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शनि साढ़ेसाती के तीन चरण और उपाय।।

शनि साढ़ेसाती के तीन चरण और उपाय।। Shani Sade Sati Ke Teen Charan Aur Upay.

शनि साढ़ेसाती और उसके स्वरूप का संबंध।। Introduction.

मित्रों, वैदिक ज्योतिष में शनि की साढ़ेसाती को सबसे अधिक चर्चित तथा सबसे अधिक भय उत्पन्न करने वाली गोचर-अवधि माना गया है। यह अवधि कुल साढ़े सात वर्ष की होती है। और इसी कारण इसे साढ़ेसाती कहा जाता है। यह तब आरंभ होती है, जब गोचर का शनि जन्म-कुंडली में स्थित चंद्रमा की राशि से ठीक बारहवीं राशि में प्रवेश करता है। तत्पश्चात शनि क्रमशः चंद्र-राशि तथा उससे अगली अर्थात दूसरी राशि से होकर गुजरता है। इसी संपूर्ण यात्रा को साढ़ेसाती कहा जाता है।।

अब शनि की प्रकृति पर विचार करें तो यह धीमी गति, अनुशासन, कर्मफल तथा दीर्घकालिक परिणाम का न्यायाधीश ग्रह माना गया है। शनि किसी भी राशि में लगभग साढ़े सात वर्ष तक भ्रमण करता है। इसी कारण इसकी गति को सबसे धीमी माना जाता है। और यही कारण है कि जब यह न्यायकारी ग्रह जातक के मन के कारक अर्थात चंद्रमा की राशि के इर्द-गिर्द भ्रमण करता है, तो जातक के संपूर्ण मानसिक, भावनात्मक तथा व्यावहारिक जीवन पर एक विशेष तथा दीर्घकालिक प्रभाव देखने को मिलता है।।

मित्रों, यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि साढ़ेसाती स्वयं में न तो पूर्णतः अशुभ होती है, न ही पूर्णतः शुभ। अपितु यह एक ऐसी अवधि होती है, जिसमें जातक को अपने कर्मों का वास्तविक फल को भोगना ही पड़ता है। यदि जन्मकुंडली में शनि बलवान अथवा शुभ स्थिति में हो, तो यही साढ़ेसाती जातक को अनुशासन, परिश्रम तथा दीर्घकालिक सफलता की ओर भी अग्रसर करती है। जबकि पीड़ित शनि होने पर यह अवधि संघर्ष, विलंब तथा मानसिक तनाव भी उत्पन्न करती है।।

साढ़ेसाती को तीन चरणों में विभाजित किया गया है। अर्थात आरोही चरण, मध्य चरण तथा अवरोही चरण। प्रत्येक चरण की अवधि लगभग ढाई वर्ष की होती है। तथा प्रत्येक चरण जातक के जीवन के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों को प्रभावित करता है। और यहाँ तो मैं यही कहूँगा कि साढ़ेसाती से भयभीत होने की बजाय इसे समझकर तथा उचित उपाय अपनाकर इसका सामना करना चाहिए। परन्तु वास्तविक फल का निर्णय तो सदैव संपूर्ण जन्मकुंडली, शनि की स्थिति, दशा और गोचर के आधार पर ही किया जाता है।।

साढ़ेसाती का सामान्य स्वरूप एवं गणना।। General Nature and Calculation of Sade Sati.

मित्रों, साढ़ेसाती की गणना सदैव जातक की जन्म-कुंडली में स्थित चंद्रमा की राशि से की जाती है, न कि लग्न से। अर्थात यदि किसी जातक का जन्म-चंद्रमा वृषभ राशि में हो, तो साढ़ेसाती का आरंभ तब होगा जब गोचर का शनि मेष राशि में प्रवेश करेगा। यह गणना पद्धति अत्यंत सूक्ष्म तथा सटीक मानी जाती है। इसलिए साढ़ेसाती जानने के लिए सबसे पहले अपनी जन्म-कुंडली में चंद्र-राशि का सही ज्ञान होना आवश्यक है।।

साढ़ेसाती के दौरान शनि तीन राशियों से होकर गुजरता है। और चूँकि शनि एक राशि में लगभग ढाई वर्ष व्यतीत करता है। इसलिए तीन राशियों को पार करने में कुल साढ़े सात वर्ष का समय लगता है। यह अवधि प्रत्येक जातक के जीवन में लगभग हर तीस वर्ष के अंतराल में एक बार पुनः आती है। अर्थात सामान्यतः प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवनकाल में दो से तीन बार साढ़ेसाती का सामना करना पड़ता है।।

इस संपूर्ण अवधि की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह जातक को धैर्य, अनुशासन तथा आत्मनिरीक्षण की शिक्षा देती है। साढ़ेसाती के दौरान जो जातक धैर्य तथा सेवा-भावना अपनाते हैं। वे इस अवधि को अपेक्षाकृत सरलता से पार कर लेते हैं। जबकि जो जातक अधीरता अथवा भय के वशीभूत होकर गलत निर्णय लेते हैं। उन्हें अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।।

साढ़ेसाती का प्रथम चरण अर्थात आरोही चरण।। First Phase of Sade Sati – The Rising Phase.

मित्रों, साढ़ेसाती का प्रथम चरण, जिसे आरोही अथवा प्रारंभिक चरण कहा जाता है। यह तब आरंभ होता है जब शनि जन्म-चंद्रमा से बारहवीं राशि में प्रवेश करता है। यह चरण लगभग ढाई वर्ष की अवधि का होता है। और यह मुख्य रूप से जातक के व्यय, मानसिक चिंता, नींद तथा एकांतवास की प्रवृत्ति को प्रभावित करता है। इस चरण में जातक को अनावश्यक व्यय अथवा वित्तीय दबाव का अनुभव हो सकता है।।

इस चरण के दौरान जातक के मन में अकारण भय, अनिद्रा अथवा मानसिक बेचैनी की स्थिति भी उत्पन्न होती है। परिवार से दूरी अथवा विदेश-यात्रा जैसी परिस्थितियाँ भी इसी चरण में सामान्यतः देखी जाती हैं। इस समय जातक को अपने खर्चों पर नियंत्रण रखने तथा अनावश्यक जोखिम लेने से बचने की सलाह दी जाती है। क्योंकि यह चरण भविष्य की चुनौतियों के लिए मानसिक रूप से तैयार करने वाला माना जाता है।।

यद्यपि यह चरण अपेक्षाकृत कम तीव्रता का माना जाता है। फिर भी इसे पूर्णतः हल्के में नहीं लेना चाहिए। इस अवधि में सेवा-भावना, दान तथा ध्यान जैसी गतिविधियाँ अपनाने से जातक इस चरण को अधिक सरलता से पार कर लेता है। यही आरंभिक चरण आगे आने वाले मध्य चरण के लिए जातक को धैर्य तथा सजगता प्रदान करता है।।

साढ़ेसाती का द्वितीय चरण अर्थात मध्य चरण।। Second Phase of Sade Sati – The Peak Phase.

मित्रों, साढ़ेसाती का द्वितीय अर्थात मध्य चरण तब आरंभ होता है, जब शनि स्वयं जन्म-चंद्रमा की राशि में प्रवेश करता है। यह चरण संपूर्ण साढ़ेसाती का सबसे तीव्र तथा सबसे अधिक चुनौतीपूर्ण चरण माना जाता है। क्योंकि इस दौरान शनि सीधे मन के कारक चंद्रमा को अपनी दृष्टि तथा प्रभाव से घेर लेता है। इस चरण में जातक को मानसिक तनाव, भावनात्मक अस्थिरता तथा स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।।

इस चरण के दौरान जातक के करियर, पारिवारिक संबंधों तथा स्वास्थ्य तीनों ही क्षेत्रों में उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है। कई बार दीर्घकालिक बीमारियाँ, संबंधों में तनाव अथवा व्यावसायिक अस्थिरता जैसी परिस्थितियाँ भी इसी चरण में उत्पन्न होती हैं। इसी कारण इस चरण को साढ़ेसाती का सबसे कठिन तथा सर्वाधिक सजगता की मांग करने वाला चरण माना गया है।।

परन्तु मित्रों, यह भी उतना ही सत्य है कि यही चरण जातक को सबसे अधिक परिपक्वता, आत्मानुशासन तथा जीवन के प्रति यथार्थवादी दृष्टिकोण भी प्रदान करता है। जो जातक इस अवधि में धैर्य, सेवा-भावना तथा ईमानदार परिश्रम बनाए रखते हैं। वे इस चरण के पश्चात जीवन में असाधारण स्थिरता तथा सफलता प्राप्त करते हैं। यदि जन्मकुंडली में शनि बलवान हो, तो यह चरण दीर्घकालिक उपलब्धि का आधार भी बन जाता है।।

साढ़ेसाती का तृतीय चरण अर्थात अवरोही चरण।। Third Phase of Sade Sati – The Setting Phase.

मित्रों, साढ़ेसाती का तृतीय अर्थात अवरोही चरण तब आरंभ होता है, जब शनि जन्म-चंद्रमा से दूसरी राशि में प्रवेश करता है। यह चरण मुख्य रूप से जातक के वाणी, परिवार, धन-संचय तथा भोजन संबंधी आदतों को प्रभावित करता है। इस चरण में जातक को कभी-कभी वाणी संबंधी विवाद अथवा पारिवारिक असहमति का सामना करना पड़ता है।।

इस चरण के दौरान वित्तीय स्थिति में भी कुछ उतार-चढ़ाव देखा जा सकता है। विशेषकर संचित धन के व्यय अथवा पारिवारिक दायित्वों के कारण। कुछ जातकों को इस अवधि में नेत्र अथवा मुख संबंधी स्वास्थ्य समस्याओं का भी अनुभव होता है। परन्तु सामान्यतः यह चरण प्रथम तथा द्वितीय चरण की तुलना में अपेक्षाकृत सरल तथा राहत देनेवाला माना जाता है। क्योंकि इस समय तक जातक अपने भीतर पर्याप्त अनुशासन तथा परिपक्वता विकसित कर चुका होता है।।

यह चरण साढ़ेसाती के समापन की ओर संकेत करता है। तथा जातक को धीरे-धीरे राहत तथा स्थिरता का अनुभव होने लगता है। इस अवधि में वाणी में संयम तथा परिवार के प्रति सहनशीलता बनाए रखना विशेष रूप से लाभकारी सिद्ध होता है। इस चरण के समापन के साथ ही साढ़ेसाती की संपूर्ण साढ़े सात वर्ष की यात्रा भी पूर्ण हो जाती है।।

साढ़ेसाती किन जातकों के लिए अधिक कष्टकारी होती है।। Whom Does Sade Sati Affect More Severely.

मित्रों, साढ़ेसाती का फल सभी जातकों के लिए समान नहीं होता, अपितु यह जन्मकुंडली में शनि की स्थिति, बल तथा भाव-स्वामित्व पर निर्भर करता है। सामान्य मान्यताओं के अनुसार वृषभ, सिंह तथा धनु राशि के जातकों के लिए प्रथम चरण, मेष, कर्क तथा वृश्चिक राशि के जातकों के लिए मध्य चरण, तथा मिथुन, तुला एवं मीन राशि के जातकों के लिए अवरोही चरण अपेक्षाकृत अधिक चुनौतीपूर्ण माना जाता है।।

इसके विपरीत यदि जन्मकुंडली में शनि स्वयं शुभ भाव का स्वामी हो अथवा बलवान स्थिति में हो, तो साढ़ेसाती उतनी कष्टकारी नहीं रहती। अपितु यह जातक को परिश्रम के बल पर असाधारण सफलता भी प्रदान कर देती है। इसी कारण यह कहना उचित नहीं कि साढ़ेसाती सभी के लिए समान रूप से अशुभ ही होगी। प्रत्येक जातक की कुंडली का पृथक अध्ययन करना अत्यंत आवश्यक होता है।।

साढ़ेसाती को शांतिपूर्वक पार करने के वैदिक उपाय।। Vedic Remedies to Peacefully Overcome Sade Sati.

मित्रों, साढ़ेसाती को शांतिपूर्वक तथा संतुलित रूप से पार करने के लिए शनि देवता के इन प्रमुख मंत्रों में से किसी एक अथवा एक से अधिक मंत्रों का श्रद्धापूर्वक नियमित जप करना चाहिए। बीज मंत्र “ॐ शं शनैश्चराय नमः”, वैदिक मंत्र “ॐ नीलांजन समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्। छायामार्तण्ड सम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम्॥” तथा शनि गायत्री मंत्र “ॐ काकध्वजाय विद्महे खड्गहस्ताय धीमहि तन्नो मन्दः प्रचोदयात्” इनमें से किसी एक मन्त्र का जप करने से शनि की पीड़ा को शांत करने में विशेष रूप से सहायक सिद्ध होता है।।

शनिवार के दिन हनुमान चालीसा का पाठ करना, शनि मंदिर में जाकर सरसों के तेल का दीपक जलाना तथा काले तिल, काले वस्त्र, लोहा अथवा उड़द की दाल का दान करना भी अत्यंत शुभ फलदायी माना जाता है। पीपल के वृक्ष में प्रतिदिन जल अर्पित करना तथा शनिवार के दिन व्रत रखना भी साढ़ेसाती के दुष्प्रभाव को कम करने में सहायक सिद्ध होता है। वृद्धजनों, रोगियों तथा असहायों की सेवा करना भी इस अवधि के लिए सर्वाधिक शुभ आचरण माना गया है।।

और मेरी सलाह तो यही रहेगी कि इन उपायों को केवल औपचारिकता के लिए नहीं, बल्कि पूर्ण श्रद्धा, अनुशासन तथा निरंतरता के साथ करना चाहिए। तभी इनका वास्तविक फल प्राप्त होता है। सत्य-निष्ठा बनाए रखना चाहिए। अनावश्यक विवादों से बचना तथा धैर्यपूर्वक अपने कर्तव्यों का पालन करना भी साढ़ेसाती को शांतिपूर्वक पार करने का सबसे स्वाभाविक तथा प्रभावी उपाय माना गया है।।

शास्त्रीय प्रमाण।। Scriptural References.

मित्रों, बृहत्पाराशर होरा शास्त्र में शनि को न्याय, कर्मफल तथा दीर्घकालिक परिणाम का प्रमुख कारक ग्रह बताया गया है। फलदीपिका के अनुसार चंद्र-राशि के इर्द-गिर्द होने वाला यह साढ़े सात वर्ष का गोचर जातक के मानसिक तथा भावनात्मक जीवन पर गहरा प्रभाव डालता है। तथा इसका फल जन्मकुंडली में शनि की मूल स्थिति के अनुसार ही निर्धारित होता है।।

सारावली में भी यह स्पष्ट किया गया है कि साढ़ेसाती स्वयं में अशुभ नहीं, अपितु कर्मफल की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। तथा यह भी उल्लेख मिलता है कि इसका अंतिम फलादेश जन्मकुंडली में शनि की राशि, भाव-स्वामित्व, दृष्टि-संबंध तथा संपूर्ण जन्मकुंडली के समन्वित अध्ययन के पश्चात ही निश्चित किया जाना चाहिए।।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न।। Frequently Asked Questions. (FAQ)

प्रश्न 1. शनि की साढ़ेसाती कितने वर्ष की होती है। How Long Does Shani Sade Sati Last.

उत्तर:- शनि की साढ़ेसाती कुल साढ़े सात वर्ष की होती है। तथा यह तीन चरणों में विभाजित होती है। जिसमें प्रत्येक चरण लगभग ढाई वर्ष का होता है।।

प्रश्न 2. साढ़ेसाती के तीनों चरणों में से सबसे कठिन चरण कौन-सा है। Which Phase of Sade Sati Is Considered Most Challenging.

उत्तर:- सामान्यतः द्वितीय अर्थात मध्य चरण को सबसे अधिक तीव्र तथा चुनौतीपूर्ण माना जाता है। क्योंकि इस दौरान शनि सीधे जन्म-चंद्रमा की राशि में स्थित होता है।।

प्रश्न 3. साढ़ेसाती की गणना किस आधार पर की जाती है। How Is Sade Sati Calculated.

उत्तर:- साढ़ेसाती की गणना सदैव जन्मकुंडली में स्थित चंद्रमा की राशि के आधार पर की जाती है, न कि लग्न राशि के आधार पर।।

प्रश्न 4. क्या साढ़ेसाती सदैव अशुभ ही होती है। Is Sade Sati Always Inauspicious.

उत्तर:- नहीं, यदि जन्मकुंडली में शनि बलवान अथवा शुभ स्थिति में हो, तो साढ़ेसाती जातक को अनुशासन, परिश्रम तथा दीर्घकालिक सफलता की ओर भी अग्रसर करती है।।

प्रश्न 5. साढ़ेसाती के दुष्प्रभाव को कम करने का सबसे प्रभावी वैदिक उपाय क्या है। What Is the Most Effective Vedic Remedy to Reduce the Effects of Sade Sati.

उत्तर:- शनि देवता के मंत्रों का जप, शनिवार को हनुमान चालीसा का पाठ, सरसों के तेल का दान तथा वृद्धजनों एवं असहायों की सेवा करना ज्योतिषीय दृष्टिकोण से सबसे प्रभावी उपाय माने जाते हैं।।

लेख का निष्कर्ष।। Conclusion.

मित्रों, शनि की साढ़ेसाती साढ़े सात वर्ष की एक ऐसी गोचर-अवधि है, जो जातक को आरोही, मध्य तथा अवरोही तीन चरणों से होकर गुजारती है। जहाँ प्रथम चरण व्यय तथा मानसिक चिंता को, द्वितीय चरण स्वास्थ्य तथा संबंधों को, तथा तृतीय चरण वाणी एवं परिवार को प्रभावित करता है। यह संपूर्ण अवधि हमें यह सिखाती है कि धैर्य, अनुशासन तथा सेवा-भावना के बल पर कोई भी कठिन समय सरलता से पार किया जा सकता है।।

वैदिक ज्योतिष के अनुसार शनि देवता के मंत्रों का जप, शनिवार का व्रत, दान तथा असहायों की सेवा इस अवधि को संतुलित एवं शांतिपूर्ण बनाने में सहायक माना गया है। और यहाँ मैं यही कहूँगा कि साढ़ेसाती से भयभीत होने के बजाय इसे आत्म-विकास के एक अवसर के रूप में स्वीकार करना चाहिए। क्योंकि यही दृष्टिकोण इस अवधि का सबसे बड़ा उपाय भी है और सबसे बड़ा गुण भी।।

जो जातक इस साढ़े सात वर्ष की अवधि को धैर्य तथा सजगता के साथ व्यतीत कर लेता है। वह अपने जीवन में एक नई परिपक्वता तथा स्थिरता प्राप्त करता है। परन्तु मेरी आपको यही सलाह है कि किसी भी विशेष उपाय अथवा निर्णायक निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले किसी विद्वान, योग्य, अनुभवी वैदिक ज्योतिषी से अपनी संपूर्ण जन्मकुंडली का विश्लेषण विधिपूर्वक अवश्य करवाना चाहिए। ताकि सही एवं व्यक्तिगत मार्गदर्शन प्राप्त हो सके।।

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