अस्पताल हेतु भूमि चयन तथा निर्माण का वास्तु।। Vastu for Hospital Construction.
लेख का परिचय।। Introduction.
मित्रों, अस्पताल वह पवित्र तथा संवेदनशील स्थान होता है। जहाँ रोगी अपने स्वास्थ्य-लाभ की आशा लेकर आता है। तथा जहाँ डॉक्टर, नर्स तथा समस्त चिकित्सा-स्टाफ दिन-रात रोगियों की सेवा में जुटे रहते हैं। ऐसे संवेदनशील स्थान की ऊर्जा जितनी अधिक सकारात्मक तथा संतुलित होगी, रोगियों को उतना ही शीघ्र तथा प्रभावी स्वास्थ्य-लाभ प्राप्त होने की संभावना बढ़ जाती है।।
ऐसा वास्तु शास्त्र में स्पष्ट रूप से बताया गया है। यही कारण है कि अस्पताल जैसे भवनों के निर्माण में वास्तु शास्त्र के नियमों का पालन करना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। क्योंकि यहाँ केवल भवन की सुंदरता ही नहीं, बल्कि मानव-जीवन तथा स्वास्थ्य से जुड़ी अत्यंत गंभीर तथा संवेदनशील गतिविधियाँ भी संचालित होती हैं।।
मित्रों, यह समझना भी आवश्यक है कि अस्पताल में विभिन्न विभाग, जैसे आपातकालीन विभाग, ऑपरेशन थियेटर, वार्ड, फार्मेसी तथा प्रयोगशाला। यह सभी अलग-अलग प्रकार की ऊर्जाओं से जुड़े होते हैं। तथा हर विभाग के लिए वास्तु में अलग-अलग दिशा-निर्देश बताए गए हैं। जहाँ आपातकालीन विभाग तथा ऑपरेशन थियेटर में तीव्र तथा सक्रिय ऊर्जा की आवश्यकता होती है।।
वहीं वार्ड तथा विश्राम-कक्षों में शांत तथा स्थिर ऊर्जा आवश्यक मानी जाती है। इसी प्रकार जहाँ दवाइयों का भंडारण होता है। वहाँ शुद्धता तथा संरक्षण की ऊर्जा आवश्यक है, जबकि प्रशासनिक कार्यों के लिए स्थिरता तथा निर्णय-क्षमता से जुड़ी ऊर्जा आवश्यक मानी जाती है। इन सभी भिन्न-भिन्न आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए ही अस्पताल की संपूर्ण वास्तु-योजना तैयार की जानी चाहिए।।
मित्रों, आज इस लेख में हम विस्तार से समझेंगे कि अस्पताल के लिए भूमि तथा दिशा का चयन किस प्रकार करें। मुख्य द्वार, रिसेप्शन तथा प्रतीक्षालय की सही व्यवस्था क्या होनी चाहिए। वार्ड, ऑपरेशन थियेटर तथा आईसीयू जैसे संवेदनशील क्षेत्रों का वास्तु किस प्रकार होना चाहिए। फार्मेसी, प्रयोगशाला तथा प्रशासनिक कक्षों को कहाँ बनाएं।।
डॉक्टर तथा स्टाफ के कक्षों की व्यवस्था किस प्रकार करें। तथा रंग, प्रकाश एवं स्वच्छता का भी इस पूरे भवन में क्या महत्व है। यह जानकारी उन सभी लोगों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी। जो लोग अस्पताल अथवा किसी भी प्रकार के चिकित्सा-प्रतिष्ठान की स्थापना अथवा विस्तार की योजना बना रहे हैं।।
भूमि तथा दिशा का चयन।। Selection Of Land And Direction.
मित्रों, अस्पताल के लिए भूमि का चयन करते समय सबसे पहले यह ध्यान रखना चाहिए कि भूमि का आकार वर्गाकार अथवा आयताकार हो। तथा उसमें किसी प्रकार का असामान्य कोण, कटाव अथवा त्रिकोणीय आकृति ना हो। क्योंकि इसे संस्थान की स्थिरता तथा दीर्घकालिक सफलता के लिए अत्यंत आवश्यक माना जाता है।।
भूमि पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर थोड़ी ढलान वाली होनी चाहिए। क्योंकि इसे सकारात्मक ऊर्जा के प्रवाह के लिए उपयुक्त माना जाता है। इसके साथ ही भूमि के आस-पास शांत तथा प्रदूषण-रहित वातावरण होना चाहिए। क्योंकि अस्पताल जैसे संवेदनशील स्थान के लिए शोर-शराबा तथा प्रदूषण दोनों ही हानिकारक माने जाते हैं।।
मित्रों, अस्पताल के मुख्य भवन की दिशा का चयन करते समय पूर्व, उत्तर अथवा ईशान कोण को सर्वाधिक शुभ माना जाता है। क्योंकि यह दिशाएं सकारात्मक ऊर्जा, उपचार-शक्ति तथा आध्यात्मिक संबल से जुड़ी मानी जाती हैं। इसके साथ ही भवन के चारों ओर पर्याप्त खुली जगह होनी चाहिए। ताकि एम्बुलेंस तथा अन्य वाहनों का सुगम आवागमन संभव हो सके। इसलिए कि आपातकालीन स्थिति में भी किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न ना हो। पर्याप्त पार्किंग तथा हरियाली की व्यवस्था भी भूमि-चयन के समय ध्यान में रखनी चाहिए। क्योंकि इससे परिसर का वातावरण अधिक शांत तथा सुखद बनता है।।
यह भी ध्यान रखना चाहिए कि भूमि के निकट कोई श्मशान-घाट, कब्रिस्तान अथवा नकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न करने वाला स्थान ना हो। क्योंकि इसे उपचार-प्रक्रिया के लिए बाधक माना जाता है। इसके विपरीत यदि भूमि के निकट कोई मंदिर, हरा-भरा पार्क अथवा जल-स्रोत हो, तो इसे अत्यंत शुभ माना जाता है। क्योंकि यह वातावरण को शांत तथा सकारात्मक बनाता है। जो रोगियों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक प्रभाव डालता है। इसलिए अस्पताल के लिए भूमि का चयन करते समय केवल सुविधा अथवा लागत ही नहीं। अपितु इन सभी वास्तु-संबंधी पहलुओं पर भी गहनता से विचार करना आवश्यक होता है।।
मुख्य द्वार, रिसेप्शन तथा प्रतीक्षालय का वास्तु।। Vastu For Main Entrance, Reception And Waiting Area.
मित्रों, अस्पताल के मुख्य द्वार को उत्तर, पूर्व अथवा उत्तर-पूर्व दिशा में रखना सर्वाधिक शुभ माना जाता है। क्योंकि यह दिशाएं सकारात्मक तथा उपचारात्मक ऊर्जा के प्रवेश के लिए सर्वाधिक अनुकूल मानी जाती हैं। द्वार पर्याप्त चौड़ा तथा खुला होना चाहिए। ताकि स्ट्रेचर तथा व्हीलचेयर आसानी से आ-जा सकें, तथा आपातकालीन स्थिति में किसी प्रकार की रुकावट उत्पन्न ना हो। द्वार के दोनों ओर हरे-भरे पौधे लगाना तथा वहाँ स्वच्छता बनाए रखना, अस्पताल की पहली छाप को सकारात्मक बनाने में सहायक होता है। जो रोगी तथा उनके परिजनों के मन में विश्वास तथा सुरक्षा का भाव उत्पन्न कर सके।।
अस्पताल का रिसेप्शन तथा पंजीकरण-काउंटर को मुख्य द्वार के निकट, उत्तर अथवा पूर्व दिशा में बनाना उपयुक्त माना जाता है। क्योंकि यह वह स्थान है जहाँ रोगी सबसे पहले संपर्क करता है। तथा यहाँ की व्यवस्था तथा व्यवहार उसके संपूर्ण अनुभव को प्रभावित करता है। रिसेप्शन पर बैठने वाले कर्मचारी का मुख द्वार की ओर होना चाहिए। ताकि आने वाले रोगियों का तुरंत तथा उचित मार्गदर्शन किया जा सके। रिसेप्शन क्षेत्र को सदैव स्वच्छ, सुव्यवस्थित तथा शांत रखना चाहिए। क्योंकि यहाँ आने वाले अधिकतर रोगी तथा उनके परिजन पहले से ही चिंतित अथवा तनावग्रस्त अवस्था में होते हैं। इसलिए यहाँ का वातावरण जितना अधिक सुखद तथा व्यवस्थित होगा, उनका मानसिक तनाव भी उतना ही कम होगा।।
मित्रों, प्रतीक्षालय अर्थात रोगियों तथा उनके परिजनों के बैठने का स्थान, रिसेप्शन के निकट परंतु पश्चिम अथवा उत्तर-पश्चिम दिशा में बनाना उपयुक्त माना जाता है। क्योंकि यह दिशाएं प्रतीक्षा तथा धैर्य से जुड़ी मानी जाती हैं। प्रतीक्षालय में पर्याप्त बैठने की व्यवस्था, अच्छी रोशनी तथा वायु-संचार होना चाहिए। तथा वहाँ शांत एवं सुखदायक रंगों का प्रयोग करना चाहिए। ताकि प्रतीक्षा कर रहे लोगों का तनाव कम हो सके। इसके साथ ही प्रतीक्षालय में हल्का सुखद संगीत बजाना, तथा वहाँ स्वास्थ्य-संबंधी सकारात्मक जानकारी प्रदर्शित करना भी वातावरण को अधिक सहज तथा सकारात्मक बनाने में सहायक सिद्ध होता है।।
वार्ड, ऑपरेशन थियेटर तथा आईसीयू का वास्तु।। Vastu For Wards, Operation Theatre And ICU.
मित्रों, रोगी-वार्ड को उत्तर, पूर्व अथवा उत्तर-पूर्व दिशा में बनाना सर्वाधिक शुभ माना जाता है। क्योंकि यह दिशाएं उपचार तथा शीघ्र स्वास्थ्य-लाभ के लिए अत्यंत अनुकूल मानी जाती हैं। वार्ड में बिस्तरों को इस प्रकार व्यवस्थित करना चाहिए कि रोगी का सिर पूर्व अथवा दक्षिण दिशा की ओर हो। तथा प्रत्येक बिस्तर के बीच पर्याप्त दूरी हो, ताकि हवा का प्रवाह सुचारू रूप से बना रहे। वार्ड में पर्याप्त प्राकृतिक प्रकाश तथा वायु-संचार की व्यवस्था भी अत्यंत आवश्यक मानी जाती है। क्योंकि यह रोगियों के मानसिक तथा शारीरिक स्वास्थ्य दोनों पर सकारात्मक प्रभाव डालती है।।
ऑपरेशन थियेटर को अस्पताल के दक्षिण-पूर्व अर्थात आग्नेय कोण में बनाना सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है। क्योंकि यह अग्नि तत्व की दिशा है, तथा शल्य-चिकित्सा जैसी तीव्र तथा सक्रिय प्रक्रिया के लिए इस दिशा की ऊर्जा सर्वाधिक अनुकूल मानी जाती है। ऑपरेशन थियेटर में ऑपरेशन-टेबल इस प्रकार रखनी चाहिए कि रोगी का सिर पूर्व अथवा दक्षिण दिशा की ओर हो। तथा डॉक्टर और सर्जन का मुख पूर्व दिशा की ओर हो। इस क्षेत्र में पूर्ण स्वच्छता, उचित तापमान-नियंत्रण तथा उपकरणों की सुव्यवस्थित रखरखाव भी वास्तु के साथ-साथ अत्यंत आवश्यक मानी जाती है।।
मित्रों, गहन चिकित्सा इकाई अर्थात आईसीयू को अस्पताल के मध्य भाग अथवा उत्तर दिशा में बनाना सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है। क्योंकि यह स्थान अत्यंत गंभीर रोगियों के लिए होता है। जहाँ अधिकतम शांति, स्वच्छता तथा नियंत्रित वातावरण की आवश्यकता होती है। आईसीयू में बिस्तरों की व्यवस्था इस प्रकार करनी चाहिए कि चिकित्सा-स्टाफ को रोगी की निरंतर निगरानी करने में कोई बाधा ना हो। तथा वहाँ अनावश्यक शोर तथा तीव्र प्रकाश से भी बचना चाहिए। इसके साथ ही आईसीयू में सकारात्मक तथा शांत ऊर्जा बनाए रखने के लिए वहाँ हल्के तथा सौम्य रंगों का प्रयोग करना। तथा नियमित रूप से स्वच्छता बनाए रखना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।।
फार्मेसी, लैब तथा प्रशासनिक कक्ष का वास्तु।। Vastu For Pharmacy, Lab And Administrative Rooms.
मित्रों, अस्पताल की फार्मेसी अर्थात दवाइयों के भंडारण तथा वितरण का स्थान, उत्तर अथवा पश्चिम दिशा में बनाना उपयुक्त माना जाता है। क्योंकि यह दिशाएं संरक्षण तथा स्थिरता से जुड़ी मानी जाती हैं। फार्मेसी में दवाइयों को व्यवस्थित तथा वर्गीकृत ढंग से रखना चाहिए। तथा वहाँ पर्याप्त शीतलन तथा वायु-संचार की व्यवस्था भी होनी चाहिए। ताकि दवाइयों की गुणवत्ता बनी रहे। फार्मेसी काउंटर पर बैठने वाले कर्मचारी का मुख उत्तर अथवा पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए। तथा वहाँ नकदी अथवा बिल-भुगतान से जुड़ी व्यवस्था उत्तर दिशा में रखना धन-संबंधी स्थिरता के लिए शुभ माना जाता है।।
चिकित्सा प्रयोगशाला अर्थात लैब को दक्षिण-पूर्व अथवा पश्चिम दिशा में बनाना उपयुक्त माना जाता है। क्योंकि यहाँ विभिन्न रासायनिक परीक्षण तथा तकनीकी उपकरणों का उपयोग होता है। जिनके लिए स्थिरता तथा सुरक्षा दोनों आवश्यक मानी जाती हैं। लैब में उपकरणों की व्यवस्था इस प्रकार करनी चाहिए कि कर्मचारियों को कार्य करते समय पर्याप्त स्थान तथा प्रकाश उपलब्ध हो। तथा वहाँ संक्रमण-नियंत्रण के सभी आवश्यक मानकों का पूर्ण रूप से पालन किया जाए। प्रशासनिक कक्ष, जहाँ अस्पताल के प्रबंधन से जुड़े कार्य होते हैं। उसे दक्षिण-पश्चिम अर्थात नैऋत्य कोण में बनाना उपयुक्त माना जाता है। क्योंकि यह कोण स्थिरता तथा अधिकार का प्रतीक माना जाता है।।
मित्रों, प्रशासनिक कक्ष में मुख्य अधिकारी की मेज़ इस प्रकार रखनी चाहिए कि बैठते समय उसकी पीठ दीवार की ओर तथा मुख द्वार की ओर हो। ताकि वह संपूर्ण प्रशासनिक कार्यों पर बेहतर तरीके से नियंत्रण में रख सके। इसके साथ ही महत्वपूर्ण दस्तावेज़ तथा रिकॉर्ड-रूम को उत्तर अथवा पश्चिम दिशा में बनाना उपयुक्त माना जाता है। ताकि यह सुरक्षित तथा सुव्यवस्थित रह सके। प्रशासनिक क्षेत्र में अत्यधिक अव्यवस्था अथवा कागज़ों का अनावश्यक ढेर नहीं होना चाहिए। क्योंकि इसे निर्णय-क्षमता तथा कार्यकुशलता में बाधा डालने वाला माना जाता है।।
डॉक्टर तथा स्टाफ कक्ष का वास्तु।। Vastu For Doctor’s And Staff Rooms.
मित्रों, डॉक्टरों के परामर्श-कक्ष को पूर्व अथवा उत्तर दिशा में बनाना सर्वाधिक शुभ माना जाता है। क्योंकि यह दिशाएं ज्ञान, बुद्धि तथा निर्णय-क्षमता से जुड़ी मानी जाती हैं। परामर्श-कक्ष में डॉक्टर की मेज़ इस प्रकार रखनी चाहिए कि बैठते समय उसका मुख पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर हो। तथा उसकी पीठ के पीछे दीवार होनी चाहिए, ना कि खिड़की अथवा द्वार, क्योंकि इसे आत्मविश्वास तथा स्पष्ट निर्णय-क्षमता के लिए आवश्यक माना जाता है। रोगी के बैठने का स्थान डॉक्टर के सामने, इस प्रकार होना चाहिए कि दोनों के बीच सहज तथा खुला संवाद हो सके।।
नर्सिंग-स्टेशन अर्थात नर्सों के कार्य करने का स्थान, वार्ड के मध्य भाग में अथवा उत्तर दिशा में बनाना उपयुक्त माना जाता है। ताकि वहाँ से सभी रोगियों पर आसानी से निगरानी रखी जा सके। स्टाफ के विश्राम-कक्ष को पश्चिम अथवा उत्तर-पश्चिम दिशा में बनाना उचित माना जाता है। क्योंकि दीर्घकाल तक कार्य करने वाले चिकित्सा-स्टाफ के लिए यह दिशा शांति तथा विश्राम प्रदान करने वाली मानी जाती है। स्टाफ-कक्ष में पर्याप्त प्राकृतिक प्रकाश, आरामदायक बैठने की व्यवस्था तथा शांत वातावरण होना चाहिए। ताकि स्टाफ स्वयं भी मानसिक रूप से स्वस्थ तथा ऊर्जावान बना रहे।।
मित्रों, यह ध्यान रखना भी अत्यंत आवश्यक है कि जिस प्रकार रोगियों के स्वास्थ्य का ध्यान रखा जाता है। उसी प्रकार डॉक्टरों तथा स्टाफ के मानसिक तथा शारीरिक स्वास्थ्य का भी ध्यान रखना आवश्यक है। क्योंकि स्वस्थ तथा सकारात्मक स्टाफ ही रोगियों को बेहतर सेवा प्रदान कर सकता है। इसीलिए स्टाफ-कक्ष में हरे-भरे पौधे, शांत रंग तथा आरामदायक फर्नीचर की व्यवस्था करना, तथा वहाँ नियमित रूप से स्वच्छता बनाए रखना, संपूर्ण अस्पताल की कार्यक्षमता तथा वातावरण को बेहतर बनाने में सहायक सिद्ध होता है।।
रंग, प्रकाश तथा स्वच्छता का महत्व।। Importance Of Colors, Lighting And Cleanliness.
मित्रों, अस्पताल में रंगों का चयन वास्तु की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। क्योंकि रंग सीधे तौर पर रोगियों के मनोभाव तथा उपचार-प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। सामान्य क्षेत्रों तथा वार्डों में हल्के, शांत तथा सुखदायक रंगों, जैसे हल्का हरा, हल्का नीला अथवा सफेद रंग का प्रयोग करना उपयुक्त माना जाता है। क्योंकि यह रंग शांति तथा उपचार दोनों को बढ़ावा देते हैं। इसके विपरीत गहरे, भड़कीले अथवा उत्तेजक रंगों, जैसे गहरा लाल अथवा काला रंग का प्रयोग अस्पताल में करने से बचना चाहिए। क्योंकि यह रंग चिंता तथा तनाव को बढ़ाने वाले माने जाते हैं।।
प्रकाश की व्यवस्था का भी अस्पताल के वातावरण पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इसलिए हर क्षेत्र में उसकी आवश्यकता के अनुसार उचित प्रकाश-व्यवस्था होनी चाहिए। वार्डों तथा रोगी-कक्षों में पर्याप्त प्राकृतिक प्रकाश का प्रवेश सुनिश्चित करना चाहिए। क्योंकि सूर्य की रोशनी को रोगियों के शीघ्र स्वास्थ्य-लाभ के लिए अत्यंत सहायक माना जाता है। ऑपरेशन थियेटर तथा आईसीयू जैसे क्षेत्रों में उज्ज्वल परंतु आँखों को ना चुभने वाला प्रकाश होना चाहिए। ताकि चिकित्सा-कार्य सुचारू रूप से संपन्न हो सके। जबकि विश्राम-कक्षों में मंद तथा आरामदायक प्रकाश उपयुक्त माना जाता है।।
मित्रों, स्वच्छता को वास्तु शास्त्र में सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्व माना गया है। तथा अस्पताल जैसे स्थान में इसका महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है। क्योंकि यहाँ की स्वच्छता सीधे तौर पर रोगियों के स्वास्थ्य तथा सुरक्षा से जुड़ी होती है। प्रत्येक क्षेत्र, चाहे वह वार्ड हो, ऑपरेशन थियेटर हो अथवा प्रतीक्षालय, वहाँ नियमित तथा गहन सफाई की व्यवस्था होनी चाहिए। इसके साथ ही अस्पताल परिसर में हरे-भरे पौधे लगाना, जो वायु को शुद्ध करते हैं, तथा नियमित रूप से वायु-गुणवत्ता की जाँच करते रहना भी वास्तु के साथ ही स्वास्थ्य की दृष्टि से भी अत्यंत आवश्यक माना जाता है।।
ध्यान रखने योग्य कुछ ज़रूरी बातें।। A Few Important Points To Keep In Mind.
मित्रों, अस्पताल के वास्तु से जुड़े इन नियमों को अपनाते समय यह ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है कि यह सभी नियम चिकित्सा-मानकों, सुरक्षा-नियमों तथा स्वास्थ्य-विभाग के दिशा-निर्देशों के साथ-साथ अपनाए जाने चाहिए, ना कि उनके स्थान पर। वास्तु शास्त्र चिकित्सा-विज्ञान का विकल्प नहीं, बल्कि उसका पूरक माना जाता है। इसलिए किसी भी स्थिति में वास्तु के नाम पर चिकित्सा-सुरक्षा अथवा स्वच्छता के मानकों में कोई समझौता नहीं किया जाना चाहिए।।
यह भी ध्यान रखना चाहिए कि हर अस्पताल की भवन-संरचना तथा उपलब्ध स्थान भिन्न-भिन्न होता है। इसलिए सभी वास्तु-नियमों को पूर्ण रूप से लागू करना हर स्थिति में संभव नहीं हो पाता। ऐसी स्थिति में जितने अधिक नियमों का पालन संभव हो सके, उतना प्रयास करना चाहिए। तथा जिन नियमों का पालन संभव ना हो, उनके लिए उपचारात्मक वास्तु उपायों जैसे रंग, यंत्र अथवा उचित प्रबंधन का सहारा लिया जा सकता है। इसके लिए किसी अनुभवी वास्तु विशेषज्ञ से विस्तृत तथा व्यक्तिगत परामर्श लेना अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकता है।।
मित्रों, अंत में यह भी स्मरण रखें कि वास्तु के यह सिद्धांत रोगियों के शीघ्र तथा प्रभावी स्वास्थ्य-लाभ में सहायक वातावरण बनाने का कार्य करते हैं। परंतु यह चिकित्सकों की योग्यता, उपचार की गुणवत्ता तथा उचित देखभाल का विकल्प कदापि नहीं है। इसलिए वास्तु के साथ-साथ उच्च गुणवत्ता वाली चिकित्सा-सेवा, कुशल स्टाफ तथा आधुनिक उपकरणों को भी समान रूप से प्राथमिकता देनी चाहिए। ताकि अस्पताल में आने वाले हर रोगी को संपूर्ण तथा संतोषजनक उपचार प्राप्त हो सके।।
निष्कर्ष, उपचार तथा ऊर्जा का संतुलित संगम है वास्तु।। Conclusion, Vastu Is A Balanced Confluence Of Treatment And Energy.
मित्रों, तो अब स्पष्ट है कि अस्पताल जैसे संवेदनशील स्थान में वास्तु शास्त्र की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। क्योंकि यह ना केवल भवन की भौतिक संरचना को संतुलित करता है, बल्कि रोगियों के मानसिक तथा शारीरिक स्वास्थ्य, चिकित्सा-स्टाफ की कार्यक्षमता तथा संपूर्ण संस्थान की सफलता को भी गहराई से प्रभावित करता है। भूमि तथा दिशा का सही चयन, विभिन्न विभागों की उचित व्यवस्था, तथा रंग, प्रकाश एवं स्वच्छता का समुचित ध्यान, यह सभी मिलकर एक ऐसा अस्पताल बनाते हैं। जहाँ रोगी को उपचार के साथ-साथ मानसिक शांति भी प्राप्त हो सके।।
इस पूरे लेख का सार यही है कि अस्पताल का निर्माण करते समय केवल चिकित्सा-उपकरण तथा तकनीकी सुविधाओं पर ही ध्यान देना पर्याप्त नहीं होता। बल्कि भवन की ऊर्जा तथा वातावरण पर भी समान रूप से ध्यान देना आवश्यक होता है। क्योंकि यह दोनों मिलकर ही रोगी के संपूर्ण उपचार-अनुभव को निर्धारित करते हैं। इसलिए यदि आप भी अस्पताल अथवा किसी भी चिकित्सा-प्रतिष्ठान की स्थापना अथवा विस्तार की योजना बना रहे हैं, तो इन वास्तु सिद्धांतों को आरंभिक योजना के समय से ही गंभीरता से अपनाएं।।
मित्रों, हमारे पूर्वजों ने यह सिद्धांत हज़ारों वर्षों के अनुभव तथा गहन अवलोकन के आधार पर विकसित किए हैं। तथा आधुनिक युग में भी कई प्रतिष्ठित अस्पताल तथा चिकित्सा-संस्थान अपने भवन-निर्माण में वास्तु सिद्धांतों को गंभीरता से अपनाते हैं। इसलिए श्रद्धा तथा वैज्ञानिक समझदारी के साथ इन सिद्धांतों को अपनाकर, हम ऐसे अस्पतालों का निर्माण कर सकते हैं। जहाँ रोगी को उत्तम चिकित्सा-सुविधा के साथ-साथ एक शांत, सकारात्मक तथा उपचारात्मक वातावरण भी प्राप्त हो सके।।
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