HomePanchangपञ्चांग 18 अक्टूबर 2026 दिन रविवार।।

पञ्चांग 18 अक्टूबर 2026 दिन रविवार।।

बालाजी वेद, वास्तु एवं ज्योतिष केन्द्र।।

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आज का लेख एवं आज का पञ्चांग 18 अक्टूबर 2026 दिन रविवार।।

मित्रों, तारीख 18 अक्टूबर 2026 दिन रविवार को अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि है। आज महाष्टमी का पावन महाव्रत है। आज माता महागौरी के दर्शन और पूजन अवश्य करने चाहिए। माता अन्नपूर्णा माता की परिक्रमा जारी रहेगी। उपोषणमथाष्टम्याम् – अष्टमी तिथि को उपवास करना और आत्मशक्त्यथ पूजनम् – अपनी शक्ति अथवा आराध्य देवी की शक्ति का स्मरण करना तथा महानिशा पूजा – महानिशा अर्थात् अर्धरात्रि के समय उनकी विशेष पूजा करना और साथ ही बलिदानादिकम् च — बलिदान आदि धार्मिक अनुष्ठान करना भी आज ही श्रेष्ठ होगा। माता सरस्वती कि पूजा भी आज की जाएगी। आज भगवान सूर्यनारायण कन्या राशी से तुला राशी पर 10:32 AM बजे से चले जायेंगे। पुण्यकाल में गोदावरी का स्नान दीप-तिल-दूध आदि के दान को श्रेष्ठ बताया गया है। आज सर्वार्थसिद्धियोग भी है। आप सभी सनातनियों को “महाष्टमी के पावन महाव्रत एवं सूर्य देवता के कन्या संक्रांति” की हार्दिक शुभकामनायें।।

हे आज की तिथि (तिथि के स्वामी), आज के वार, आज के नक्षत्र (नक्षत्र के देवता और नक्षत्र के ग्रह स्वामी), आज के योग और आज के करण। आप इस पंचांग को सुनने और पढ़ने वाले जातकों पर अपनी कृपा बनाए रखें। इनको जीवन के समस्त क्षेत्रो में सदैव ही सर्वश्रेष्ठ सफलता प्राप्त हो। ऐसी मेरी आप सभी आज के अधिष्ठात्री देवों से हार्दिक प्रार्थना है।।

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।। पधारने हेतु भागवत प्रवक्ता – स्वामी धनञ्जय महाराज की ओर से आपका ह्रदय से धन्यवाद। आपका आज का दिन मंगलमय हो। अपने गाँव, शहर अथवा सोसायटी में भागवत कथा के आयोजन हेतु कॉल – 9375288850 करें या इस लिंक को क्लिक करें।।

वैदिक सनातन हिन्दू पञ्चांग, Vedic Sanatan Hindu Panchang पाँच अंगो के मिलने से बनता है, ये पाँच अंग इस प्रकार हैं :- 1:- तिथि (Tithi), 2:- वार (Day), 3:- नक्षत्र (Nakshatra), 4:- योग (Yog) और 5:- करण (Karan).

पञ्चांग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना जाता है। इसीलिए भगवान श्रीराम भी पंचाग का श्रवण करते थे। शास्त्रों के अनुसार तिथि के पठन और श्रवण से माँ लक्ष्मी की कृपा मिलती है। वार के पठन और श्रवण से आयु में वृद्धि होती है।।

नक्षत्र के पठन और श्रवण से पापों का नाश होता है। योग के पठन और श्रवण से प्रियजनों का प्रेम मिलता है। उनसे वियोग नहीं होता है। करण के पठन-श्रवण से सभी तरह की मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। इसलिए हर मनुष्य को जीवन में शुभ फलों की प्राप्ति के लिए नित्य पञ्चांग को देखना, पढ़ना एवं सुनना चाहिए।।

पञ्चांग 18 अक्टूबर 2026 दिन रविवार।। Panchang 18 October 2026

आज का पञ्चांग 18 अक्टूबर 2026 दिन रविवार।।
Aaj ka Panchang 18 October 2026.

विक्रम संवत् – 2083.

संकल्पादि में प्रयुक्त होनेवाला संवत्सर – सिद्धार्थ.

शक – 1948.

अयन – याम्यायनम्.

गोल – सौम्य.

ऋतु – शरद.

मास – अश्विन.

पक्ष – शुक्ल.

गुजराती पंचांग के अनुसार – अश्विन शुक्ल पक्ष.

#Panchang_18_October_2026

तिथि – सप्तमी 05:29 AM बजे तक उपरान्त अष्टमी तिथि है।।

नक्षत्र – पूर्वाषाढ़ा 12:49 PM तक उपरान्त उत्तराषाढ़ा नक्षत्र है।।

योग – सुकर्मा 23:56 PM तक उपरान्त धृति योग है।।

करण – वणिज 08:29 AM तक उपरान्त विष्टि 21:42 PM तक उपरान्त बव करण है।।

चन्द्रमा – धनु राशि पर 19:33 PM तक उपरान्त मकर राशि पर।।

सूर्य – कन्या राशि एवं चित्रा नक्षत्र पर गोचर कर रहे हैं।।

मुम्बई सूर्योदय – प्रातः 06:35:18

मुम्बई सूर्यास्त – सायं 18:10:47

वाराणसी सूर्योदय – प्रातः 06:18:40

वाराणसी सूर्यास्त – सायं 17:42:52

राहुकाल (अशुभ) – सायं 16:45 बजे से 18:12 बजे तक।।

विजय (शुभ) मुहूर्त – दोपहर 12.11 PM से 12.35 बजे तक।।

#Panchang_18_October_2026

अष्टमी तिथि विशेष:- अष्टमी तिथि को नारियल त्याज्य बताया गया है। अष्टमी तिथि बलवती अर्थात स्ट्रांग तिथि मानी जाती है। इसका मतलब कोई भी विकट कार्य आज आप कर-करवा सकते हैं। इतना ही नहीं अपितु अष्टमी तिथि व्याधि नाशक तिथि भी मानी जाती है। इसका मतलब आज आप कोई भी भयंकर रोगों के इलाज का प्रयत्न भगवान के नाम के साथ करेंगे-करवाएंगे तो निश्चित लाभ होगा। यह अष्टमी तिथि जया नाम से विख्यात मानी जाती है। यह अष्टमी तिथि शुक्ल पक्ष में मध्यम फलदायिनी मानी जाती है।।

इस अष्टमी तिथि के देवता भगवान शिव भोलेनाथ जी माने जाते हैं। इसलिये इस अष्टमी तिथि को भगवान शिव का दर्शन एवं पूजन अवश्य करना चाहिए। आज अष्टमी तिथि में कच्चा दूध, शहद, काला तिल, बिल्वपत्र एवं पञ्चामृत शिवलिंग पर चढ़ाने से भगवान शिव की कृपा सदैव बनी रहती है। घर में कोई रोगी नहीं होता एवं सभी मनोकामनाओं की सिद्धि तत्काल होती है।।

मंगलवार को छोड़कर बाकि अन्य किसी भी दिन की अष्टमी तिथि शुभ मानी गयी है। परन्तु मंगलवार की अष्टमी शुभ नहीं होती। इसलिये इस अष्टमी तिथि में भगवान शिव के पूजन से हर प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त होती है। इस अष्टमी तिथि को अधिकांशतः विष्णु और वैष्णवों का प्राकट्य हुआ है। इसलिये आज अष्टमी तिथि में भगवान शिव और भगवान नारायण दोनों का पूजन एक साथ करके आप अपनी सम्पूर्ण मनोकामनायें पूर्ण कर सकते हैं।।

मित्रों, अष्टमी तिथि को जिस व्यक्ति का जन्म होता है वह व्यक्ति धर्मात्मा होता है। मनुष्यों पर दया करने वाला तथा हरेक प्रकार के गुणों से युक्त गुणवान होता है। ये कठिन से कठिन कार्य को भी अपनी निपुणता से पूरा कर लेते हैं। इस तिथि के जातक सत्य का पालन करने वाले होते हैं यानी सदा सच बोलने की चेष्टा करते हैं। इनके मुख से असत्य तभी निकलता है जबकि किसी मज़बूर को लाभ मिले।।

#Panchang_18_October_2026

मित्रों, जगतजननी, जगदम्बा, माता दुर्गा की आठवीं शक्ति का नाम महागौरी है। दुर्गापूजा के आठवें दिन महागौरी की पूजा-उपासना का विधान है। इनकी शक्ति अमोघ और तत्काल फलदायिनी एवं सिद्धिदायिनी है। इनकी उपासना से भक्तों के सभी पापों का क्षय हो जाता है और पूर्वकृत पाप भी विनष्ट हो जाते हैं। माता के भक्तों को भविष्य में पाप-संताप, दैन्य-दुःख उसके पास कभी नहीं आते। वह सभी प्रकार से पवित्र और अक्षय पुण्यों का अधिकारी हो जाता है।।

मित्रों, माता महागौरी ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए देवी ने कठोर तपस्या की थी। जिससे इनका शरीर काला पड़ गया था। देवी की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने इन्हें स्वीकार किया। कहा जाता है, कि स्वयं शिव जी ने इनके शरीर को गंगा-जल से धोया था। कहते हैं, कि तब माता का स्वरुप विद्युत के समान अत्यंत कांतिमान गौर वर्ण का हो गया था और तभी से इनका नाम गौरी पड़ा।।

माता महागौरी रूप में देवी करूणामयी, स्नेहमयी, शांत और मृदुल दिखती हैं। देवता, ऋषि तथा मनुष्य सभी देवी के इसी रूप की प्रार्थना इस मन्त्र से करते हैं। “सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोस्तुते।” माता महागौरी से संबंधित एक अन्य कथा भी प्रचलित है, कथा के अनुसार एक बार की बात है, कि एक शेर काफी भूखा था। वह भोजन की तलाश में वहां पहुंचा जहां माता देवी उमा शिव को पति रूप में प्राप्ति हेतु तपस्या कर रही थीं।।

देवी को देखकर सिंह की भूख बढ़ गयी परंतु वह देवी के तपस्या से उठने का इंतजार करते हुए वहीं बैठ गया। इस इंतजार में वह काफी कमज़ोर हो गया और देवी जब तपस्या से उठी तो सिंह की दशा देखकर उन्हें उस पर बहुत दया आ गयी। तब माता ने उसे अपना सवारी बना लिया क्योंकि एक प्रकार से उसने भी तपस्या की थी। इसलिए माता गौरी का वाहन बैल और सिंह दोनों ही हैं।।

अष्टमी के दिन सुहागिनी महिलाओं को अपने सुहाग की दीर्घायु एवं सफलता के लिए देवी मां को चुनरी भेंट करना चाहिये। सबसे पहले लकड़ी की चौकी पर या मंदिर में माता महागौरी की मूर्ति स्थापित करें। इसके बाद चौकी पर सफेद वस्त्र बिछाकर उस पर माता महागौरी के यंत्र की स्थापना करें। मां सौंदर्य प्रदान करने वाली देवी हैं। हाथ में श्वेत पुष्प लेकर मां का ध्यान करें। मां का गौर वर्ण है, इस गौर वर्ण की तुलना शंख, चन्द्रमा और कुंद के पुष्प से की गयी है।।

इनकी आयु आठ वर्ष की मानी जाती है यथा – ‘अष्टवर्षा भवेद् गौरी।’ इनके समस्त वस्त्र एवं आभूषण आदि भी श्वेत हैं। महागौरी की चार भुजाएं हैं तथा इनका वाहन वृषभ है। इनके ऊपर के दाहिने हाथ में अभय मुद्रा और नीचे वाले दाहिने हाथ में त्रिशूल विराजमान है। ऊपरवाले बाएं हाथ में डमरू और नीचे के बाएं हाथ में वर-मुद्रा है। नवरात्रि के आठवें दिन माता महागौरी की पूजा की जाती है।।

माता अपने भक्तों के भीतर पल रही बुराइयों को मिटाकर उनको सद्बुद्धि एवं ज्ञान प्रदान करती है। मां महागौरी की आराधना करने से व्यक्ति को आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है और उसके भीतर श्रद्धा, विश्वास एवं निष्ठा की भावनायें प्रबल होती है। अष्टमी के दिन कन्या पूजन करना श्रेष्ठ माना जाता है। कन्याओं की संख्या 9 होनी चाहिए अथवा अभाव में 2 कन्याओं की भी पूजा की जा सकती है। कन्याओं की आयु 2 साल से ऊपर और 10 साल से कम होनी चाहिये।।

भोजन कराने के बाद कन्याओं को दक्षिणा एवं उपहार भी देनी चाहिए। माता महागौरी की आराधना करने से भक्तजनों को जीवन की सही राह का ज्ञान होता है। जिस राह पर चलने से जीव का कल्याण होना निश्चित हो जाता है। तथा व्यक्ति अपने जीवन को सार्थक बना लेता है। जो भी साधक नवरात्रि में माता के इस रूप की आराधना करते हैं माँ उनके समस्त पापों का नाश करती है। अष्टमी के दिन व्रत रहकर मां की पूजा करने और उन्हें भोग लगाकर मां का प्रसाद ग्रहण करने से व्यक्ति के अन्दर के सारे दुष्प्रभाव नष्ट हो जाते हैं।।

आठवें दिन का भोग – जैसा की आप जानते हैं, आठवां दिन या अष्टमी देवी महागौरी को समर्पित होता है। इस दिन भक्तजन श्रद्धा से देवी माँ को नारियल प्रसाद के रूप में चढ़ाते हैं। आठवीं शक्ति “माँ महागौरी” हैं भगवान शिव के कहने पर माँ महाकाली ने तपस्या कर ब्रह्मदेव सें अपने लिए गौर वर्ण का वरदान माँगा था। माँ महागौरी को नारियल, खिचड़ी एवं खीर का भोग भी बहुत ही प्रिय है।।

आज माता महागौरी को कहीं-कहीं नारियल के आलावा हलवे का भोग भी लगाया जाता है। बाद में उस नारियल को किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण को दक्षिणा सहित दान कर दिया जाता है। नवरात्र के आठवें दिन हवन करना चाहिये जिसमें कंडे (गाय के गोबर के उपले) जलाकर उसमें घी, हवन सामग्री, बताशा, लौंग का जोड़ा, पान, सुपारी, कपूर, गूगल, इलायची, किसमिस, कमलगट्टा आदि से हवन करना चाहिये। हो सके तो नवरात्रे के दसों दिन कुँवारी कन्याओं को भोजन करायें।।

संभव न हो तो कम-से-कम अष्टमी के दिन तो अवश्य ही करवाना चाहिये क्योंकि इस दिन इसका विशेष महत्व होता है। कन्या भोजन के बिना नवरात्रि का उपवास एवं पूजन सब अधुरा माना जाता है। अन्य ग्रंथों में नवरात्रि के अवसर पर कन्या पूजन एवं कन्या भोज को अत्यंत ही महत्वपूर्ण बताया गया है। नवरात्रियों में देवी मां के सभी साधक कन्याओं को मां दुर्गा का दूसरा स्वरूप मानकर उनकी पूजा करते हैं। सनातन धर्म के लोगों में सदियों से ही कन्या पूजन और कन्या भोज कराने की परंपरा चली आ रही है।।

अखण्ड सौभाग्य एवं सफलता हेतु आज माता महागौरी की पूजा एवं विशिष्ट भोग।। इस लिंक पर पूरा पढ़ें:

#Panchang_18_October_2026

पूर्वाषाढा नक्षत्र के जातकों का गुण एवं स्वभाव:- पूर्वाषाढा में जन्म लेने वाला जातक थोडा नकचढ़ा और उग्र स्वभाव के होने बावजूद कोमल हृदयी और दूसरों से स्नेह रखने वाला होता है। आप जीवन में सकारत्मक विचारधारा से आगे बढ़ते हुए अपने लक्ष्य प्राप्त करते हैं। आपका व्यक्तित्व दूसरों पर हावी रहता है परन्तु आप एक संवेदनशील व्यक्ति हैं जो दूसरों की मदद के लिए सदैव तैयार रहतें है।।

अपने इन्ही गुणों के कारण आप को बहुत अधिक प्रेम एवं सम्मान भी मिलता है। परन्तु अपनी चंचल बुद्धि के कारण आप अधिक वफादार नहीं होते हैं। और कभी कभी अनैतिक कार्यों में भी लिप्त हो जाते हैं। कुल मिलकर आप एक जटिल व्यक्ति हैं जिसे समझाना मुश्किल है। इस नक्षत्र में जन्मे जातक बुद्धिजीवी होते हैं और अपनी मेहनत और सत्यनिष्ठा के कारण आगे बढ़ते हैं। जीवन में कई बार जहाँ आपको असंभावित व्यक्तियों से मदद मिलती है वहीँ करीबी और मित्रों से धोखा।।

आप बेहद हिम्मती व्यक्ति होंगे परन्तु कभी कभी निर्णायक स्तिथि में पहुँचने के लिए किसी दूसरे का मार्गदर्शन आपके लिए आवश्यक हो जाता है। किसी निर्णय पर पहुंचकर आपको हिलाना संभव नहीं है। इसी कारण आप कभी कभी जिद्दी भी समझे जाते हैं। आपको अपने कार्यों में किसी का हस्तक्षेप कतई पसंद नहीं है। फिर चाहे आप कितने भी गलत क्यों न हों।।

यदि पूर्वाषाढा में जन्मे जातक व्यवसाय में हो तो अपने अधीनस्थ कर्मचारियों के चुनाव में अधिक सतर्क रहें। क्योंकि उनकी सफलता इन्ही करमचारियों पर निर्भर करती है। वैसे आपके लिए मेडिकल, कला, दर्शन शास्त्र और विज्ञान से सम्बंधित क्षेत्र सर्वोत्तम होता हैं। आपका जिद्दी और कठोर स्वभाव ही आपके लिए जीवन में रुकावटें लेकर आता है। 32 वर्ष तक आप संघर्षरत रहेंगे और 50 वर्ष तक आते-आते आप अपने करियर में चमकते हैं।।

जीवन में माता-पिता का सहयोग ना के बराबर रहता है। परन्तु भाई बहनों के प्रेम और सहयोग के कारण आप सफलता प्राप्त करते हैं। व्यवसायिक दाईत्व के कारण आपको अपने जन्म स्थल से दूर जाना पड़ सकता है। आपका विवाह थोडा विलम्ब से होता है। परन्तु एक अच्छे जीवन साथी के कारण आपका दांपत्य जीवन सुखमय एवं आनंददायक हो जाता है। आपका अपनी पत्नी और ससुराल पक्ष से बेहद लगाव रहेगा।।

आपकी संतान बुद्धिमान एवं आपका नाम रोशन करने वाली होगी। पूर्वाषाढा में जन्मी जातिकायें धार्मिक, शीलवान और बहुत ही नम्र स्वभाव की होती हैं। झूठ से नफरत करने वाली एवं ईश्वर में पूर्ण आस्था रखने वाली होती है। दया भाव एवं दान पुण्य करना इनके स्वभाव में ही होता है। पूर्वाषाढा में जन्मे जातकों की ऊँचाई औसतन सामान्य व्यक्ति से अधिक होती है। इसीलिए इन्हें कमर और कुल्हे का दर्द, टी बी, मधुमेह, रक्त विकार और कैंसर जैसी बीमारियाँ हो सकती है।।

प्रथम चरण:- पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र का स्वामी ग्रह शुक्र है। इसीलिए इस नक्षत्र पर शुक्र का प्रभाव रहता है। इसी वजह से जातक प्रेम करने वाला तथा जीवन को जीने की कला जानने वाला होता है। पूर्वाषाढा नक्षत्र के प्रथम चरण का स्वामी सूर्य हैं। दोनों ग्रह परस्पर शत्रु होते हुए भी तेजस्वी हैं। इसलिए इस चरण में जन्मा जातक अपनी जाती का तेजस्वी एवं श्रेष्ठ व्यक्ति होता है। गुरु की दशा शुभ फल देती है। सूर्य की दशा में जातक का सम्पूर्ण भाग्योदय होता है तथा शुक्र की दशा सामान्य जाती है।।

द्वितीय चरण:- पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र का स्वामी ग्रह शुक्र है। इसके द्वितीय चरण का स्वामी बुध हैं। गुरु एवं शुक्र दोनों आचार्य एवं बुद्धि प्रधान ग्रह हैं। परस्पर शत्रु होते हुए भी तेजस्वी हैं। बुध और शुक्र की मित्रता के कारण व्यक्ति राजा तुल्य पराक्रमी एवं बुद्धिशाली होता है। गुरु की दशा उत्तम फल देती है। सूर्य की दशा में जातक का सम्पूर्ण भाग्योदय होता है। बुध की दशा भी श्रेष्ठ फल देती है तथा शुक्र की दशा सामान्य जाती है।।

तृतीय चरण:- पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र का स्वामी ग्रह शुक्र है। इसके तृतीय चरण का स्वामी भी शुक्र हैं। शुक्र के वजह से जातक तेजस्वी होता हैं। इसलिए इस चरण में जन्मा जातक प्रिय, मीठी एवं हितकर वाणी बोलने वाला होता है। गुरु की दशा शुभ फल देती है। शुक्र की दशा में जातक का सम्पूर्ण भाग्योदय होता है। शुक्र की दशा कभी भी अशुभ फल नहीं देती है।।

चतुर्थ चरण:- पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र का स्वामी ग्रह शुक्र है। इसके चतुर्थ चरण का स्वामी मंगल हैं। दोनों ग्रह गुरु और शुक्र परस्पर शत्रु ग्रह हैं। मंगल से भी शुक्र की शत्रुता होती है। इसलिए इस चरण में जन्मा जातक संघर्ष करता हुआ धनी होगा। गुरु की दशा शुभ फल देती है। सूर्य की दशा में जातक का सम्पूर्ण भाग्योदय होता है। मंगल की दशा विदेशों की यात्रा या तीर्थ यात्रा कराएगी शुक्र की दशा सामान्य जाती है।।

#Panchang_18_October_2026

मित्रों, आज रविवार को सुबह भगवान सूर्य को ताम्बे के एक लोटे में लाल चन्दन, गुड़ और लाल फुल मिलाकर अर्घ्य इस मन्त्र से प्रदान करें। अथ मन्त्रः- एही सूर्य सहस्रांशो तेजो राशे जगत्पते। अनुकम्प्य मां भक्त्या गृहाणार्घ्य दिवाकर।। अथवा गायत्री मन्त्र से भी सूर्यार्घ्य दे सकते हैं।।

इसके बाद आदित्यह्रदयस्तोत्रम् का पाठ करना चाहिये। भोजन में मीठा भोजन करना चाहिये नमक का परित्याग करना अत्यन्त श्रेयस्कर होता है। इस प्रकार से किया गया रविवार का पूजन आपको समाज में सर्वोच्च प्रतिष्ठा एवं अतुलनीय धन प्रदान करता है। क्योंकि सूर्य धन और प्रतिष्ठा का कारक ग्रह है।।

दिशाशूल – रविवार को पश्चिम दिशा की यात्रा नहीं करनी चाहिये, यदि अत्यावश्यक हो तो पान एवं घी खाकर यात्रा कर सकते है।।

रविवार का विशेष – रविवार के दिन तेल मर्दन करने से ज्वर (बुखार लगता) होता हैं – (मुहूर्तगणपति)।।

रविवार को क्षौरकर्म (बाल, दाढी अथवा नख काटने या कटवाने) से बुद्धि और धर्म की हानि होती है। (महाभारत अनुशासनपर्व)।।

विशेष जानकारी – मित्रों, रविवार के दिन, चतुर्दशी एवं अमावस्या तिथियों में तथा श्राद्ध एवं व्रत के दिन स्त्री सहवास नहीं करना चाहिये। साथ ही तिल का तेल, लाल रंग का साग तथा कांसे के पात्र में भोजन करना भी शास्त्रानुसार मना है अर्थात ये सब नहीं करना चाहिये।।

#Panchang_18_October_2026

रविवार ध्रुव प्रकृति का दिन माना जाता है। रविवार भगवान सूर्य का दिन होता है। यह भगवान विष्णु का दिन भी माना जाता है। वैदिक सनातन धर्म में इसे सर्वश्रेष्ठ वार माना गया है। अच्छा स्वास्थ्य व तेजस्विता पाने के लिए रविवार के दिन उपवास रखना चाहिए। प्रचलन से सप्ताह का पहला वार सोमवार को माना जाता है क्योंकि रविवार को छुट्टी का नाम घोषित है। परंतु सही मायने में तो रविवार सप्ताह का प्रथम वार ही है। परंतु रविवार को कुछ ऐसे कार्य जिसे यदि आप करते हैं तो इससे आपन नुकसान उठाना पड़ सकता है।।

रविवार के दिन पश्चिम और वायव्य दिशा में यात्रा न करें। इन दिशाओं में यात्रा करना जरूरी हो तो रविवार को दलिया, घी या पान खाकर या इससे पहले पांच कदम पीछे चलकर ही इस दिशा में जाएं क्योंकि इस दिन खासकर पश्चिरम में दिशा का शूल माना जाता है। रविवार को तांबे से निर्मित चीजों को बेचने से बचना चाहिए। तांबे के अलावा सूर्य से संबंधित अन्य धातु या वस्तुएं भी ना बेचें।।

रविवार के दिन नीले, काले, कत्थई और ग्रे कलर के कपड़े नहीं पहनना चाहिए। काले या नीले से मिलते जुलते कपड़े तो कदापि ना पहनें। रविवार को नमक नहीं खाना चाहिए। इससे स्वास्थ्य पर असर पड़ता है और हर कार्य में बाधा आती है। खास कर सूर्यास्त के बाद तो नमक बिलकुल भी नहीं खाना चाहिए।।

रविवार को दिन में सहवास करना और मांस एवं मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए। इस दिन शनि से संबंधित पदार्थों का सेवन भी नहीं करना चाहिए। आमतौर पर लोग रविवार को ही बाल कटाते हैं परंतु इस दिन बाल कटाने से सूर्य कमजोर होता है। इस दिन शरीर में तेल मालिश भी नहीं करना चाहिए। क्योंकि यह सूर्य का दिन होता है और तेल शनि का होता है।।

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मित्रों, रविवार सप्ताह का प्रथम दिन होता है, इसके अधिष्ठात्री देव सूर्य को माना जाता है। इस दिन जिस व्यक्ति का जन्म होता है वह व्यक्ति तेजस्वी, गर्वीले और पित्त प्रकृति के होते है। इनके स्वभाव में क्रोध और ओज भरा होता है तथा ये चतुर और गुणवान होते हैं। इस दिन जन्म लेनेवाले जातक उत्साही और दानी होते हैं तथा संघर्ष की स्थिति में भी पूरी ताकत से काम करते हैं।।

रविवार को जन्म लेनेवाले जातक सुन्दर एवं गेंहूए रंग के होते हैं। इनमें तेजस्विता का गुण स्वाभाविक ही होता है। महत्वाकांक्षी होने के साथ ही प्रत्येक कार्य में जल्दबाजी करते है और सफल भी होते हैं। उत्साह इनमें कूट-कूट कर भरा होता है तथा ये परिश्रम से कभी भी घबराते नहीं हैं। ये हर कार्य में रूचि लेने वाले होते हैं परन्तु ये लोग समय के पाबंद नहीं होते। ये जातक अपना करियर किसी भी क्षेत्र में अपने कठिन परिश्रम से बनाने की क्षमता रखते हैं। इनका शुभ दिन रविवार तथा शुभ अंक 7 होता है।।

आज का सुविचार – मित्रों, गलती कबूल़ करने और गुनाह छोङने में कभी देर ना करना। क्योंकि सफर जितना लंबा होगा वापसी उतनी ही मुशिकल हो जाती हैं। दुनिया में सिर्फ माँ-बाप ही ऐसे हैं जो बिना किसी स्वार्थ के प्यार करते हैं। कोई देख ना सका उसकी बेबसी जो सांसें बेच रहा हैं गुब्बारों में डालकर।।

#Panchang_18_October_2026

सूर्य की महादशा में मंगल विजय और बुध कुष्ठ रोग देता है।।…. आज के इस पुरे लेख को पढ़ने के लिये इस लिंक को क्लिक करें….   वेबसाईट पर पढ़ें:  &  ब्लॉग पर पढ़ें:

अचानक नौकरी छूट जाने के कारण एवं उपाय।। Read More.  वेबसाईट पर पढ़ें:  And   ब्लॉग पर पढ़ें:

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