बालाजी वेद, वास्तु एवं ज्योतिष केन्द्र।।
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आज का लेख एवं आज का पञ्चांग 17 अक्टूबर 2026 दिन शनिवार।।
मित्रों, तारीख 17 अक्टूबर 2026 दिन शनिवार को अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि है। आज माता कालरात्रि का दिन है, आज माता की विशिष्ट पुजा से अतुलनीय लाभ उठाने का दिन है। आज अर्द्धरात्रि में अपने घर में ही माता की विशिष्ट पुजा करके आप अपनी मनोवांछित कामनाओं की पूर्ति कर सकते हैं। आज के दिन ही सभी पूजा पंडालों में माता की बड़ी-बड़ी प्रतिमाएँ स्थापित की जाएंगी। इसे बिल्व सप्तमी भी कहा जाता है। आज शनिवार को माता तुरंग अर्थात घोड़े पर सवार होकर आती हैं। और माता का घोड़े पर चढ़कर आना शुभ नहीं बताया गया है। इससे छत्रभंग एवं कष्ट का योग बनता है। आज जैन लोगों का ओली व्रत का आरम्भ हो जाएगी। रवियोग भी है। आज माता अन्नपूर्णा की परिक्रमा का दिन भी है। आप सभी सनातनियों को “माता कालरात्रि की विशिष्ट पूजा एवं माता अन्नपूर्णा के परिक्रमा” की हार्दिक शुभकामनायें।।
मित्रों, तारीख 17 अक्टूबर 2026 दिन शनिवार को अश्विन मास के शुक्ल पक्ष कि नवमी-दशमी को नंदगांव में लट्ठमार होली मनाने की सदियों की परम्परा है। आप सभी सनातनियों को नंदगांव के लट्ठमार होली की हार्दिक शुभकामनायें।।
हे आज की तिथि (तिथि के स्वामी), आज के वार, आज के नक्षत्र (नक्षत्र के देवता और नक्षत्र के ग्रह स्वामी), आज के योग और आज के करण। आप इस पंचांग को सुनने और पढ़ने वाले जातकों पर अपनी कृपा बनाए रखें। इनको जीवन के समस्त क्षेत्रो में सदैव ही सर्वश्रेष्ठ सफलता प्राप्त हो। ऐसी मेरी आप सभी आज के अधिष्ठात्री देवों से हार्दिक प्रार्थना है।।
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वैदिक सनातन हिन्दू पञ्चांग, Vedic Sanatan Hindu Panchang पाँच अंगो के मिलने से बनता है, ये पाँच अंग इस प्रकार हैं :- 1:- तिथि (Tithi), 2:- वार (Day), 3:- नक्षत्र (Nakshatra), 4:- योग (Yog) और 5:- करण (Karan).
पञ्चांग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना जाता है। इसीलिए भगवान श्रीराम भी पंचाग का श्रवण करते थे। शास्त्रों के अनुसार तिथि के पठन और श्रवण से माँ लक्ष्मी की कृपा मिलती है। वार के पठन और श्रवण से आयु में वृद्धि होती है।।
नक्षत्र के पठन और श्रवण से पापों का नाश होता है। योग के पठन और श्रवण से प्रियजनों का प्रेम मिलता है। उनसे वियोग नहीं होता है। करण के पठन-श्रवण से सभी तरह की मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। इसलिए हर मनुष्य को जीवन में शुभ फलों की प्राप्ति के लिए नित्य पञ्चांग को देखना, पढ़ना एवं सुनना चाहिए।।

आज का पञ्चांग 17 अक्टूबर 2026 दिन शनिवार।।
Aaj ka Panchang 17 October 2026.
विक्रम संवत् – 2083.
संकल्पादि में प्रयुक्त होनेवाला संवत्सर – रौद्र.
शक – 1948.
अयन – सौम्यायनम्.
गोल – याम्य.
ऋतु – वर्षा.
मास – अश्विन.
पक्ष – शुक्ल.
गुजराती पंचांग के अनुसार – अश्विन शुक्ल पक्ष.
#Panchang_17_October_2026
तिथि – षष्ठी 05:55 AM बजे तक उपरान्त सप्तमी तिथि है।।
नक्षत्र – मूल 09:47 AM तक उपरान्त पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र है।।
योग – अतिगण्ड 23:03 PM तक उपरान्त सुकर्मा योग है।।
करण – तैतिल 05:55 AM तक उपरान्त गर 19:12 PM तक उपरान्त वणिज करण है।।
चन्द्रमा – धनु राशि पर।।
सूर्य – कन्या राशि एवं चित्रा नक्षत्र पर गोचर कर रहे हैं।।
मुम्बई सूर्योदय – प्रातः 06:34:56
मुम्बई सूर्यास्त – सायं 18:11:32
वाराणसी सूर्योदय – प्रातः 06:17:35
वाराणसी सूर्यास्त – सायं 17:43:52
राहुकाल (अशुभ) – सुबह 09:29 बजे से 10:57 बजे तक।।
विजय मुहूर्त (शुभ) – दोपहर 12.11 बजे से 12.35 बजे तक।।
#Panchang_17_October_2026
सप्तमी तिथि विशेष – सप्तमी तिथि को आँवला त्याज्य बताया गया है। सप्तमी तिथि मित्रप्रद तिथि मानी जाती है। इतना ही नहीं यह सप्तमी तिथि एक शुभ तिथि भी मानी जाती है। इस सप्तमी तिथि के स्वामी भगवान सूर्य देवता हैं। यह सप्तमी तिथि भद्रा नाम से विख्यात मानी जाती है। यह सप्तमी तिथि शुक्ल पक्ष में मध्यम फलदायीनी मानी जाती है। इस सप्तमी तिथि को सुबह सर्वप्रथम स्नान करके भगवान सूर्य को सूर्यार्घ देकर उनका पूजन करना चाहिये। उसके बाद आदित्यह्रदयस्तोत्रम् का पाठ करना चाहिये। इससे जीवन में सुख, समृद्धि, हर्ष, उल्लास एवं पारिवारिक सुखों कि सतत वृद्धि होती है। सप्तमी तिथि में भगवान सूर्य की पुजा करने से सभी मनोकामनाओं की पूर्ति होती है।।
मित्रों, सोमवार और शुक्रवार कि सप्तमी विशेष रूप से शुभ फलदायी नहीं मानी जाती बाकी दिनों कि सप्तमी सभी कार्यों के लिये शुभ फलदायी मानी जाती है। सप्तमी को भूलकर भी नीला वस्त्र धारण नहीं करना चाहिये तथा ताम्बे के पात्र में भोजन भी नहीं करना चाहिये। सप्तमी को फलाहार अथवा मीठा भोजन विशेष रूप से नमक के परित्याग करने से भगवान सूर्यदेव कि कृपा सदैव बनी रहती है।।
मित्रों, ज्योतिषशास्त्र के अनुसार जिस व्यक्ति का जन्म सप्तमी तिथि में होताहै, वह व्यक्ति बहुत ही भाग्यशाली होता है। इस तिथि मेंजन्म लेनेवाला जातक गुणवान और प्रतिभाशाली होता है। ये अपने मोहक व्यक्तित्व सेलोगों को अपनी ओर आकर्षित करने की योग्यता रखते हैं। इनके बच्चे भी गुणवान और योग्यहोते हैं। धन धान्य के मामले में भी यह व्यक्ति काफी भाग्यशाली होते हैं। येसंतोषी स्वभाव के होते हैं और इन्हें जितना मिलता है उतने से ही संतुष्ट रहते हैं।।
#Panchang_17_October_2026
मित्रों, जगतजननी, जगत्कल्याणि, जगन्माता श्री दुर्गा का सप्तम रूप माता श्री कालरात्रि हैं। ये काल का नाश करने वाली हैं, इसलिए कालरात्रि कहलाती हैं। नवरात्रि के सप्तम दिन इनकी पूजा और अर्चना की जाती है। इस दिन साधक को अपना चित्त सहस्रार चक्र में स्थिर कर साधना करनी चाहिए। संसार में काल का नाश करने वाली देवी “माता कालरात्री” ही हैं।।
भक्तों की सामान्य पूजा मात्र से ही उनके सभी दु:ख-संताप आदि माता भगवती हर लेती हैं। दुश्मनों का नाश करने वाली तथा मनोवांछित फल देकर अपने भक्तों को संतुष्ट करती हैं। दुर्गा पूजा का सातवां दिन आश्विन शुक्ल सप्तमी माता कालरात्रि की उपासना का विधान है। मां कालरात्रि का स्वरूप देखने में अत्यंत भयानक है। इनका वर्ण अंधकार की भाँति काला है।।
इनके केश बिखरे हुए हैं, कंठ में विद्युत की कान्ति बिखेरनेवाली माला तथा तीन नेत्र ब्रह्माण्ड की तरह विशाल एवं गोल हैं। जिनमें से बिजली की भाँति किरणें निकलती रहती हैं। इनकी नासिका से निकलनेवाली श्वास-प्रश्वास से जैसे अग्नि की भयंकर ज्वालायें निकलती रहती हैं। माँ का यह भय उत्पन्न करने वाला स्वरूप केवल पापियों का नाश करने के लिये ही है।।
माँ कालरात्रि अपने भक्तों को सदैव शुभ फल प्रदान करने वाली हैं। माता कालरात्रि को शुभंकरी भी कहा जाता है। क्योंकि ये अपने भक्तों का सदा ही शुभ ही करती हैं। दुर्गा पूजा के सप्तम दिन साधक का मन “सहस्रार” चक्र में स्थित होता है। मधु कैटभ नामक महापराक्रमी असुर से अपने भक्तों के जीवन की रक्षा हेतु भगवान विष्णु को निंद्रा से जगाने के लिए ब्रह्मा जी ने मां की स्तुति की थी।।
यह देवी कालरात्रि ही महामाया हैं और भगवान विष्णु की योगनिद्रा हैं। इन्होंने ही सृष्टि को एक दूसरे से जोड़ रखा है। देवी काल-रात्रि का वर्ण काजल के समान काले रंग का है जो अमावस्या की रात्रि से भी अधिक काला है। मां कालरात्रि के तीन बड़े-बड़े उभरे हुए नेत्र हैं जिनसे मां अपने भक्तों पर कृपा दृष्टि रखती हैं। माता कालरात्रि देवी की चार भुजाएं हैं। दायीं ओर की उपरी भुजा से महामाया भक्तों को वरदान देती हैं और नीचे की भुजा से अभय का आशीर्वाद प्रदान करती हैं।।
बायीं भुजा में क्रमश: तलवार और खड्ग धारण किया है। बाल खुले और हवा में लहराते देवी कालरात्रि गर्दभ पर सवार होती हैं। मां का वर्ण काला होने पर भी कांतिमय और अद्भुत दिखाई देता है। देवी कालरात्रि का यह विचित्र रूप भक्तों के लिए अत्यंत शुभ है। अत: देवी को शुभंकरी भी कहा गया है। हर प्रकार की ऋद्धि-सिद्धि देनेवाली माता कालरात्रि का यह सातवां दिन तांत्रिक क्रिया की साधना करने वाले भक्तों के लिए अति महत्वपूर्ण होता है।।
सप्तमी पूजा के दिन तंत्र साधना करने वाले साधक मध्य रात्रि में देवी की तांत्रिक विधि से पूजा करते हैं। ऐसी मान्यता है, कि इस दिन मां की आंखें खुलती हैं। इसके लिए तन्त्र साधना करनेवाले भक्त षष्ठी को ही बिल्ववृक्ष से किसी एक पत्र को आमंत्रित करके आते हैं और उसे आज तोड़कर लाते है। उसी बिल्वपत्र से माता की आँखें बनाई जाती है और उसी को माता को प्रत्यक्षदर्शी मानकर उनकी उपस्थिति में साधना करके मन्त्र-तन्त्रों की सिद्धि की जाती है।।
दुर्गा पूजा में सप्तमी तिथि का काफी महत्व होता है। इस दिन से भक्तों के लिए देवी मां का दरवाज़ा खुल जाता है। भक्तगण पूजा स्थलों पर देवी के दर्शन-पूजन के लिए भारी मात्रा में आने लगते हैं। लगभग सभी देवी माता के प्रमुख स्थलों पर सप्तमी की पूजा भी सुबह में अन्य दिनों की तरह ही होती है। परंतु रात्रि में विशेष विधान के साथ देवी की पूजा की जाती है।।
इस दिन अनेक प्रकार के मिष्टान्न एवं कहीं-कहीं तांत्रिक विधि से पूजा होने पर मदिरा भी देवी को अर्पित कि जाती है। सप्तमी की रात्रि “सिद्धियों” की रात्री भी कही जाती है। इसलिये कुण्डलिनी जागरण हेतु जो साधक साधना में लगे होते हैं आज सहस्त्रसार चक्र का भेदन करते हैं। पूजा विधान में शास्त्रों में जैसा वर्णित हैं। उसके अनुसार पहले कलश की पूजा, नवग्रह, दशदिक्पाल, देवी के परिवार में उपस्थित देवी देवता की पूजा करनी चाहिए। फिर मां कालरात्रि की पूजा करनी चाहिए।।
मित्रों, साधक के लिए सभी सिद्धियों का द्वार आज की साधना से खुलने लगता है। इस दिन सामान्य पूजा परन्तु मन की एकाग्रता से भक्तों को माता के साक्षात्कार का भी अवसर मिलता है। आज की पूजा-साधना से मिलने वाले पुण्य एवं नव दिनों के उपवास से भक्त इसका अधिकारी होता है। इस दिन की पूजा से भक्तों की समस्त विघ्न बाधाओं और पापों का नाश हो जाता है। और उसे अक्षय पुण्य लोक की प्राप्ति होती है।।
तन्त्र साधना एवं सिद्धि प्राप्ति विधि तथा माता कालरात्री और शनिदेव का सम्बन्ध।। इस लेख को पूरा पढ़ने के लिए इस लिंक को क्लिक करें:
#Panchang_17_October_2026
मूल नक्षत्र के जातकों का गुण एवं स्वभाव:- यदि आपका जन्म मूल नक्षत्र में हुआ है तो आपका जीवन सुख समृद्धि के साथ बीतेगा। धन की कमी आपको कभी नहीं आएगी और आप अपने कार्यों द्वारा अपने परिवार का नाम और सम्मान और बढ़ाएंगे। आप कोमल हृदयी परन्तु अस्थिर दिमाग के व्यक्ति होंगे। कभी आप बहुत दयालु और कभी अत्यधिक नुक्सान पहुंचाने वाले होते है।।
ऐश्वर्य पूर्ण जीवन के कारण आपका उठना बैठना समाज के धनि एवं उच्च वर्ग के व्यक्तियों के साथ ही होता है। इस कारण आपके व्यक्तित्व में घमंड आना स्वाभाविक ही है। आपका व्यवहार बहुत ही अनिश्चित होता है। समय और स्थान के साथ ये परिवर्तित भी हो जाता है। अपनी आकर्षक आँखों और सम्मोहक व्यक्तित्व के कारण आप अनायास ही लोगों के आकर्षण का केंद्र बन जाते हैं।।
आप शांतिप्रिय और एक सकारात्मक सोच वाले व्यक्ति होंगे। जो भविष्य की चिंता छोड़ केवल आज में जीना पसंद करते हैं। मूल नक्षत्र में जन्मे जातक सिद्धांतों और नैतिकता में बहुत अधिक विश्वास करते हैं। परन्तु अपनी अस्थिर सोच के कारण कभी-कभी आपके व्यवहार को समझना बेहद कठिन हो जाता है। आपमें गंभीरता की कमी होगी परन्तु ईश्वर पर आपका विश्वास अटूट होगा।।
मूल नक्षत्र के जातक अपने कार्य के प्रति मेहनती और निष्ठावान होतें हैं। ऐसे लोग अधिकतर कला, लेखन, प्रशासनिक, मेडिकल या हर्बल क्षेत्र में सफल माने जाते हैं। आप एक प्रभावशाली, बुद्धिमान और नेतृत्व के गुणों से भरपूर व्यक्ति होंगे। इसलिए यदि आप सामाजिक या राजनीतिक क्षेत्रों में भाग्य अजमाए तो आप शीघ्र ही उच्चस्थ पद प्राप्त कर सकते हैं।।
अपनी अस्थिर सोच के कारण जीवन में कई बार आप अपने कार्यक्षेत्र बदलते हैं। आप एक अच्छे वित्तीय सलाहकार होते हैं परन्तु केवल दूसरों के लिए। आप बिना सोचे समझे धन खर्च करने वालों में से हैं। इसलिए जीवन में कई बार आपको आर्थिक संकट से सामना करना पड़ सकता है। आपको विदेश में कार्य का प्रस्ताव कभी ठुकराना नहीं चाहिए। क्योंकि विदेश में आपका भाग्योदय निश्चित है।।
मूल नक्षत्र में जन्मे जातकों के जीवन के शरुआती वर्षों में पिता या भाई-बहन का सहयोग ना के बराबर मिलने के कारण स्वयं संघर्ष कर जीवन में सफल होते हैं। मूल नक्षत्र के जातकों का दांपत्य जीवन बेहद सुखमय एवं संतोषजनक होता है। आपकी पत्नी के कारण आप जीवन में शांति और आनंद का अनुभव करते हैं। मूल नक्षत्र की जातिका सामान्य से अधिक लम्बी कद वाली होती हैं। यह अच्छे और बुरे कार्यों में भेद नहीं करती इसलिए पाप कर्मों में रूचि लेने लगती हैं।।
मूल नक्षत्र में जन्मे जातकों की पहचान किसी को मूर्ख बना कर घमंड करना होता है। परन्तु इन्हें कमर और कुल्हे का दर्द, टी बी और लकवा जैसी बिमारियों से परेशानी का योग बनते रहता है।।
प्रथम चरण:- मूल नक्षत्र के प्रथम चरण का स्वामी मंगल होता है। इस नक्षत्र चरण का स्वामी मंगल की गुरु एवं केतु से शत्रुता के कारण इस नक्षत्र चरण में जन्मा जातक जीवन भर भौतिक सुखों की प्राप्ति हेतु संघर्षरत रहता है। लग्नबली न होने के कारण जातक का विकास रुका हुआ रहेगा परन्तु सूर्य की दशा अच्छी जाएगी।।
द्वितीय चरण:- मूल नक्षत्र के द्वितीय चरण का स्वामी शुक्र होता है। लग्नेश गुरु की नक्षत्र स्वामी केतु से शत्रुता है। परन्तु नक्षत्र चरण का स्वामी शुक्र की केतु से मित्रता के कारण जातक में त्याग अथवा दान की प्रवृत्ति अधिक होगी। सूर्य की दशा में जातक का भाग्योदय होता है। शुक्र की दशा भी ख़राब नहीं जाएगी और केतु की दशा शुभ फल देगी।।
तृतीय चरण:- मूल नक्षत्र के तृतीय चरण का स्वामी बुध होता है। मूल नक्षत्र के तीसरे चरण में जन्म लेने वाले जातक के अधिक मित्र होंगे एवं सभी सुयोग्य होंगे। लग्नेश गुरु की दशा अति उत्तम फल देगी। सूर्य की दशा में जातक का भाग्योदय होगा। केतु एवं बुध की दशाएं भी शुभ फल ही देंगी।।
चतुर्थ चरण:- मूल नक्षत्र के चतुर्थ चरण का स्वामी चन्द्र होता है। लग्नेश गुरु और चन्द्रमा की मित्रता के कारण मूल नक्षत्र के चौथे चरण में जन्म लेने वाला जातक राजा के समान सम्मान एवं ऐश्वर्य प्राप्त करता है। लग्नेश गुरु की दशा अति उत्तम फल देगी। सूर्य की दशा में जातक का भाग्योदय होगा। शुक्र की दशा भी ख़राब नहीं जाएगी।।
#Panchang_17_October_2026
शनिवार को जूते-चप्पल, लोहे की बनी वस्तुयें, नया अथवा पुराना भी वाहन नहीं खरीदना चाहिये एवं नए कपड़े न खरीदना और ना ही पहली बार पहनना चाहिये।।
शनिवार का विशेष – शनिवार के दिन तेल मर्दन “मालिश” करने से हर प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती हैं – (मुहूर्तगणपति)।।
शनिवार को क्षौरकर्म (बाल दाढी अथवा नख काटने या कटवाने) से आयुष्य की हानि होती है। (महाभारत अनुशासनपर्व)।।
शनिवार को पीपल वृक्ष में मिश्री मिश्रित दूध से अर्घ्य देने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। पीपल के नीचे सायंकालीन समय में एक चतुर्मुख दीपक जलाकर हनुमान चालीसा का पाठ करने से सभी ग्रह दोषों की निवृति हो जाती है।।
दिशाशूल – शनिवार को पूर्व दिशा की यात्रा नहीं करनी चाहिये, यदि अत्यावश्यक हो तो अदरख एवं घी खाकर यात्रा कर सकते है।।
#Panchang_17_October_2026
जिस व्यक्ति का जन्म शनिवार को होता है उस व्यक्ति का स्वभाव कठोर होता है। ये पराक्रमी एवं परिश्रमी होते हैं तथा इनके ऊपर दु:ख भी आये तो ये उसे भी सह लेना जानते हैं। ये न्यायी एवं गंभीर स्वभाव के होते हैं तथा सेवा करना इन्हें काफी पसंद होता है।।
शनिवार को जन्म लेनेवाले जातक कुछ सांवले रंग के, साहसी, मैकेनिक अथवा चिकित्सक होते हैं। इनमें से कुछ अपने कार्य में सुस्त भी होते हैं, जैसे देर से जागना, देर तक सोना भी इनकी आदतों में शुमार होता है। पारिवारिक जिम्मेदारियां भी शुद्ध रहती है इसलिये ये एक मेहनतकश इंसान होते हैं। सफलता के मार्ग में रूकावटों का भी सामना करना पड़ता है।।
शनिवार को जन्मलेनेवाले जातकों के स्वभाव में साहस लक्षित होता है। सफलता के मार्ग में लाख रुकावटें आए, लेकिन ये इसे पार करके ही रहते हैं। ऐसे लोग अधिकांशतः सांवले रंग के होते हैं। इन जातकों को अपने कैरियर के लिये डॉक्टपर, इंजीनियर तथा मैकेनिक के क्षेत्र का चयन करना चाहिये। इनका शुभ अंक 3, 6 और 9 तथा इनका शुभ दिन शनिवार और मंगलवार होता है।।
आज का सुविचार – मित्रों, रात लम्बी और काली हो सकती है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं होता कि सुबह होगी ही नहीं। ठीक उसी तरह असफलता का दौर लम्बा हो सकता है, लेकिन इसका यह मतलब ये कतई नहीं होता कि आपको अब कभी सफलता मिलेगी ही नहीं।।
#Panchang_17_October_2026
शनि देव मेहरबान हों तो इंजीनियर और चार्टर्ड एकाउंटेंट बनाते है।।…. आज के इस पुरे लेख को पढ़ने के लिये इस लिंक को क्लिक करें…. वेबसाईट पर पढ़ें: & ब्लॉग पर पढ़ें:
कुंडली से जानें छोटे भाई-बहन होंगे या नहीं।। Read More. वेबसाईट पर: And ब्लॉग पर पढ़ें:
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