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 हाथ-पैर टूटने अर्थात एक्सिडेन्ट होने के योग।।

 हाथ-पैर टूटने अर्थात एक्सिडेन्ट होने के योग।। Accident and Injury Yoga in Your Horoscope.

हैल्लो फ्रेण्ड्सzzz,

मित्रों, आज हम बात करेंगे, कि कोई भी ग्रह इन्सान के हाथ-पैर अर्थात अंग-भंग कब किन स्थितियों में करता है ? कोई भी ग्रह कहीं बैठा हो और वो घर उसके शत्रु का हो तो वह क्या फल देता है? वह घर यदि छठा घर हो या फिर त्रिकोण हो या फिर 5, 7, 9 या फिर अष्टम भाव में हो जो उसके शत्रु का घर हो तो कोई ग्रह क्या फल जातक को देता है?

मित्रों, तो चलिए आपलोगों को बताते हैं, कि कोई भी ऐसा ग्रह जो किसी राशि में किसी घर में बैठा हो जो उसके शत्रु ग्रह की राशि हो और वह राशी छठे, पांचवें, नवें, सातवें घर में बैठी हो। ऐसा यह ग्रह अपने शत्रु के राशि में ही बैठा हुआ हो तो ऐसे ग्रह की जब भी आपके उपर दशा-अन्तर्दशा आएगी उस समय में यह ग्रह उस जातक के अंग और प्रत्यंग भंग होने के योग बनाता है।।

मित्रों, अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर अष्टम भाव का इसमें इतना महत्व क्यों है ? तो मित्रों, अष्टम भाव को आयु, दुर्घटना, आकस्मिक घटना, ऑपरेशन तथा शारीरिक कष्ट का भाव माना जाता है। जब कोई पापी अथवा शत्रु राशि में बैठा ग्रह इसी अष्टम भाव से संबंध बनाता है, तो वह जातक के जीवन में अकस्मात दुर्घटना, हड्डी टूटना, गिरना-पड़ना अथवा ऑपरेशन जैसी स्थिति उत्पन्न कर देता है।।

छठा भाव भी इसी प्रकार शत्रु, रोग तथा दुर्घटना का कारक माना गया है। यदि कोई ग्रह अपने शत्रु की राशि में बैठकर छठे भाव से भी जुड़ जाए, तो ऐसे ग्रह की दशा-अन्तर्दशा में जातक को शारीरिक चोट, हड्डी में फ्रैक्चर अथवा किसी दुर्घटना का सामना करना पड़ सकता है।।

किन ग्रहों की शत्रुता से बनता है यह योग ?।। Which Planetary Enmities Create This Yoga.

मित्रों, अब यह भी समझना आवश्यक है कि कौन-सा ग्रह किसके शत्रु राशि में बैठकर यह अंग-भंग योग बनाता है। जैसे सूर्य के शत्रु ग्रह शनि और शुक्र माने जाते हैं। अतः यदि सूर्य शनि अथवा शुक्र की राशि में बैठकर छठे, आठवें अथवा बारहवें भाव से संबंध बनाए, तो सूर्य की दशा-अन्तर्दशा में दुर्घटना का योग बन सकता है।।

इसी प्रकार चंद्रमा का कोई शत्रु ग्रह नहीं माना जाता, परन्तु राहु-केतु जैसी छाया ग्रहों के साथ युति होने पर चंद्रमा भी अशुभ फल देने लगता है। मंगल के शत्रु ग्रह बुध माना जाता है, अतः मंगल यदि बुध की राशि में बैठकर अष्टम भाव से संबंध बनाए, तो चोट, रक्त-विकार अथवा दुर्घटना का योग प्रबल हो जाता है।।

बुध के शत्रु ग्रह चंद्रमा माना जाता है। गुरु के शत्रु ग्रह बुध तथा शुक्र माने जाते हैं। शुक्र के शत्रु ग्रह सूर्य तथा चंद्रमा माने जाते हैं, तथा शनि के शत्रु ग्रह सूर्य, चंद्रमा तथा मंगल माने जाते हैं। जब भी ये ग्रह अपने-अपने शत्रु की राशि में बैठकर छठे, आठवें अथवा बारहवें भाव से संबंध बनाते हैं, तब इनकी दशा-अन्तर्दशा में अंग-भंग अथवा दुर्घटना का योग प्रबल हो जाता है।।

दशा-अन्तर्दशा का महत्व।। Importance of Dasha-Antardasha.

मित्रों, यह ध्यान रखने योग्य बात है, कि केवल ग्रह की स्थिति भर से दुर्घटना नहीं होती। जब तक उस पीड़ित अथवा शत्रु राशिगत ग्रह की दशा अथवा अन्तर्दशा जातक के जीवन में सक्रिय नहीं होती, तब तक यह योग सुप्त अवस्था में ही रहता है।।

जैसे ही उस ग्रह की महादशा अथवा अन्तर्दशा प्रारंभ होती है, विशेष रूप से जब उस समय गोचर में भी पापग्रहों की दृष्टि अथवा युति बन रही हो, तब यह योग सक्रिय होकर अपना फल दिखाना आरंभ कर देता है। इसी कारण ज्योतिषी सदैव दशा-अन्तर्दशा तथा गोचर दोनों का संयुक्त विश्लेषण करने की सलाह देते हैं।।

इस योग के अन्य संकेत।। Other Indicators of This Yoga.

मित्रों, इस योग की पुष्टि के लिए कुछ अन्य बिंदुओं की भी जांच करनी चाहिए। जैसे लग्नेश अथवा लग्न भाव पर पापग्रहों की दृष्टि हो। षष्ठेश, अष्टमेश अथवा द्वादशेश आपस में संबंध बना रहे हों। तृतीय भाव अर्थात पराक्रम भाव तथा उसका स्वामी भी पीड़ित हो, क्योंकि तृतीय भाव का संबंध हाथ, कंधे तथा भुजाओं से माना जाता है।।

इसी प्रकार दशम भाव तथा उसका स्वामी पीड़ित हो, तो पैरों तथा घुटनों से जुड़ी चोट का योग भी बन सकता है, क्योंकि दशम भाव का संबंध घुटनों से माना गया है। जितने अधिक बिंदु एक साथ पुष्ट होते हैं, यह योग उतना ही प्रबल एवं निश्चित माना जाता है।।

इस योग को शांत करने के वैदिक उपाय।। Vedic Remedies to Pacify This Yoga.

मित्रों, यदि किसी जातक की कुंडली में यह अंग-भंग योग पाया जाए, तो घबराने की आवश्यकता नहीं। वैदिक ज्योतिष में इसके शमन हेतु अनेक उपाय बताए गए हैं। जैसे संबंधित पीड़ित ग्रह के अनुसार उसके मंत्र का नियमित जप करना, तथा उस ग्रह से संबंधित वस्तुओं का दान करना।।

हनुमान जी की उपासना (Worship Lord Hanuman) दुर्घटना तथा अंग-भंग योग को शांत करने में विशेष रूप से प्रभावी मानी जाती है, क्योंकि हनुमान जी को संकटमोचक तथा रक्षक देवता माना गया है। शनिवार को हनुमान चालीसा का पाठ तथा सुंदरकांड का श्रवण अत्यन्त शुभ फलदायी माना गया है।।

इसके अतिरिक्त संबंधित ग्रह की दशा-अन्तर्दशा के समय विशेष सावधानी बरतनी चाहिए, जैसे वाहन चलाते समय सतर्कता, ऊँचाई वाले स्थानों पर सावधानी तथा जोखिम भरे कार्यों से यथासंभव बचाव। नवग्रह शांति पूजा अथवा संबंधित ग्रह की शांति हेतु हवन करवाना भी पारंपरिक रूप से लाभकारी माना जाता है।।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न।। FAQ.

1. अंग-भंग योग किन भावों के कारण बनता है ? Which Houses Create This Injury Yoga.

उत्तर:- मुख्य रूप से छठे, आठवें तथा बारहवें भाव से संबंध बनाने वाले शत्रु-राशिगत ग्रह इस योग को उत्पन्न करते हैं। तृतीय तथा दशम भाव की पीड़ा भी इसे प्रबल बनाती है।।

2. यह योग कब सक्रिय होकर फल देता है ? When Does This Yoga Become Active.

उत्तर:- जब उस पीड़ित अथवा शत्रु राशिगत ग्रह की महादशा अथवा अन्तर्दशा जातक के जीवन में चलती है, विशेषकर पापग्रहों के गोचर के साथ, तब यह योग सक्रिय होता है।।

3. क्या इस योग को टाला जा सकता है ? Can This Yoga Be Avoided.

उत्तर:- वैदिक उपायों तथा सावधानी से इसकी तीव्रता को कम किया जा सकता है, परन्तु पूर्ण रूप से समाप्त करना कठिन माना जाता है। योग्य ज्योतिषी से परामर्श लेना उचित रहता है।।

4. इस योग को शांत करने का सबसे प्रभावी उपाय क्या है ? Most Effective Remedy for This Yoga.

उत्तर:- संबंधित ग्रह का मंत्र जप, हनुमान जी की उपासना तथा दशा के समय विशेष सावधानी बरतना सबसे प्रभावी उपाय माना जाता है।।

5. क्या हर जातक की कुंडली में यह योग पाया जाता है ? Does Every Horoscope Have This Yoga.

उत्तर:- नहीं। यह योग केवल तभी बनता है जब कोई ग्रह अपने शत्रु की राशि में बैठकर छठे, आठवें अथवा बारहवें जैसे विशेष भावों से संबंध बनाता है। हर कुंडली में यह स्थिति नहीं पाई जाती।।

लेख का निष्कर्ष।। Conclusion.

मित्रों, इस प्रकार जब भी कोई ग्रह अपने शत्रु की राशि में बैठकर छठे, आठवें अथवा बारहवें भाव से संबंध बनाता है, तब उस ग्रह की दशा-अन्तर्दशा के समय जातक को दुर्घटना, अंग-भंग अथवा शारीरिक चोट का सामना करना पड़ सकता है।।

परन्तु वैदिक ज्योतिष में इसके शमन हेतु मंत्र-जप, दान, हनुमान उपासना तथा सावधानीपूर्ण आचरण जैसे अनेक उपाय बताए गए हैं, जिन्हें अपनाकर इस योग की तीव्रता को कम किया जा सकता है। किसी भी निष्कर्ष अथवा उपाय से पहले योग्य वैदिक ज्योतिषी से अपनी संपूर्ण जन्मकुंडली का विश्लेषण अवश्य करवाना चाहिए।।

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