HomeVedic Articlesमाता सिद्धिदात्री की विशेष भोग-पूजन विधि एवं विशिष्ट मंत्र।।

माता सिद्धिदात्री की विशेष भोग-पूजन विधि एवं विशिष्ट मंत्र।।

माता सिद्धिदात्री की विशेष भोग-पूजन विधि एवं विशिष्ट मंत्र।। Ma Siddhidatri Special Bhog And Mantras.

माता सिद्धिदात्री के पूजन का परिचय।। Introduction.

मित्रों, नवरात्रि के नवम तथा अंतिम दिवस माँ दुर्गा के नवम स्वरूप, माता सिद्धिदात्री की उपासना की जाती है। “सिद्धि” का अर्थ है पूर्णता अथवा अलौकिक शक्ति, तथा “दात्री” का अर्थ है प्रदान करने वाली, अतः सिद्धिदात्री का अर्थ है समस्त सिद्धियों को प्रदान करने वाली देवी। मान्यता है कि भगवान शिव ने भी माता सिद्धिदात्री की कृपा से ही अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व तथा वशित्व, इन अष्ट-सिद्धियों को प्राप्त किया था। जिसके फलस्वरूप भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हो गया। तथा वे अर्धनारीश्वर कहलाए। माता कमल-पुष्प पर आरूढ़ होकर, अपने चार हाथों में शंख, चक्र, गदा तथा कमल-पुष्प धारण करती हैं।।

वैदिक शास्त्रों में माता सिद्धिदात्री को केतु ग्रह का भी अधिष्ठाता माना गया है। अतः इनकी उपासना से साधक के भीतर समस्त सिद्धियों, ज्ञान तथा मोक्ष-प्राप्ति की योग्यता का संचार होता है। जो साधक अपने जीवन में संपूर्ण आध्यात्मिक-सिद्धि तथा समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति चाहते हैं। उनके लिए नवम दिवस का यह पूजन सर्वाधिक शुभ फलदायी माना जाता है।।

परन्तु आप बिलकुल घबराएँ नहीं। आज हम इसी विषय पर विस्तार से समझेंगे कि माता सिद्धिदात्री का पूजन किस प्रकार करना चाहिए। इन्हें कौन सा भोग सर्वाधिक प्रिय होता है। किस विशिष्ट श्रृंगार एवं विशिष्ट मंत्र के जप से माता की शीघ्र प्रसन्नता प्राप्त होती है। तथा इस पूजन से कौन सा विशिष्ट फल प्राप्त होता है। आज के इस लेख में हम इसी विषय को विस्तार से समझेंगे।।

माता सिद्धिदात्री की पूजन-विधि।। Puja Vidhi Of Maa Siddhidatri.

मित्रों, नवरात्रि के नवम दिवस प्रातःकाल ब्रह्म-मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। इसी दिन महानवमी का पूजन, हवन तथा कन्या-पूजन भी विशेष रूप से संपन्न किया जाता है। अतः पूजा-स्थान को विशेष रूप से शुद्ध करके, माता सिद्धिदात्री की प्रतिमा अथवा चित्र को एक स्वच्छ चौकी पर स्थापित करना चाहिए।।

सर्वप्रथम श्रीगणेश जी तथा कलश का स्मरण करके पूजन आरंभ करना चाहिए। तत्पश्चात माता सिद्धिदात्री का आवाहन करना चाहिए। माता को रोली-अक्षत अर्पित करने के पश्चात कमल अथवा चंपा का पुष्प अर्पित करना शुभ माना जाता है। इसके पश्चात नवार्ण-मंत्र के साथ हवन संपन्न करना चाहिए। तथा धूप-दीप प्रज्वलित करके माता की आरती करनी चाहिए। अंत में नौ कन्याओं का पूजन, भोजन तथा दक्षिणा के साथ ही संपूर्ण नवरात्रि-साधना का विधिवत समापन करना चाहिए।।

माता को सर्वाधिक प्रिय भोग, नौ प्रकार के भोग एवं तिल का योग।। The Bhog Most Dear To The Mother, The Offering Of Nine Varieties And Sesame.

मित्रों, शास्त्रों के अनुसार माता सिद्धिदात्री को तिल अथवा तिल से निर्मित भोग सर्वाधिक प्रिय माना जाता है। जिसे माता को अर्पित करने के पश्चात ब्राह्मण अथवा कन्याओं को दान करने से साधक को अकस्मात होने वाली घटनाओं से रक्षा प्राप्त होती है। तथा आज के इस अनुष्ठान से जातक के समस्त विपत्तियों का नाश हो जाता है।।

इसके साथ ही चूँकि इस दिन नवरात्रि की संपूर्ण साधना का समापन होता है। अतः माता को नौ प्रकार के भोग, फल तथा मिष्ठान्न अर्पित करना भी अत्यंत प्रिय माना जाता है। हलवा-पूड़ी तथा खीर का भोग, जो कन्या-पूजन में प्रयुक्त होता है। वह भी माता को अत्यंत प्रसन्न करने वाला माना जाता है। जिससे साधक के जीवन में सुख-समृद्धि तथा संपूर्ण सिद्धि की प्राप्ति सहज ही हो जाती है।।

माता का विशिष्ट श्रृंगार, बहुरंगी वस्त्र तथा नवरत्न-आभूषण का योग।। Special Adornment Of The Mother, Multicoloured Attire And Navratna Ornaments.

मित्रों, माता सिद्धिदात्री, जो समस्त सिद्धियों की स्वामिनी हैं। इन्हें भव्य तथा समृद्ध श्रृंगार अत्यंत प्रिय माना जाता है। माता को लाल अथवा बहुरंगी वस्त्र अर्पित करना विशेष शुभ माना जाता है। जो इनके संपूर्ण तथा सर्वसिद्धि-स्वरूप का प्रतीक होता है। इनके श्रृंगार में नवरत्न अथवा स्वर्ण के समस्त आभूषण धारण कराना अत्यंत शुभ फलदायी माना जाता है। क्योंकि यह दिन संपूर्ण नवरात्रि की साधना का समापन दिवस भी होता है।।

इसके साथ ही माता को कमल अथवा लाल पुष्पों की माला पहनाना भी अत्यंत शुभ माना जाता है। इस प्रकार के संपूर्ण तथा भव्य श्रृंगार से माता शीघ्र प्रसन्न होकर साधक को समस्त सिद्धियों तथा मनोकामनाओं की पूर्ति का आशीर्वाद प्रदान करती हैं।।

माता सिद्धिदात्री के विशिष्ट मंत्र, जप से शीघ्र प्रसन्नता का योग।। Special Mantras Of Maa Siddhidatri, The Yoga Of Swift Grace Through Chanting.

मित्रों, माता सिद्धिदात्री की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित मूल-मंत्र का श्रद्धापूर्वक नियमित जप करना चाहिए। “ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः।।” इसके साथ ही ध्यान-मंत्र के रूप में निम्न श्लोक का भी पाठ करना चाहिए।।

“सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि।
सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।।”

मित्रों, इस मंत्र का अर्थ है कि सिद्ध, गंधर्व, यक्ष, असुर तथा देवताओं द्वारा सदैव सेवित, समस्त सिद्धियाँ प्रदान करने वाली देवी सिद्धिदात्री मुझे भी सिद्धि प्रदान करें। नवमी के दिन नवार्ण-मंत्र “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।।” का जप भी विशेष फलदायी माना जाता है। प्रातः तथा सायं दोनों समय इन मंत्रों का कम से कम एक माला अर्थात एक सौ आठ बार जप करने से माता शीघ्र प्रसन्न होती हैं।।

मित्रों, मंत्र-जप के समय कुछ विशेष सावधानियाँ रखनी चाहिए। जैसे मंत्र-जप सदैव स्वच्छ आसन पर बैठकर, पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके करना चाहिए। जप के समय कमल-गट्टे अथवा स्फटिक की माला का प्रयोग विशेष रूप से शुभ माना जाता है। चूँकि यह दिन संपूर्ण साधना के समापन का दिवस होता है। अतः साधक को विशेष रुप से कृतज्ञता तथा संपूर्ण समर्पण के भाव से ही जप तथा हवन करना चाहिए।।

इस पूजन से प्राप्त होने वाला विशिष्ट फल।। Special Fruit Obtained From This Worship.

मित्रों, जो साधक नवरात्रि के नवम दिवस विधिपूर्वक माता सिद्धिदात्री का पूजन, निर्धारित भोग-अर्पण तथा मंत्र-जप करता है। उसे अणिमा, महिमा, गरिमा आदि अष्ट-सिद्धियों की प्राप्ति होती है। तथा उसकी संपूर्ण नवरात्रि की साधना सफलतापूर्वक पूर्ण होकर सिद्ध होती है। इसके साथ ही साधक के भीतर संपूर्ण ज्ञान, वैराग्य तथा मोक्ष-प्राप्ति की योग्यता भी विकसित होती है। तथा उसके जीवन के समस्त अधूरे कार्य भी सिद्ध हो जाते हैं।।

और मेरी सलाह तो यही रहेगी कि इन उपायों को केवल औपचारिकता के लिए नहीं। बल्कि पूर्ण श्रद्धा तथा निरंतरता के साथ करना चाहिए। माता का पूजन शुद्ध मन, पूर्ण समर्पण-भाव तथा सच्ची भक्ति-भावना के साथ ही करना चाहिए। क्योंकि बाह्य आडंबर की अपेक्षा आंतरिक समर्पण तथा श्रद्धा ही माता की वास्तविक प्रसन्नता का कारण बनती है।।

शास्त्रीय प्रमाण।। Scriptural References.

मित्रों, देवी भागवत पुराण तथा दुर्गा-सप्तशती में माता सिद्धिदात्री को नवदुर्गाओं में नवम तथा अंतिम स्वरूप बताया गया है। जो समस्त सिद्धियों की दात्री मानी जाती हैं।।

स्कंद पुराण में भी यह उल्लेख मिलता है कि नवम नवरात्रि में इनकी विधिपूर्वक उपासना, हवन तथा कन्या-पूजन करने से साधक की संपूर्ण नवरात्रि की साधना सफल होकर समस्त सिद्धियों की प्राप्ति होती है।।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न।। Frequently Asked Questions. (FAQ)

प्रश्न 1. माता सिद्धिदात्री को कौन सा भोग सर्वाधिक प्रिय है।। Which Bhog Is Most Dear To Maa Siddhidatri.

उत्तर:- तिल अथवा तिल से निर्मित भोग, तथा हलवा-पूड़ी एवं खीर माता को सर्वाधिक प्रिय मानी जाती है।।

प्रश्न 2. माता सिद्धिदात्री का मूल-मंत्र क्या है।। What Is The Primary Mantra Of Maa Siddhidatri.

उत्तर:- “ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः।।” यह माता का मूल-मंत्र माना जाता है। जिसका नियमित जप माता की शीघ्र प्रसन्नता प्रदान करता है।।

प्रश्न 3. माता सिद्धिदात्री की उपासना से क्या विशिष्ट फल प्राप्त होता है।। What Special Fruit Is Obtained From The Worship Of Maa Siddhidatri.

उत्तर:- माता की उपासना से अणिमा-महिमा आदि अष्ट-सिद्धियों की प्राप्ति होती है। संपूर्ण नवरात्रि की साधना की सिद्धि तथा मोक्ष-प्राप्ति की योग्यता जैसा विशिष्ट फल प्राप्त होता है।।

प्रश्न 4. क्या माता सिद्धिदात्री का भगवान शिव से कोई विशेष संबंध है।। Is There Any Special Connection Of Maa Siddhidatri With Lord Shiva.

उत्तर:- हाँ, मान्यता है कि माता की कृपा से ही भगवान शिव ने अष्ट-सिद्धियाँ प्राप्त की थीं। जिसके फलस्वरूप वे अर्धनारीश्वर स्वरूप में प्रकट हुए।।

प्रश्न 5. मंत्र-जप कितनी बार तथा किस समय करना चाहिए।। How Many Times And At What Time Should The Mantra Be Chanted.

उत्तर:- प्रातः तथा सायं दोनों समय कम से कम एक माला अर्थात एक सौ आठ बार मंत्र-जप करना चाहिए। जिससे माता शीघ्र प्रसन्न होती हैं।।

लेख का निष्कर्ष।। Conclusion.

मित्रों, नवरात्रि के नवम दिवस माता सिद्धिदात्री की विधिपूर्वक उपासना, तिल के भोग का अर्पण, भव्य श्रृंगार, हवन, कन्या-पूजन तथा “ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः” इस मंत्र के नियमित जप से साधक को माता की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यह पूजन न केवल संपूर्ण नवरात्रि की साधना का सफल समापन करता है। बल्कि साधक को अष्ट-सिद्धियों, संपूर्ण ज्ञान तथा मोक्ष-प्राप्ति की योग्यता भी प्रदान करता है।।

परन्तु मेरी आपको यही सलाह है कि इस पूजन को विधिपूर्वक संपन्न करने हेतु किसी विद्वान तथा अनुभवी ब्राह्मण अथवा किसी आचार्य से विस्तृत मार्गदर्शन अवश्य प्राप्त करना चाहिए। ताकि पूजन में किसी प्रकार की त्रुटि न रह जाए तथा माता की पूर्ण कृपा प्राप्त हो सके।।

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