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नवरात्रि में किस मन्त्र की साधना करनी चाहिए।।

नवरात्रि में किस मन्त्र की साधना करनी चाहिए।। Navratri Me Kis Mantra Ki Sadhana Kare.

मंत्र-चयन का वैदिक परिचय।। Introduction.

मित्रों, नवरात्रि के नौ दिवस में साधना का संकल्प तो अनेक साधक ले लेते हैं। परंतु सबसे बड़ा प्रश्न यही रहता है कि साधना किस मंत्र की करें। क्योंकि देवी के असंख्य मंत्र हैं। कोई बीज-मंत्र है, कोई स्तोत्र है, तो कोई गायत्री-मंत्र। और प्रत्येक का अपना विशिष्ट स्वरूप तथा फल बताया गया है। इसी कारण साधक के मन में अक्सर भ्रम उत्पन्न हो जाता है। कि कौन-सा मंत्र उसके लिए उपयुक्त है, तथा कौन-सा नहीं। वैदिक परंपरा में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि मंत्र का चयन साधक की श्रद्धा, उसके प्रयोजन तथा उसकी क्षमता के अनुसार ही होना चाहिए। क्योंकि अनुपयुक्त मंत्र का चयन साधना को कठिन, तथा कई बार निष्फल भी बना देता है।।

शास्त्रों में यह भी वर्णित है कि नवरात्रि में जिस मंत्र की साधना की जाती है, उसमें माँ भगवती की ऊर्जा सहज ही प्रवाहित होने लगती है। इसीलिए प्राचीन काल से ही साधक इन नौ दिनों में कुछ विशेष मंत्रों का ही आश्रय लेते रहे हैं। जिनमें नवार्ण मंत्र (ॐ ऐं ह्रीं क्लिं चामुन्डायै विच्चे) को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इसके अतिरिक्त दुर्गा-गायत्री, सर्वमंगल मंत्र तथा प्रत्येक दिन की देवी के अनुसार पृथक मंत्र भी साधना में अत्यंत फलदायी माने गए हैं। परंतु इन सभी मंत्रों का एक साथ जप करना उचित नहीं माना जाता। अपितु साधक को अपनी सामर्थ्य के अनुसार एक अथवा दो मंत्रों का चयन करके, उन्हीं पर पूर्ण निष्ठा बनाए रखनी चाहिए।।

परन्तु आप बिलकुल घबराएँ नहीं। आज हम इसी विषय पर विस्तार से समझेंगे कि मंत्र-चयन के मूल सिद्धांत क्या हैं। नवार्ण मंत्र का क्या महत्व है तथा इसका जप किस प्रकार करना चाहिए। प्रयोजन के अनुसार कौन-सा मंत्र श्रेष्ठ रहता है। नौ दिनों की नौ देवियों के पृथक मंत्र कौन-से हैं। तथा जप-संख्या एवं सावधानियाँ क्या होती हैं। आज के इस लेख में हम इसी विषय को सरल भाषा में समझेंगे।।

मंत्र-चयन के मूल सिद्धांत।। Basic Principles Of Selecting A Mantra.

मित्रों, मंत्र-चयन का पहला सिद्धांत यह है कि साधक को जो मंत्र पहले से किसी गुरु से प्राप्त हो, उसी को प्राथमिकता देनी चाहिए। क्योंकि गुरु-प्रदत्त मंत्र में गुरु की साधना-शक्ति भी समाहित रहती है। यदि गुरु-मंत्र प्राप्त ना हो, तो साधक को नवार्ण मंत्र अथवा देवी के किसी सरल नाम-मंत्र से आरंभ करना चाहिए। क्योंकि इन मंत्रों में किसी विशेष दीक्षा की बाध्यता नहीं मानी जाती। और ये सभी वर्ग के साधकों के लिए सुलभ तथा सुरक्षित माने गए हैं।।

दूसरा सिद्धांत यह है कि पूरे नौ दिन तक एक ही मंत्र पर टिके रहना चाहिए। कभी एक मंत्र, कभी दूसरा, इस प्रकार बार-बार मंत्र बदलने से साधना की ऊर्जा भी बँट जाती है। तीसरा सिद्धांत यह है कि मंत्र का उच्चारण शुद्ध होना चाहिए। यदि संस्कृत उच्चारण में संदेह हो, तो पहले किसी जानकार से सीख लेना उचित रहता है। तथा अत्यंत उग्र अथवा तांत्रिक मंत्रों का जप बिना गुरु के मार्गदर्शन के कदापि नहीं करना चाहिए। क्योंकि इनमें नियमों की कठोरता अधिक होती है।।

नवार्ण मंत्र सर्वश्रेष्ठ क्यों।। Why Navarna Mantra Is The Best.

मित्रों, नवरात्रि की साधना में सर्वाधिक प्रतिष्ठित मंत्र नवार्ण मंत्र है। यह मंत्र है, “ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे”। इसे नवार्ण इसलिए कहते हैं क्योंकि इसमें नौ अक्षर समाहित हैं। जो माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों तथा नवग्रहों का भी प्रतिनिधित्व करते हैं। इस मंत्र में तीनों महाशक्तियों के बीज भी निहित हैं। “ऐं” अर्थात माँ सरस्वती, “ह्रीं” अर्थात माँ महालक्ष्मी, तथा “क्लीं” अर्थात माँ महाकाली। इसी कारण यह मंत्र ज्ञान, धन तथा शक्ति तीनों प्रदान करने वाला माना गया है।।

दुर्गा-सप्तशती में भी इस मंत्र को देवी की उपासना का मूल आधार बताया गया है। जो साधक पूरे नौ दिन श्रद्धा से इसका जप करता है। उसके जीवन से भय, बाधा तथा नकारात्मक प्रभाव शांत होने लगते हैं। इसके जप के लिए सर्वप्रथम एक माला अर्थात एक सौ आठ बार से आरंभ करना चाहिए। तथा अपनी क्षमता के अनुसार इसे ग्यारह, इक्कीस अथवा इक्यावन माला तक बढ़ाया जा सकता है। परंतु संख्या एक बार तय करने के पश्चात नौ दिनों तक उसमें परिवर्तन नहीं करना चाहिए।।

अन्य सरल एवं प्रभावी मंत्र।। Other Simple And Effective Mantras.

मित्रों, जो साधक नवार्ण मंत्र का जप किसी कारण से ना कर सकें, उनके लिए अन्य सरल मंत्र भी बताए गए हैं। इनमें सबसे सरल है दुर्गा बीज-मंत्र, “ॐ दुं दुर्गायै नमः”। यह मंत्र छोटा होने के कारण बालकों, वृद्धों तथा नए साधकों के लिए भी सहज है। इसके अतिरिक्त दुर्गा गायत्री मंत्र, “ॐ गिरिजायै विद्महे शिवप्रियायै धीमहि। तन्नो दुर्गा प्रचोदयात्”।।, भी अत्यंत शुभ फलदायी माना जाता है। यह मन को शांत करने तथा बुद्धि को निर्मल बनाने वाला मंत्र है।।

इसके साथ ही दुर्गा-सप्तशती का यह सर्वमंगल मंत्र भी साधना में अत्यंत प्रचलित है। “सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥” यह मंत्र समस्त मंगल तथा मनोकामना-पूर्ति के लिए जाना जाता है। तथा “या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥” यह स्तुति-मंत्र भी देवी-साधना में श्रद्धापूर्वक पढ़ा जाता है। इन सभी में से साधक अपनी श्रद्धा के अनुसार किसी एक को चुन सकता है।।

प्रयोजन के अनुसार मंत्र का चयन।। Selecting A Mantra According To Purpose.

मित्रों, यदि साधक का प्रयोजन धन-समृद्धि हो, तो माँ महालक्ष्मी के मंत्र, “ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः” का जप उपयुक्त माना जाता है। यदि विद्या तथा बुद्धि की प्राप्ति का प्रयोजन हो, तो माँ सरस्वती का मंत्र, “ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः”, विशेष फलदायी रहता है। तथा यदि भय-निवारण, सुरक्षा अथवा शत्रु-बाधा शांति का प्रयोजन हो, तो दुर्गा बीज-मंत्र अथवा नवार्ण मंत्र का जप श्रेष्ठ माना जाता है।।

इसी प्रकार आरोग्य तथा मानसिक शांति के लिए दुर्गा गायत्री मंत्र, तथा परिवार में सुख-शांति के लिए सर्वमंगल….. मंत्र का जप उत्तम बताया गया है। जो साधक केवल आध्यात्मिक उन्नति की कामना रखते हैं, उनके लिए नवार्ण मंत्र ही सर्वोत्तम है। क्योंकि इसमें ज्ञान, धन तथा शक्ति, तीनों का समन्वय है। परंतु यह ध्यान रहे कि प्रयोजन चाहे जो भी हो, श्रद्धा तथा निरंतरता ही मंत्र को फलदायी बनाती है।।

नौ दिनों की नौ देवियों के पृथक मंत्र।। Separate Mantras For The Nine Goddesses Of Nine Days.

मित्रों, यदि साधक एक ही मंत्र की बजाय प्रतिदिन की देवी के अनुसार साधना करना चाहे, तो इसके लिए भी पृथक मंत्र बताए गए हैं। प्रथम दिन माँ शैलपुत्री के लिए “ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः”, द्वितीय दिन माँ ब्रह्मचारिणी के लिए “ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः”, तथा तृतीय दिन माँ चंद्रघंटा के लिए “ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः” का जप किया जाता है। चतुर्थ दिन माँ कूष्माण्डा के लिए “ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः”, पंचम दिन माँ स्कंदमाता के लिए “ॐ देवी स्कन्दमातायै नमः”, तथा षष्ठ दिन माँ कात्यायनी के लिए “ॐ देवी कात्यायन्यै नमः” का जप करना चाहिए।।

सप्तम दिन माँ कालरात्रि के लिए “ॐ देवी कालरात्र्यै नमः”, अष्टम दिन माँ महागौरी के लिए “ॐ देवी महागौर्यै नमः”, तथा नवम दिन माँ सिद्धिदात्री के लिए “ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः” का जप किया जाता है। इस पद्धति में प्रतिदिन उस दिन की देवी का ध्यान करके, उन्हीं के मंत्र का जप किया जाता है। तथा इसके पश्चात अंत में एक माला नवार्ण मंत्र की भी की जा सकती है। यह पद्धति उन साधकों के लिए उत्तम है। जो नौ दिन नौ रूपों की उपासना करना चाहते हैं।।

जप-संख्या एवं आवश्यक सावधानियाँ।। Japa Count And Necessary Precautions.

मित्रों, जप-संख्या के विषय में सबसे महत्वपूर्ण नियम यह है कि जितनी संख्या का संकल्प लिया है। उसे प्रतिदिन उतना ही पूर्ण करना चाहिए। चाहे एक माला हो अथवा इक्यावन। अपनी क्षमता से अधिक संख्या का संकल्प लेकर बीच में छोड़ देना। कम संख्या में निरंतर जप करने से कहीं अधिक हानिकारक माना जाता है। इसलिए आरंभ में सरल तथा सहज संख्या ही चुननी चाहिए। जप सदैव स्फटिक अथवा रुद्राक्ष की माला से, तथा शांत एवं स्वच्छ वातावरण में करना उचित रहता है।।

सावधानी के रूप में यह भी ध्यान रखना चाहिए कि मंत्र-जप का उद्देश्य कभी किसी को हानि पहुँचाना नहीं होना चाहिए। क्योंकि ऐसी भावना से किया गया जप स्वयं साधक के लिए ही अशुभ फल उत्पन्न करता है। साधना-काल में सात्विक आहार, सत्य-वचन तथा संयम का पालन भी आवश्यक है। तथा किसी भी असामान्य अनुभव अथवा असमंजस की स्थिति में अपने गुरु अथवा किसी अनुभवी आचार्य से परामर्श अवश्य लेना चाहिए।।

शास्त्रीय प्रमाण।। Scriptural References.

मित्रों, दुर्गा-सप्तशती में नवार्ण मंत्र को देवी की उपासना का मूल बीज माना गया है। तथा सप्तशती के पाठ से पूर्व तथा पश्चात इसी मंत्र के जप का विधान भी बताया गया है। देवी भागवत पुराण में भी नवरात्रि-काल में देवी के नाम-मंत्र के जप को अत्यंत शुभ फलदायी बताया गया है।।

सर्वमंगल…. मंत्र तथा “या देवी सर्वभूतेषु” स्तुति दोनों ही दुर्गा-सप्तशती के अंतर्गत आती हैं। तथा इन्हें देवी की कृपा प्राप्त करने के सरलतम साधनों में गिना जाता है। तंत्र-ग्रंथों में भी यह उल्लेख मिलता है कि मंत्र का चयन साधक की क्षमता तथा प्रयोजन के अनुसार होना चाहिए। तथा एक ही मंत्र में अटल निष्ठा सिद्धि का आधार बनती है।।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न।। Frequently Asked Questions. (FAQ)

प्रश्न 1. नवरात्रि में सर्वश्रेष्ठ मंत्र कौन-सा माना जाता है।। Which Is Considered The Best Mantra During Navratri.

उत्तर:- नवार्ण मंत्र, “ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे”, नवरात्रि की साधना का सर्वश्रेष्ठ मंत्र माना जाता है। क्योंकि इसमें तीनों महाशक्तियों के बीज समाहित हैं।।

प्रश्न 2. क्या नवरात्रि में प्रतिदिन अलग-अलग मंत्र का जप करना चाहिए।। Should A Different Mantra Be Chanted Each Day.

उत्तर:- यदि साधक नौ रूपों की उपासना करना चाहे, तो प्रतिदिन की देवी के अनुसार पृथक मंत्र कर सकता है। अन्यथा पूरे नौ दिन एक ही मंत्र पर टिके रहना अधिक श्रेष्ठ माना जाता है।।

प्रश्न 3. नए साधक के लिए कौन-सा मंत्र सबसे सरल है।। Which Mantra Is Simplest For A Beginner.

उत्तर:- दुर्गा बीज-मंत्र, “ॐ दुं दुर्गायै नमः”, तथा दुर्गा गायत्री मंत्र नए साधकों के लिए सबसे सरल तथा सुरक्षित माने जाते हैं।।

प्रश्न 4. नवरात्रि में कितनी माला जप करना चाहिए।। How Many Malas Should Be Chanted During Navratri.

उत्तर:- आरंभ में एक माला से शुरू करना उचित है। तथा क्षमता के अनुसार ग्यारह, इक्कीस अथवा इक्यावन माला तक बढ़ाया जा सकता है। परंतु संख्या एक बार तय होने पर बदलनी नहीं चाहिए।।

प्रश्न 5. क्या बिना गुरु के भी इन मंत्रों का जप किया जा सकता है।। Can These Mantras Be Chanted Without A Guru.

उत्तर:- नवार्ण मंत्र, दुर्गा बीज-मंत्र तथा सर्वमंगल….. मंत्र जैसे सरल मंत्रों का जप श्रद्धापूर्वक किया जा सकता है। परंतु अत्यंत उग्र अथवा तांत्रिक मंत्रों के लिए गुरु का मार्गदर्शन आवश्यक है।।

लेख का निष्कर्ष।। Conclusion.

मित्रों, नवरात्रि में साधना हेतु मंत्र का चयन साधक की श्रद्धा, प्रयोजन तथा क्षमता के आधार पर होना चाहिए। नवार्ण मंत्र सर्वश्रेष्ठ माना गया है। तथा दुर्गा बीज-मंत्र, दुर्गा गायत्री, सर्वमंगल…. मंत्र एवं नौ दिनों की नौ देवियों के पृथक मंत्र भी साधना के श्रेष्ठ विकल्प हैं। जो साधक एक मंत्र चुनकर पूर्ण निष्ठा के साथ नौ दिनों तक उसका जप करता है। वह माँ भगवती की कृपा का निश्चित रूप से पात्र बनता है।।

और यहाँ मैं यही कहूँगा कि मंत्र चाहे छोटा हो अथवा बड़ा, उसकी शक्ति श्रद्धा तथा निरंतरता में ही निहित होती है। अनेक मंत्रों के पीछे भागने के बजाय एक ही मंत्र में गहराई से उतरना कहीं अधिक शुभ फलदायी सिद्ध होता है। परन्तु मेरी आपको यही सलाह है कि किसी भी विशेष मंत्र-साधना को आरंभ करने से पूर्व किसी विद्वान, योग्य, अनुभवी वैदिक गुरु अथवा आचार्य से विधिपूर्वक मार्गदर्शन अवश्य प्राप्त करना चाहिए। ताकि साधना में किसी प्रकार की त्रुटि ना रह जाए, तथा माता की पूर्ण कृपा प्राप्त हो सके।।

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