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अपराध क्षमापण स्तोत्रम्।।

Aparadh Kshamapana Stotram
Aparadh Kshamapana Stotram

अपराध क्षमापण स्तोत्रम्।। Aparadh Kshamapana Stotram.

ॐ अपराधशतं कृत्वा जगदम्बेति चोच्चरेत्।
यां गतिं समवाप्नोति न तां ब्रह्मादयः सुराः॥१॥

सापराधोऽस्मि शरणं प्राप्तस्त्वां जगदम्बिके।
इदानीमनुकम्प्योऽहं यथेच्छसि तथा कुरु॥२॥

अज्ञानाद्विस्मृतेर्भ्रान्त्या यन्न्यूनमधिकं कृतम्।
तत्सर्वं क्षम्यतां देवि प्रसीद परमेश्वरि॥३॥

कामेश्वरि जगन्मातः सच्चिदानन्दविग्रहे।
गृहाणार्चामिमां प्रीत्या प्रसीद परमेश्वरि॥४॥

सर्वरूपमयी देवी सर्वं देवीमयं जगत्।
अतोऽहं विश्वरूपां त्वां नमामि परमेश्वरीम्॥५॥

यदक्षरं परिभ्रष्टं मात्राहीनञ्च यद्भवेत्।
पूर्णं भवतु तत् सर्वं त्वत्प्रसादान्महेश्वरि॥६॥

यदत्र पाठे जगदम्बिके मया
विसर्गबिन्द्वक्षरहीनमीरितम्।
तदस्तु सम्पूर्णतमं प्रसादतः
सङ्कल्पसिद्धिश्व सदैव जायताम् ॥७॥

यन्मात्राबिन्दुबिन्दुद्वितयपदपदद्वन्द्ववर्णादिहीनं
भक्त्याभक्त्यानुपूर्वं प्रसभकृतिवशात् व्यक्त्तमव्यक्त्तमम्ब।
मोहादज्ञानतो वा पठितमपठितं साम्प्रतं ते स्तवेऽस्मिन्
तत् सर्वं साङ्गमास्तां भगवति वरदे त्वत्प्रसादात् प्रसीद॥८॥

प्रसीद भगवत्यम्ब प्रसीद भक्तवत्सले।
प्रसादं कुरु मे देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते ॥९॥

॥ इति अपराधक्षमापणस्तोत्रं समाप्तम्॥

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