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होटल एवं रेस्टोरेंट के निर्माण का वास्तु।।

होटल एवं रेस्टोरेंट के निर्माण का वास्तु।। Vastu For Hotels And Restaurants.

लेख का परिचय।। Introduction.

मित्रों, जिस प्रकार घर के लिए वास्तु शास्त्र के नियमों का पालन करना आवश्यक माना जाता है। उसी प्रकार व्यावसायिक भवनों, विशेष रूप से होटल तथा रेस्टोरेंट जैसे प्रतिष्ठानों के लिए भी वास्तु शास्त्र का विशेष महत्व बताया गया है। होटल तथा रेस्टोरेंट ऐसे स्थान हैं जहाँ प्रतिदिन सैकड़ों-हज़ारों लोगों का आना-जाना होता है। और इसीलिए यहाँ की ऊर्जा का प्रभाव ना केवल व्यवसाय की सफलता पर, बल्कि वहाँ आने वाले अतिथियों की संतुष्टि तथा अनुभव पर भी गहराई से पड़ता है। यदि होटल अथवा रेस्टोरेंट वास्तु-अनुरूप बना हो, तो वहाँ ग्राहकों की संख्या स्वाभाविक रूप से बढ़ती है। कर्मचारियों में सकारात्मकता बनी रहती है, तथा व्यवसाय में स्थिरता एवं निरंतर वृद्धि देखने को मिलती है।।

यहाँ यह भी समझना आवश्यक है कि होटल तथा रेस्टोरेंट व्यवसाय में अन्न, जल तथा अतिथि-सेवा, यह तीनों तत्व केंद्रीय भूमिका निभाते हैं। और वास्तु शास्त्र में इन तीनों से जुड़ी दिशाओं को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। जहाँ अन्न पकाया जाता है, वहाँ अग्नि तत्व प्रधान होता है। जहाँ अतिथियों का स्वागत होता है, वहाँ वायु तथा आकाश तत्व की प्रधानता आवश्यक होती है। तथा जहाँ धन का लेन-देन होता है, वहाँ पृथ्वी तथा जल तत्व दोनों का संतुलन आवश्यक माना जाता है। इसीलिए होटल अथवा रेस्टोरेंट के निर्माण में केवल सुंदर साज-सज्जा ही पर्याप्त नहीं। बल्कि दिशाओं के अनुसार सही योजना बनाना भी उतना ही महत्वपूर्ण माना जाता है।।

मित्रों, इस लेख में हम विस्तार से समझेंगे कि होटल तथा रेस्टोरेंट के लिए भूमि तथा दिशा का चयन किस प्रकार किया जाए। मुख्य द्वार तथा रिसेप्शन को कैसे व्यवस्थित करें। रसोईघर तथा डाइनिंग क्षेत्र का वास्तु किस प्रकार होना चाहिए। बैठने की व्यवस्था तथा आंतरिक साज-सज्जा में किन बातों का ध्यान रखें। कैश काउंटर तथा प्रबंधक कक्ष कहाँ बनाएं।।

होटल एवं रेस्टोरेंट में कहाँ कौन सा रंग एवं किस प्रकार के प्रकाश का चयन किस आधार पर करें। यह जानकारी उन सभी व्यवसायियों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी। जो अपने होटल अथवा रेस्टोरेंट व्यवसाय में स्थायी सफलता तथा समृद्धि प्राप्त करना चाहते हैं। यह जानकारी उनके लिए भी है, जिन्होंने अपना होटल या रेस्टोरेंट शुरू किया है परन्तु उन्नति का रास्ता ही देख रहे हैं। तथा उनको भी जिन्हें अभी इस व्यवसाय में उतरने की लालसा है।।

होटल-रेस्टोरेंट के लिए भूमि तथा दिशा का चयन।। Selection Of Land And Direction For Hotel-Restaurant.

मित्रों, होटल अथवा रेस्टोरेंट के लिए भूमि का चयन करते समय सबसे पहले यह ध्यान रखना चाहिए कि भूमि का आकार यथासंभव वर्गाकार अथवा आयताकार हो। तथा उसमें किसी प्रकार का असामान्य कोण अथवा कटाव ना हो। क्योंकि इसे व्यवसाय में स्थिरता के लिए अत्यंत आवश्यक माना जाता है। भूमि की ढलान का भी विशेष ध्यान रखना चाहिए। ढलान सदैव उत्तर अथवा पूर्व दिशा की ओर होनी चाहिए। क्योंकि इसे व्यवसाय में निरंतर वृद्धि का प्रतीक माना जाता है। इसके विपरीत यदि ढलान दक्षिण अथवा पश्चिम दिशा की ओर हो, तो इसे वास्तु दोष माना जाता है। जिसके निवारण के लिए उचित उपाय अपनाने आवश्यक होते हैं।।

होटल या रेस्टोरेंट के मुख्य भवन की दिशा का चयन करते समय पूर्व अथवा उत्तर दिशा को सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है। क्योंकि इन दिशाओं से आने वाली सूर्य की किरणें सकारात्मक ऊर्जा तथा व्यावसायिक उन्नति दोनों को बढ़ावा देती हैं। इसके साथ ही मुख्य सड़क से भवन की उचित दूरी तथा पहुँच-मार्ग की चौड़ाई पर भी ध्यान देना चाहिए। क्योंकि इसे ग्राहकों के सुगम आवागमन तथा व्यवसाय की वृद्धि से जोड़कर देखा जाता है। यदि भवन के सामने की सड़क चौड़ी तथा खुली हो, तो इसे ‘द्वार-वेध’ रहित माना जाता है। जो इस तरह के व्यवसाय के लिए अत्यंत शुभ बताया गया है।।

मित्रों, भूमि के आस-पास के वातावरण का भी विशेष ध्यान रखना चाहिए। जैसे भूमि के निकट कोई श्मशान-घाट, कूड़ा-घर अथवा नकारात्मक ऊर्जा वाला स्थान नहीं होना चाहिए। क्योंकि इसे व्यवसाय की सफलता में बाधक माना जाता है। इसके विपरीत यदि भूमि के निकट कोई जल-स्रोत, हरा-भरा पार्क अथवा मंदिर हो, तो इसे शुभ माना जाता है। क्योंकि यह वातावरण को सकारात्मक तथा आकर्षक बनाता है। जो अतिथियों को स्वाभाविक रूप से आकर्षित करने में सहायक सिद्ध होता है। इसलिए भूमि-चयन के समय केवल कीमत अथवा स्थान की उपलब्धता ही नहीं। बल्कि इन सभी वास्तु-संबंधी पहलुओं पर भी गंभीरता से विचार करना चाहिए।।

मुख्य द्वार, रिसेप्शन का वास्तु।। Vastu For Main Entrance And Reception.

मित्रों, होटल अथवा रेस्टोरेंट के मुख्य द्वार को उत्तर, पूर्व अथवा उत्तर-पूर्व दिशा में रखना सर्वाधिक शुभ माना जाता है। क्योंकि यह दिशाएं सकारात्मक ऊर्जा तथा अतिथियों के स्वागत के लिए सर्वाधिक अनुकूल मानी जाती हैं। द्वार का आकार बड़ा, आकर्षक तथा भवन के अनुपात में उचित होना चाहिए। ताकि यह दूर से ही ग्राहकों को आकर्षित कर सके। द्वार के दोनों ओर शुभ चिन्ह, तोरण अथवा सुंदर पौधे लगाना भी अत्यंत शुभ माना जाता है। तथा द्वार के सामने किसी भी प्रकार की रुकावट, जैसे खंभा अथवा पेड़ नहीं होनी चाहिए। क्योंकि इसे ग्राहकों के प्रवाह में बाधा माना जाता है।।

रिसेप्शन अर्थात स्वागत-कक्ष को मुख्य द्वार के निकट, उत्तर अथवा पूर्व दिशा में बनाना उपयुक्त माना जाता है। क्योंकि यह वह स्थान है जहाँ अतिथि सबसे पहले प्रवेश करता है। तथा यहाँ की ऊर्जा उसके संपूर्ण अनुभव को प्रभावित करती है। रिसेप्शन डेस्क इस प्रकार रखनी चाहिए कि वहाँ बैठने वाले कर्मचारी का मुख द्वार की ओर हो, ना कि पीठ, क्योंकि इससे अतिथियों का बेहतर स्वागत संभव होता है। तथा कर्मचारी में भी आत्मविश्वास बना रहता है। रिसेप्शन क्षेत्र को सदैव उज्ज्वल, स्वच्छ तथा अच्छी तरह सजाया हुआ रखना चाहिए। क्योंकि यह अतिथि पर पहली छाप डालने वाला स्थान होता है।।

मित्रों, रिसेप्शन क्षेत्र में ताज़े फूल, आकर्षक कलाकृतियाँ अथवा हल्का सुखद संगीत बजाना भी वास्तु की दृष्टि से लाभकारी माना जाता है। क्योंकि यह अतिथियों के मन में सकारात्मक तथा स्वागत योग्य भाव उत्पन्न करता है। इसके साथ ही रिसेप्शन के निकट एक छोटा जल-स्रोत, जैसे फव्वारा अथवा एक्वेरियम रखना भी शुभ माना जाता है। क्योंकि यह समृद्धि तथा शीतलता दोनों का प्रतीक है। यह ध्यान रखना चाहिए कि रिसेप्शन क्षेत्र कभी भी अव्यवस्थित अथवा अंधकारमय ना हो। क्योंकि इससे अतिथि के मन में पहली ही मुलाकात में नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। जो आगे के व्यवसाय पर भी असर डाल सकता है।।

रसोईघर तथा डाइनिंग एरिया का वास्तु।। Vastu For Kitchen And Dining Area.

मित्रों, होटल अथवा रेस्टोरेंट में रसोईघर को दक्षिण-पूर्व अर्थात आग्नेय कोण में बनाना सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है। क्योंकि यह अग्नि तत्व की दिशा है। तथा बड़े पैमाने पर भोजन तैयार करने के लिए इस दिशा की ऊर्जा सर्वाधिक अनुकूल मानी जाती है। रसोईघर में विभिन्न गैस-चूल्हों तथा तंदूर को इस प्रकार व्यवस्थित करना चाहिए कि रसोइयों का मुख पूर्व दिशा की ओर हो। तथा वहाँ पर्याप्त वेंटिलेशन एवं वायु-निकासी की व्यवस्था हो। ताकि गर्मी तथा धुआँ आसानी से बाहर निकल सके। इसके साथ ही रसोईघर को हमेशा स्वच्छ, व्यवस्थित अथवा सुव्यवस्थित रखना चाहिए। क्योंकि यह ना केवल वास्तु बल्कि खाद्य-सुरक्षा की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।।

डाइनिंग एरिया अर्थात भोजन करने का क्षेत्र, जहाँ अतिथि बैठकर भोजन का आनंद लेते हैं। उसे पश्चिम अथवा उत्तर-पश्चिम दिशा में बनाना उपयुक्त माना जाता है। इस क्षेत्र में मेज़ों तथा कुर्सियों को इस प्रकार व्यवस्थित करना चाहिए कि पर्याप्त स्थान बना रहे। तथा अतिथियों को आरामदायक और खुला वातावरण महसूस हो। बहुत अधिक मेज़ों को एक-दूसरे के अत्यंत निकट रखने से बचना चाहिए। क्योंकि इससे ऊर्जा का प्रवाह अवरुद्ध होता है। तथा अतिथियों को असहजता महसूस हो सकती है। इसके साथ ही डाइनिंग एरिया में पर्याप्त प्राकृतिक अथवा कृत्रिम प्रकाश की व्यवस्था होनी चाहिए। ताकि वातावरण उज्ज्वल और आकर्षक बना रहे।।

मित्रों, रसोईघर तथा डाइनिंग एरिया के बीच जल-स्रोत जैसे बर्तन धोने का स्थान अथवा वॉश-बेसिन को इस प्रकार रखना चाहिए कि वह चूल्हे से पर्याप्त दूरी पर हो। ताकि अग्नि तथा जल तत्व का टकराव ना हो। इसके साथ ही डाइनिंग एरिया की सजावट में हल्के तथा भूख बढ़ाने वाले रंगों, जैसे हल्का पीला, नारंगी अथवा हरा रंग का प्रयोग करना चाहिए। क्योंकि यह रंग मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी भोजन के अनुभव को बेहतर बनाने में सहायक माने जाते हैं। साफ-सुथरी मेज़-पोश, ताज़े फूल तथा सुखद सुगंध का प्रयोग भी अतिथियों के अनुभव को सकारात्मक बनाने में सहायक सिद्ध होता है।।

बैठने की व्यवस्था तथा आंतरिक साज-सज्जा।। Seating Arrangement And Interior Decor.

मित्रों, होटल के कमरों तथा रेस्टोरेंट के बैठने की व्यवस्था में वास्तु के अनुसार कुछ महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखना आवश्यक होता है। होटल के कमरों में बिस्तर को इस प्रकार रखना चाहिए कि सोते समय अतिथि का सिर दक्षिण अथवा पूर्व दिशा की ओर हो। तथा बिस्तर के ठीक ऊपर कोई भारी शेल्फ अथवा बीम ना हो। कमरों में खिड़कियों की व्यवस्था इस प्रकार होनी चाहिए कि पर्याप्त प्राकृतिक प्रकाश तथा वायु का प्रवेश हो सके। क्योंकि इससे अतिथियों को अधिक आरामदायक तथा सुखद अनुभव प्राप्त होता है। जो होटल की समीक्षाओं तथा प्रतिष्ठा पर भी सकारात्मक प्रभाव डालता है।।

रेस्टोरेंट में बैठने की व्यवस्था करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि अधिकतर कुर्सियाँ इस प्रकार व्यवस्थित हों कि बैठने वाले व्यक्ति का मुख द्वार अथवा खुले दृश्य की ओर हो, ना कि दीवार की ओर। क्योंकि इससे अतिथियों को अधिक सहज तथा नियंत्रण का भाव महसूस होता है। इसके साथ ही यदि रेस्टोरेंट में कोई विशेष कोना अथवा वीआईपी क्षेत्र बनाया गया हो, तो उसे उत्तर-पश्चिम अथवा पश्चिम दिशा में बनाना उपयुक्त माना जाता है। क्योंकि यह दिशाएं शांति तथा एकांत का अनुभव प्रदान करती हैं।।

मित्रों, आंतरिक साज-सज्जा में प्राकृतिक सामग्री जैसे लकड़ी, बांस अथवा प्राकृतिक पत्थर का प्रयोग करना वास्तु की दृष्टि से लाभकारी माना जाता है। क्योंकि यह पृथ्वी तत्व को सशक्त बनाता है। इसके साथ ही दीवारों पर सुंदर तथा सकारात्मक चित्रकारी, जैसे प्राकृतिक दृश्य, फूल अथवा शुभ प्रतीक लगाना उचित माना जाता है। जबकि युद्ध, हिंसा अथवा उदासी दर्शाने वाली तस्वीरों को लगाने से बचना चाहिए। दर्पणों का उपयोग भी सोच-समझकर करना चाहिए। विशेष रूप से भोजन-क्षेत्र में दर्पण को इस प्रकार लगाना चाहिए कि उसमें भोजन की मेज़ का प्रतिबिंब दिखे। क्योंकि इसे समृद्धि तथा प्रचुरता का प्रतीक माना जाता है।।

कैश काउंटर तथा प्रबंधक कक्ष का वास्तु।। Vastu For Cash Counter And Manager’s Cabin.

मित्रों, होटल अथवा रेस्टोरेंट में कैश काउंटर अर्थात धन के लेन-देन का स्थान, उत्तर दिशा में बनाना सर्वाधिक शुभ माना जाता है। क्योंकि इस दिशा के स्वामी बुध ग्रह माने जाते हैं। जो धन तथा व्यापार के कारक ग्रह माने जाते हैं। कैश काउंटर पर बैठने वाले व्यक्ति का मुख उत्तर अथवा पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए। तथा उसकी पीठ के पीछे दीवार होनी चाहिए, ना कि द्वार अथवा खिड़की। क्योंकि इसे धन की सुरक्षा तथा स्थिरता के लिए आवश्यक माना जाता है। कैश काउंटर के निकट लक्ष्मी-गणेश की तस्वीर अथवा कुबेर यंत्र स्थापित करना भी अत्यंत शुभ माना जाता है।।

प्रबंधक अथवा मालिक का कक्ष भवन के दक्षिण-पश्चिम अर्थात नैऋत्य कोण में बनाना उपयुक्त माना जाता है। क्योंकि यह कोण स्थिरता, अधिकार तथा नियंत्रण का प्रतीक होता है। जो व्यवसाय के संचालन के लिए आवश्यक गुण माने जाते हैं। प्रबंधक की मेज़ इस प्रकार रखनी चाहिए कि बैठते समय उसकी पीठ दीवार की ओर तथा मुख द्वार की ओर हो। ताकि वह पूरे प्रतिष्ठान पर बेहतर नियंत्रण रख सके। इसके साथ ही प्रबंधक कक्ष में अत्यधिक अव्यवस्था अथवा कागज़ों का ढेर नहीं होना चाहिए। क्योंकि इसे निर्णय-क्षमता में बाधा डालने वाला माना जाता है।।

मित्रों, कैश काउंटर तथा प्रबंधक कक्ष दोनों में तिजोरी अथवा महत्वपूर्ण दस्तावेज़ रखने का स्थान उत्तर अथवा पूर्व दिशा की दीवार से सटाकर रखना चाहिए। तथा तिजोरी का द्वार उत्तर अथवा पूर्व की ओर खुलना चाहिए। तिजोरी को कभी भी खाली नहीं रखना चाहिए। तथा उसमें कुछ नकदी अथवा महत्वपूर्ण दस्तावेज़ सदैव रखे होने चाहिए। इसके अतिरिक्त प्रबंधक कक्ष में हरे रंग के पौधे अथवा सजावटी वस्तुएं रखना भी व्यावसायिक वृद्धि तथा स्थिरता के लिए शुभ माना जाता है। जो प्रबंधक के निर्णयों में स्पष्टता तथा सकारात्मकता लाने में सहायक सिद्ध होता है।।

रंग, प्रकाश तथा अन्य तत्वों का महत्व।। Importance Of Colors, Lighting And Other Elements.

मित्रों, होटल तथा रेस्टोरेंट में रंगों का चयन वास्तु की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। क्योंकि रंग सीधे तौर पर अतिथियों के मनोभाव तथा अनुभव को प्रभावित करते हैं। रिसेप्शन तथा सामान्य क्षेत्रों में हल्के, उज्ज्वल तथा स्वागत योग्य रंगों, जैसे क्रीमी, हल्का पीला अथवा सफेद रंग का प्रयोग करना उपयुक्त माना जाता है। जबकि डाइनिंग क्षेत्र में हल्का नारंगी अथवा पीला रंग भूख बढ़ाने वाला तथा सकारात्मक माना जाता है। कमरों में शांत तथा आरामदायक रंग, जैसे हल्का नीला, हरा अथवा बेज रंग उपयुक्त बताया जाता है। क्योंकि यह अतिथियों को विश्राम तथा शांति का अनुभव करवाता है।।

प्रकाश की व्यवस्था का भी होटल तथा रेस्टोरेंट के वातावरण पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इसलिए हर क्षेत्र में उसकी आवश्यकता के अनुसार सही प्रकाश की व्यवस्था होनी चाहिए। रिसेप्शन तथा प्रवेश-द्वार पर उज्ज्वल तथा आकर्षक प्रकाश होना चाहिए। ताकि अतिथियों का स्वागत सकारात्मक ढंग से हो सके। जबकि डाइनिंग क्षेत्र में थोड़ा मंद तथा आरामदायक प्रकाश रखना उचित माना जाता है। ताकि भोजन का अनुभव अधिक सुखद हो। इसके साथ ही प्राकृतिक प्रकाश का अधिकतम उपयोग करना, विशेष रूप से दिन के समय, ऊर्जा की बचत के साथ-साथ वास्तु की दृष्टि से भी अत्यंत लाभकारी माना जाता है।।

मित्रों, इनके अतिरिक्त होटल-रेस्टोरेंट में हरे-भरे पौधों, छोटे जल-स्रोतों तथा प्राकृतिक तत्वों का समुचित प्रयोग भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। क्योंकि यह ना केवल वातावरण को सुंदर बनाते हैं, बल्कि सकारात्मक ऊर्जा को भी आकर्षित करते हैं। प्रवेश-द्वार तथा रिसेप्शन क्षेत्र में सुखद सुगंध, जैसे प्राकृतिक इत्र अथवा हल्की धुपबत्ती आदि का प्रयोग करना भी अतिथियों के अनुभव को यादगार बनाने में सहायक होता है। यह सभी छोटे-छोटे तत्व मिलकर होटल अथवा रेस्टोरेंट के समग्र वातावरण को इतना सकारात्मक तथा आकर्षक बना देते हैं कि अतिथि वहाँ बार-बार आना पसंद करते हैं। जो व्यवसाय की दीर्घकालिक सफलता के लिए अत्यंत आवश्यक होता है।।

ध्यान रखने योग्य कुछ ज़रूरी बातें।। A Few Important Points To Keep In Mind.

मित्रों, होटल तथा रेस्टोरेंट के वास्तु से जुड़े इन नियमों को अपनाते समय यह ध्यान रखना आवश्यक है कि यह सभी नियम व्यवसाय की भौतिक व्यवस्था तथा प्रबंधन के साथ-साथ अपनाए जाने चाहिए। ना कि उनके स्थान पर। केवल वास्तु के अनुरूप भवन बनाकर, यदि भोजन की गुणवत्ता, सेवा तथा स्वच्छता पर ध्यान ना दिया जाए, तो व्यवसाय में दीर्घकालिक सफलता प्राप्त करना कठिन हो जाता है। इसलिए वास्तु के साथ-साथ उच्च गुणवत्ता, अच्छी सेवा तथा स्वच्छता को भी समान रूप से प्राथमिकता देनी चाहिए।।

यहाँ यह भी ध्यान रखना चाहिए कि हर होटल अथवा रेस्टोरेंट की भवन-संरचना तथा उपलब्ध स्थान भिन्न-भिन्न होता है। इसलिए सभी नियमों को पूर्ण रूप से लागू करना हर स्थिति में संभव नहीं हो पाता। ऐसी स्थिति में जितना अधिक संभव हो सके, उतने नियमों का पालन करने का प्रयास करना चाहिए। तथा जिन नियमों का पालन संभव ना हो, उनके लिए उपचारात्मक वास्तु उपायों, जैसे रंग, दर्पण अथवा यंत्र का सहारा लिया जा सकता है। इसके लिए किसी अनुभवी वास्तु विशेषज्ञ से व्यक्तिगत परामर्श लेना कहीं अधिक उपयुक्त तथा प्रभावी सिद्ध होता है।।

निष्कर्ष, सफल आतिथ्य व्यवसाय की नींव है वास्तु।। Conclusion, Vastu Is The Foundation Of A Successful Hospitality Business.

मित्रों, तो अब स्पष्ट है कि होटल तथा रेस्टोरेंट व्यवसाय में वास्तु शास्त्र की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। क्योंकि यह ना केवल भवन की भौतिक संरचना को संतुलित करता है, बल्कि अतिथियों के अनुभव, कर्मचारियों की सकारात्मकता तथा व्यवसाय की समग्र समृद्धि को भी प्रभावित करता है। भूमि तथा दिशा का सही चयन, मुख्य द्वार तथा रिसेप्शन की उचित व्यवस्था, रसोईघर तथा डाइनिंग क्षेत्र का सही निर्माण, तथा कैश काउंटर एवं प्रबंधक कक्ष की सही दिशा, यह सभी मिलकर एक सफल तथा समृद्ध आतिथ्य व्यवसाय की नींव रखते हैं।।

मित्रों, इस पूरे लेख का सार यही है कि आज के प्रतिस्पर्धात्मक व्यावसायिक जगत में, जहाँ हर होटल तथा रेस्टोरेंट ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए निरंतर प्रयासरत रहता है। वहाँ वास्तु शास्त्र के सिद्धांत एक अतिरिक्त लाभकारी आयाम प्रदान करते हैं। यह सिद्धांत किसी बड़े निवेश की मांग नहीं करते। बल्कि सही योजना तथा जागरूकता के साथ इन्हें भवन-निर्माण के प्रारंभिक चरण में ही सम्मिलित किया जा सकता है। जिससे दीर्घकाल में व्यवसाय को उल्लेखनीय लाभ प्राप्त हो सकता है।।

मित्रों, हमारे पूर्वजों ने यह सिद्धांत हज़ारों वर्षों के अनुभव तथा अवलोकन के आधार पर विकसित किए हैं। तथा आज भी बड़े-बड़े होटल समूह तथा प्रसिद्ध रेस्टोरेंट श्रृंखलाएं अपने नए प्रतिष्ठान स्थापित करने से पूर्व वास्तु विशेषज्ञों की सलाह लेना आवश्यक समझती हैं। इसलिए यदि आप भी अपना होटल अथवा रेस्टोरेंट व्यवसाय आरंभ करने अथवा उसका विस्तार करने की योजना बना रहे हैं, तो इन वास्तु सिद्धांतों को गंभीरता से अपनाएं। ताकि आपका व्यवसाय स्थायी सफलता, समृद्धि तथा अतिथियों की संतुष्टि, तीनों प्राप्त कर सके।।

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