नवरात्रि में कन्या न मिले तो क्या करें।। Navratri Me Kanyas Na Mile To Kya Kare.
कन्या-पूजन का परिचय।। Introduction.
मित्रों, हमने पिछले लेख में अनेकों अन्य नवरात्री से जुड़े नियमों तथा सावधानियों की विस्तृत चर्चा की थी। अब नवरात्रि की नवमी अथवा अष्टमी तिथि निकट आते ही हर श्रद्धालु के मन में एक अन्य अत्यंत महत्वपूर्ण अनुष्ठान, अर्थात कन्या-पूजन की चिंता भी स्वाभाविक रूप से उठने लगती है। क्योंकि संपूर्ण नवरात्रि-साधना का यह वह सोपान माना जाता है। जिसके बिना अनुष्ठान अधूरा-सा प्रतीत होता है।।
परंतु मित्रों, आज के समय में यह एक अत्यंत सामान्य तथा स्वाभाविक समस्या बन गई है। वह यह कि शहरों में, एकल परिवारों में अथवा ऐसे मोहल्लों में जहाँ छोटी कन्याएँ अपेक्षाकृत कम होती है। वहीं नौ अथवा पर्याप्त संख्या में कन्याएँ जुटा पाना सरल नहीं रह गया है। ऐसी स्थिति में कई श्रद्धालुओं के मन में व्यर्थ का भय तथा अपराध-बोध उत्पन्न हो जाता है। मानो उनकी संपूर्ण साधना ही निष्फल हो जाएगी। जो उनकी पूजा के शुद्ध भाव को ही प्रभावित कर देता है।।
इसीलिए आज हम इसी विषय पर विस्तार से समझेंगे कि कन्या-पूजन का वास्तविक शास्त्रीय अर्थ तथा महत्व क्या है। यदि नौ कन्याएँ ना मिलें, तो कितनी संख्या में पूजन पर्याप्त माना जाता है। कन्याएँ बिल्कुल भी उपलब्ध ना हों, तो कौन-कौन से शास्त्र-सम्मत विकल्प अपनाए जा सकते हैं। तथा इस संपूर्ण अनुष्ठान में किन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए।।
कन्या-पूजन का अर्थ एवं महत्व।। Meaning And Significance Of Kanya Puja.
मित्रों, कन्या-पूजन का मूल भाव यह है कि दो से दस वर्ष तक की आयु की कन्याओं में साक्षात माँ भगवती के नौ स्वरूपों का आवाहन करके, उन्हें भोजन, वस्त्र तथा दक्षिणा अर्पित करनी चाहिए। मान्यता है कि अबोध तथा निष्कलुष कन्याओं में देवी-तत्व अत्यंत सहजता से प्रतिष्ठित होता है। क्योंकि इनके मन में अभी तक सांसारिक छल-कपट तथा विकार प्रवेश नहीं कर पाते। इसीलिए इन्हें साक्षात देवी-स्वरूप मानकर पूजना, संपूर्ण नवरात्रि-साधना का फलदायी समापन माना जाता है।।
शास्त्रों में यह भी स्पष्ट किया गया है कि कन्या-पूजन के माध्यम से साधक अपने भीतर स्त्री-शक्ति, करुणा तथा वात्सल्य के भाव को जाग्रत करता है। तथा समाज में कन्याओं के सम्मान एवं संरक्षण का संदेश भी इसी अनुष्ठान से प्रसारित होता है। यही कारण है कि केवल पूजा-विधि निभाना ही पर्याप्त नहीं माना जाता। अपितु कन्याओं के प्रति सच्चे सम्मान तथा स्नेह का भाव ही इस अनुष्ठान का वास्तविक सार माना गया है।।
यहाँ यह भी समझना आवश्यक है कि कन्या-पूजन अवश्य ही महत्वपूर्ण अंग है। परंतु यह संपूर्ण नवरात्रि-साधना की सफलता की एकमात्र कसौटी नहीं है। श्रद्धा, नियमित पूजन, मंत्र-जप तथा सात्विक आचरण, यह सभी मिलकर ही साधना को पूर्णता प्रदान करते हैं। अतः कन्याओं की अनुपलब्धता के कारण संपूर्ण साधना के निष्फल हो जाने की आशंका रखना। शास्त्र-सम्मत भय नहीं, अपितु केवल मन की अनावश्यक चिंता मात्र है।।
कितनी कन्याओं से भी पूजन संभव है।। How Many Kanyas Are Sufficient For The Puja.
मित्रों, शास्त्रों में आदर्श रूप से नौ कन्याओं के पूजन का विधान अवश्य बताया गया है। जो माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों का प्रतिनिधित्व करती हैं। परंतु यह कोई कठोर तथा अनिवार्य संख्या नहीं मानी गई है। यदि नौ कन्याएँ उपलब्ध ना हों, तो दो कन्याओं का पूजन भी पूर्ण शास्त्र-सम्मत माना जाता है। जिसमें एक कन्या को कुमारी तथा दूसरी को त्रिमूर्ति स्वरूप मानकर पूजा जाता है।।
यदि दो कन्याएँ भी ना मिल पाएँ, तो एक अकेली कन्या का पूजन भी साक्षात देवी-स्वरूप मानकर पूर्ण विधि-विधान से संपन्न किया जा सकता है। शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है कि संख्या से अधिक भाव तथा श्रद्धा का महत्व होता है। एक कन्या के चरण-स्पर्श, उसे भोजन कराना तथा यथाशक्ति दक्षिणा देना भी नौ कन्याओं के पूजन के समान ही फलदायी माना गया है। बशर्ते वह पूर्ण श्रद्धा तथा सम्मान के साथ किया जाए।।
इसके साथ ही एक व्यावहारिक उपाय यह भी अपनाया जा सकता है। वह यह कि यदि एक ही कन्या उपलब्ध हो, तो उसे नवमी के दिन अलग-अलग समय पर अथवा अष्टमी-नवमी दोनों दिन बुलाकर, संकल्पपूर्वक नौ बार पूजन का भाव पूर्ण किया जा सकता है। यह विधि भी अनेक परिवारों में प्रचलित तथा शास्त्र-सम्मत मानी जाती है।।
कन्याएँ बिल्कुल ना मिलें तो क्या विकल्प अपनाएं।। What Alternatives To Adopt If No Kanyas Are Available At All.
मित्रों, कई बार ऐसी परिस्थिति भी बन जाती है, जब आस-पड़ोस तथा परिवार में कोई भी छोटी कन्या उपलब्ध ही नहीं होती। ऐसी स्थिति में घबराने की आवश्यकता बिल्कुल भी नहीं है। क्योंकि शास्त्रों में इसके लिए भी कुछ सम्मानजनक तथा फलदायी विकल्प बताए गए हैं। सर्वप्रथम उपाय यह है कि निकटतम किसी बालिका-विद्यालय, अनाथालय अथवा बालिका-आश्रम में जाकर वहाँ कन्या-पूजन तथा सामूहिक भोजन का आयोजन करवाया जा सकता है। जिसे अत्यंत पुण्यदायी तथा समाज-हितकारी कार्य माना जाता है।।
यदि प्रत्यक्ष रूप से कन्या-पूजन किसी भी प्रकार संभव ना हो पाए। तो माता दुर्गा की प्रतिमा अथवा चित्र के समक्ष संकल्पपूर्वक मानसिक कन्या-पूजन का भाव रखते हुए हवन, आरती तथा भोग अर्पित किया जा सकता है। इस दौरान “ॐ कुमार्यै नमः” अथवा नवार्ण मंत्र “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे” का जप करते हुए मन ही मन समस्त कन्याओं के प्रति सम्मान-भाव तथा समर्पण का भाव रखना चाहिए।।
मित्रों, इसके अतिरिक्त किसी गरीब अथवा जरूरतमंद कन्या अथवा महिला को वस्त्र, भोजन-सामग्री अथवा यथाशक्ति दक्षिणा दान करना भी कन्या-पूजन के समतुल्य ही फलदायी माना गया है। कुछ परिवार इस दिन कन्याओं की शिक्षा अथवा कल्याण हेतु किसी संस्था को दान देने का संकल्प भी लेते हैं। जो आधुनिक युग में अत्यंत सार्थक तथा समाज-उपयोगी विकल्प माना जाता है।।
कन्या-पूजन की सरल एवं संपूर्ण विधि।। Simple And Complete Method Of Kanya Puja.
मित्रों, जितनी भी कन्याएँ उपलब्ध हों, उन्हें आदरपूर्वक घर बुलाकर सर्वप्रथम उनके चरण जल से धोने चाहिए। तथा उन्हें आसन पर बिठाकर रोली-अक्षत का तिलक करना चाहिए। इसके पश्चात उन्हें नवीन वस्त्र, चुनरी अथवा यथाशक्ति उपहार अर्पित करना चाहिए। साथ ही हलवा-पूड़ी, काले चने तथा खीर जैसा सात्विक भोजन प्रेमपूर्वक करवाना चाहिए।।
भोजन के पश्चात कन्याओं को यथाशक्ति दक्षिणा भी अर्पित करनी चाहिए। साथ ही उनके चरण-स्पर्श करके उनसे आशीर्वाद ग्रहण करना चाहिए। इस संपूर्ण प्रक्रिया के दौरान एक बालक को भी लांगुरा अर्थात भैरव-स्वरूप मानकर सम्मिलित करने की परंपरा है। जिसे भी भोजन तथा दक्षिणा अर्पित की जाती है। इस समस्त अनुष्ठान में सबसे अधिक महत्वपूर्ण यही है कि कन्याओं के प्रति व्यवहार विनम्र, स्नेहपूर्ण तथा सम्मानजनक हो।।
शास्त्रीय प्रमाण।। Scriptural References.
मित्रों, देवी भागवत पुराण तथा कालिका पुराण में कुमारी-पूजन का विस्तृत उल्लेख मिलता है। जिसमें दो वर्ष से लेकर दस वर्ष तक की कन्याओं को क्रमशः कुमारी, त्रिमूर्ति, कल्याणी, रोहिणी, कालिका, चंडिका, शाम्भवी, दुर्गा तथा सुभद्रा के नामों से संबोधित करके पूजने का विधान बताया गया है।।
वाराही तंत्र में भी यह स्पष्ट किया गया है कि संख्या की न्यूनता साधना के फल को समाप्त नहीं करती। अपितु साधक की श्रद्धा तथा भाव ही फल का वास्तविक निर्धारक होते हैं। निर्णयसिंधु तथा धर्मसिंधु जैसे निबंध-ग्रंथों में भी यह उल्लेख मिलता है कि एक कन्या का भी श्रद्धापूर्वक पूजन संपूर्ण फल प्रदान करने में सक्षम माना गया है।।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न।। Frequently Asked Questions. (FAQ)
प्रश्न 1. कन्या-पूजन के लिए न्यूनतम कितनी कन्याएँ आवश्यक हैं।। What Is The Minimum Number Of Kanyas Required For The Puja.
उत्तर:- शास्त्रों में नौ कन्याएँ आदर्श मानी गई हैं। परंतु दो अथवा केवल एक कन्या का श्रद्धापूर्वक पूजन भी पूर्ण फलदायी माना जाता है।।
प्रश्न 2. यदि आसपास कोई कन्या उपलब्ध ही ना हो, तो क्या करें।। What To Do If No Kanya Is Available Nearby.
उत्तर:- निकटतम बालिका-विद्यालय अथवा अनाथालय में जाकर पूजन करवाएं। अथवा माता की प्रतिमा के समक्ष मानसिक संकल्प के साथ पूजन करें। तथा जरूरतमंद कन्याओं को दान दें।।
प्रश्न 3. क्या एक ही कन्या को कई बार पूजकर नौ कन्याओं का भाव पूर्ण किया जा सकता है।। Can One Kanya Be Worshipped Multiple Times To Fulfil The Vow Of Nine.
उत्तर:- हाँ, एक ही कन्या को अष्टमी-नवमी के विभिन्न समय पर बुलाकर संकल्पपूर्वक नौ बार पूजन करना भी परंपरा में शास्त्र-सम्मत माना गया है।।
प्रश्न 4. कन्या-पूजन में कौन-सा भोजन अर्पित करना उचित है।। What Food Is Appropriate To Offer During Kanya Puja.
उत्तर:- हलवा, पूड़ी, काले चने तथा खीर जैसा सात्विक भोजन कन्याओं को प्रेमपूर्वक अर्पित करना सर्वाधिक उचित तथा पारंपरिक माना जाता है।।
प्रश्न 5. क्या कन्या-पूजन के बिना नवरात्रि-साधना अधूरी रह जाती है।। Does Navratri Sadhana Remain Incomplete Without Kanya Puja.
उत्तर:- नहीं, यदि परिस्थितिवश प्रत्यक्ष कन्या-पूजन संभव ना हो पाए। तो श्रद्धापूर्वक किया गया मानसिक संकल्प अथवा कन्याओं के कल्याण हेतु दान भी साधना को पूर्णता प्रदान करता है।।
लेख का निष्कर्ष।। Conclusion.
मित्रों, कन्या-पूजन संपूर्ण नवरात्रि-साधना का अत्यंत महत्वपूर्ण तथा भावपूर्ण अंग अवश्य है। परंतु इसकी संख्या अथवा उपलब्धता को लेकर भय अथवा चिंता रखना शास्त्र-सम्मत दृष्टिकोण नहीं है। दो कन्याएँ, एक कन्या अथवा परिस्थितिवश मानसिक संकल्प, यह सभी विकल्प श्रद्धापूर्वक अपनाए जाने पर समान रूप से फलदायी माने जाते हैं।।
और यहाँ मैं यही कहूँगा कि कन्या-पूजन का वास्तविक उद्देश्य स्त्री-शक्ति तथा बाल-रूप में देवी के प्रति सच्चा सम्मान व्यक्त करना है। ना कि केवल एक निश्चित संख्या को पूर्ण करना। परिस्थिति चाहे जैसी भी हो, सच्चे भाव से किया गया पूजन माता भगवती सदैव स्वीकार करती हैं।।
परन्तु मेरी आपको यही सलाह है कि अपनी कुल-परंपरा तथा विशेष परिस्थिति के अनुसार किसी विद्वान, योग्य तथा अनुभवी ब्राह्मण से मार्गदर्शन अवश्य लेना चाहिए। ताकि कन्या-पूजन पूर्ण विधि-विधान तथा निश्चिंत मन से संपन्न हो सके। आप सभी सनातनियों को नवरात्रि के इस पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनायें।।
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