस चरित्र की अधिष्ठात्री देवी माता महालक्ष्मी मानी जाती हैं। इसी में देवताओं के तेज से देवी के प्रकट होने तथा महिषासुर के साथ उनके युद्ध का विस्तृत वर्णन किया गया है। चौथे अध्याय में देवताओं द्वारा की गई स्तुति, जिसे शक्रादय स्तुति भी कहा जाता है, विशेष रूप से समाज में प्रसिद्ध है।।

उत्तम चरित्र में पाँचवें से तेरहवें अध्याय तक शुंभ, निशुंभ तथा उनके सेनापतियों, जैसे चंड, मुंड तथा रक्तबीज, के संहार की कथा है। इस चरित्र की अधिष्ठात्री देवी माता महासरस्वती मानी जाती हैं। इसी भाग में देवी के अनेक रूपों, जैसे कौशिकी, काली तथा मातृकाओं का भी वर्णन है। अंतिम अध्यायों में देवी द्वारा भक्तों को दिए गए वरदान का उल्लेख मिलता है।।

पाठ से पूर्व के अंग।। Preliminary Parts Before the Path.

मित्रों, सप्तशती के मूल पाठ से पहले तथा बाद में कुछ अंगों का पाठ करने की परंपरा है। सामान्यतः सबसे पहले देवी कवच, फिर अर्गला स्तोत्र तथा कीलक स्तोत्र पढ़ने का आवश्यक विधान बताया गया है। इन्हें पाठ की रक्षा तथा शुद्धि के अंग माना जाता है। इसके बाद नवार्ण मंत्र का जप किया जाता है। जो पाठ का केंद्रीय मंत्र माना गया है।।

कई परंपराओं में आरंभ में रात्रि सूक्त का पाठ भी किया जाता है। तथा पाठ के अंत में देवी सूक्त का पाठ किया जाता है। इसके अतिरिक्त प्राधानिक, वैकृतिक तथा मूर्ति रहस्य नामक तीन रहस्य भी सप्तशती के साथ जुड़े हुए हैं। जिन्हें पाठ की पूर्णता के लिए पढ़ना जरुरी माना जाता है। इनका क्रम तथा विधि अपनी परंपरा के ब्राह्मण से ज्ञात कर लेना उचित होता है।।

दुर्गा सप्तशती का प्राण माना जानेवाला नवार्ण मंत्र “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे” जिसको दुर्गा सप्तशती का सच में प्राण माना जाता है। इसमें तीनों महाशक्तियों, अर्थात महाकाली, महालक्ष्मी तथा महासरस्वती के बीज समाहित माने गए हैं। इसलिए पाठ के आरंभ तथा अंत में इसका जप करना परंपरा में विशेष महत्व रखता है।।

पाठ की विधि।। Method of the Path.

मित्रों, पाठ आरंभ करने से पहले स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करना चाहिए। साथ ही पूजा-स्थान को शुद्ध करके रखना चाहिए। पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशा अथवा ऊनी आसन पर बैठें। सर्वप्रथम श्रीगणेश जी का पूजन करें। कलश तथा माता की प्रतिमा अथवा चित्र का पूजन करें। और फिर हाथ में जल लेकर पाठ का संकल्प करना आवश्यक होता है।।

पुस्तक को एक स्वच्छ चौकी अथवा पुस्तक के आसन पर रखें। पुस्तक को कभी-भी सीधे भूमि पर नहीं रखना चाहिए। पाठ करते समय उच्चारण शुद्ध तथा स्पष्ट रखें, तथा न बहुत तेज, न बहुत धीमी गति से पढ़ना चाहिए। जिन्हें संस्कृत उच्चारण में कठिनाई हो, वे किसी जानकार से पहले उच्चारण सीख लें। अथवा हिंदी भावार्थ सहित पढ़ें, क्योंकि सनातन धर्म में भाव की शुद्धता को सर्वोपरि माना गया है।।

पाठ समाप्त होने पर देवी की आरती अवश्य करनी चाहिए। फिर कोई अच्छा सा भोग अर्पित करना चाहिए। तथा पाठ में हुई किसी भी भूल के लिए क्षमा-प्रार्थना करना चाहिए। इसके लिए सप्तशती के साथ पढ़ा जाने वाला क्षमा-प्रार्थना स्तोत्र उपयोगी माना जाता है। अंत में प्रसाद ग्रहण करना तथा सभी को भी प्रसाद बाँटना चाहिए।।

नौ दिनों में पाठ का क्रम।। Sequence of the Path in Nine Days.

मित्रों, नवरात्रि में पाठ के कई क्रम प्रचलित हैं। एक सामान्य परंपरा में सात दिनों में पाठ पूर्ण करने का विधान बताया गया है। जिसमें प्रथम दिन पहला अध्याय, दूसरे दिन दूसरा तथा तीसरा, तीसरे दिन चौथा, चौथे दिन पाँचवें से आठवाँ, पाँचवें दिन नवें तथा दसवें, छठे दिन ग्यारहवाँ, तथा सातवें दिन बारहवाँ एवं तेरहवाँ अध्याय पढ़ा जाता है। शेष दो दिन हवन तथा कन्या-पूजन के लिए रखे जाते हैं।।

कुछ परिवार नौ दिनों में पाठ को समान रूप से बाँटते हैं। मूल रुप से यह पाठ एक गृहस्थ व्यक्ति के लिए बताया गया है। परन्तु मूल रूप से अनुष्ठान के लिए प्रतिदिन एक संपूर्ण पाठ करने का असली नियम है। जिनके पास समय हो, वे प्रतिदिन संपूर्ण पाठ भी कर सकते हैं। अन्यथा किसी ब्राह्मण से यह नव चंडी का अनुष्ठान करवाना अनिवार्य होता है। इसलिए अपने परिवार अथवा ब्राह्मण द्वारा बताए गए क्रम का ही पालन करना उचित होता है।।

अधिक समय न होने की स्थिति में तीन चरित्रों को तीन दिनों में पढ़ने की भी परंपरा है। जो लोग किसी कारण से पूरा पाठ न कर पाएँ। वे देवी कवच, अर्गला तथा कीलक के साथ नवार्ण मंत्र का जप, अथवा सिद्ध कुंजिका स्तोत्र अथवा सप्तश्लोकी दुर्गा का पाठ भी कर सकते हैं। परन्तु ध्यान रहे की यह संक्षिप्त उपाय माना गया है। सम्पूर्ण पाठ को ही असली अनुष्ठान कहा जाता है।।

पाठ के समय पालन करने योग्य नियम।। Rules to Follow During the Path.

मित्रों, पाठ के दौरान शारीरिक तथा मानसिक पवित्रता का भी ध्यान रखें। एक बार आसन पर बैठने के बाद अध्याय पूर्ण होने तक बीच में उठना, बात करना अथवा इधर-उधर ध्यान भटकाना भी उचित नहीं माना जाता। इसलिए पाठ आरंभ करने से पूर्व जल, पुस्तक तथा आवश्यक सामग्री पास में रख लें तथा फोन आदि को अपने से काफी दूर रखें।।

पाठ के दिनों में सात्त्विक आहार, संयम तथा सत्य-भाषण का पालन करें। क्रोध, निंदा तथा कलह से नितांत दूर रहें। कोशिश करें कि पाठ एक निश्चित समय तथा निश्चित स्थान पर ही किया जाए। क्योंकि नियमितता से साधना में स्थिरता आती है। पाठ का समय प्रातःकाल अथवा संध्या का शांत समय अनुकूल माना जाता है।।

यदि पाठ करते समय कोई त्रुटि हो जाए अथवा कोई शब्द छूट जाए, तो घबराएँ नहीं। श्रद्धा के साथ क्षमा माँगकर आगे बढ़ना चाहिए। देवी को भक्त की भावना ही सर्वाधिक प्रिय होता है। और अनजाने में हुई भूल को वैदिक परंपरा में कोई दोष कभी नहीं माना जाता है। परन्तु यह तभी होता है, जब यदि उसे सुधारने का सच्चा प्रयास करने का मानसिक भावना हो।।

पाठ न कर पाने की स्थिति में उपाय।। Alternatives If One Cannot Recite.

मित्रों, यदि कोई व्यक्ति संस्कृत में मूल पाठ करने में असमर्थ हो, अथवा समय की कमी हो, तो परंपरा में श्रवण का भी महत्व बताया गया है। किसी जानकार व्यक्ति के मुख से पाठ को श्रद्धा से सुनना। अथवा किसी ब्राह्मण से पाठ करवाना भी सामान्य रूप से बहुत ही उत्तम माना जाता है। साथ ही हिंदी भावार्थ का अध्ययन भी साधना का ही एक रूप माना जाता है।।

घर में यदि बच्चे, वृद्ध अथवा अस्वस्थ सदस्य हों, तो वे केवल नवार्ण मंत्र का जप अथवा “या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः” इस स्तुति का स्मरण कर सकते हैं। यही भाव सप्तशती का सार भी माना जाता है। साथ ही यह स्मरण रखें कि पाठ की संख्या अथवा कठिनाई से अधिक महत्वपूर्ण भाव की शुद्धता है। एक अध्याय भी यदि मन से पढ़ा जाए, तो वह यांत्रिक रूप से पढ़े गए सम्पूर्ण पाठ से अधिक सार्थक होता है।।

शास्त्रीय प्रमाण।। Scriptural References.

मित्रों, दुर्गा सप्तशती मार्कण्डेय पुराण के देवी माहात्म्य खंड के रूप में प्रतिष्ठित है। तथा इसे शाक्त परंपरा का प्रमुख ग्रंथ माना जाता है। इसमें देवी के तीन चरित्रों तथा उनके स्वरुपों का वर्णन मिलता है। देवीभागवत पुराण में भी नवरात्रि की उपासना तथा देवी माता के पूजन की महिमा का विस्तार से वर्णित किया गया है।।

सप्तशती के आरंभिक अंगों, जैसे कवच, अर्गला तथा कीलक, के विषय में तंत्र-परंपरा में अनेक विवेचन मिलते हैं। साथ ही पाठ-विधि, अध्याय-क्रम तथा न्यास आदि में क्षेत्र तथा संप्रदाय के अनुसार भिन्नताएँ भी पाई जाती हैं। इसलिए पाठ की गहन विधि के लिए अपने कुल-गुरु अथवा अनुभवी ब्राह्मण या फिर किसी विद्वान आचार्य का मार्गदर्शन लेना उचित होता है।।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न।। Frequently Asked Questions. (FAQ)

प्रश्न 1. दुर्गा सप्तशती में कितने अध्याय तथा श्लोक हैं।। How Many Chapters and Verses Are There in Durga Saptashati.

उत्तर:- दुर्गा सप्तशती में तेरह अध्याय हैं, जिनमें लगभग सात सौ श्लोक संकलित माने जाते हैं। इसी कारण इसे सप्तशती कहा जाता है।।

प्रश्न 2. सप्तशती के तीन चरित्र कौन-से हैं।। What Are the Three Charitras of Saptashati.

उत्तर:- प्रथम चरित्र में पहला अध्याय, मध्यम चरित्र में दूसरे से चौथे अध्याय, तथा उत्तम चरित्र में पाँचवें से तेरहवें अध्याय आते हैं। जिनकी अधिष्ठात्री क्रमशः महाकाली, महालक्ष्मी तथा महासरस्वती मानी जाती हैं।।

प्रश्न 3. पाठ से पहले कौन-से स्तोत्र पढ़े जाते हैं।। Which Stotras Are Recited Before the Path.

उत्तर:- सामान्यतः देवी कवच, अर्गला स्तोत्र तथा कीलक स्तोत्र पढ़े जाते हैं। तथा उसके बाद नवार्ण मंत्र का जप किया जाता है। क्रम में कुल-परंपरा के अनुसार भेद हो सकता है।।

प्रश्न 4. यदि पूरा पाठ संभव न हो तो क्या करें।। What to Do If Full Recitation Is Not Possible.

उत्तर:- ऐसी स्थिति में कवच, अर्गला, कीलक के साथ नवार्ण मंत्र का जप, अथवा सिद्ध कुंजिका स्तोत्र, सप्तश्लोकी दुर्गा का पाठ किया जा सकता है। किसी जानकार से पाठ का श्रद्धापूर्वक श्रवण करना भी मान्य है।।

प्रश्न 5. पाठ में त्रुटि हो जाए तो क्या करें।। What to Do If a Mistake Happens During the Path.

उत्तर:- घबराएँ नहीं। श्रद्धा से क्षमा-प्रार्थना करें, तथा आगे अधिक सावधानी से पाठ करें। आवश्यकता हो तो किसी विद्वान ब्राह्मण से उच्चारण तथा विधि का मार्गदर्शन लेना चाहिए।।

लेख का निष्कर्ष।। Conclusion.

मित्रों, दुर्गा सप्तशती केवल पढ़ा जाने वाला ग्रंथ नहीं, अपितु साधना का एक जीवंत मार्ग है। इसके तीन चरित्र, तेरह अध्याय तथा नवार्ण मंत्र, ये सभी साधक को शक्ति की उपासना के साथ-साथ आत्मशुद्धि की ओर ले जाते हैं। नवरात्रि के नौ दिन इसके पाठ के लिए सर्वोत्तम समय माने गए हैं।।

इस विषय में मैं यही कहूँगा कि पाठ की विधि तथा नियमों का पालन आवश्यक होता है। परंतु उसका उद्देश्य भय उत्पन्न करना नहीं है। यदि आप संस्कृत नहीं पढ़ सकते, अथवा समय कम है, तो भी श्रद्धा के साथ किया गया छोटा पाठ, जप अथवा श्रवण भी माता को स्वीकार होता है। साधना की सफलता के भाव की सच्चाई में होता है।।

परन्तु मेरी आपको यही सलाह है कि पाठ की गहन विधि, अध्याय-क्रम तथा अनुष्ठान के लिए अपनी कुल-परंपरा के अनुसार किसी विद्वान, योग्य तथा अनुभवी ब्राह्मण से मार्गदर्शन अवश्य लेना चाहिए। ताकि आपका पाठ पूर्ण विधि-विधान तथा निश्चिंत मन से संपन्न हो सके। आप सभी सनातनियों को नवरात्रि के इस पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनायें।।

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