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नवरात्रि में अखंड ज्योति जलाने के नियम।।

नवरात्रि में अखंड ज्योति जलाने के नियम।। Rules for Akhand Jyoti in Navratri.

अखंड ज्योति का परिचय।। Introduction.

मित्रों, हमने पिछले लेख में अनेकों लेखों में अनेकों प्रकार की चर्चा की थी। यहाँ तक की पितरों की तृप्ति उसके पश्चात अब आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से शारदीय नवरात्रि का पावन पर्व आरंभ होता है। जब घर-घर में माता दुर्गा की स्थापना होती है। इसी स्थापना के साथ अनेक श्रद्धालु नौ दिनों तक निरंतर जलने वाली एक विशेष ज्योति भी प्रज्वलित करते हैं। जिसे अखंड ज्योति कहा जाता है।।

परंतु मित्रों, अखंड ज्योति जलाना जितना पुण्यदायी माना गया है। उतना ही यह नियमों से बंधा हुआ संकल्प भी है। बहुत से लोग उत्साह में ज्योति तो जला देते हैं। फिर दीपक की दिशा, घी की मात्रा, बाती के प्रकार अथवा बीच में ज्योति बुझ जाने जैसी परिस्थितियों में क्या करना चाहिए। यह उन्हें ज्ञात ही नहीं होता है। ऐसे में मन में भय तथा संशय उत्पन्न हो जाता है। जो पूजा के भाव को ही प्रभावित कर देता है।।

इसीलिए आज हम इसी विषय पर विस्तार से समझेंगे कि अखंड ज्योति का वास्तविक अर्थ क्या है। उसे किस समय, किस दिशा में तथा किन सामग्रियों से प्रज्वलित करना चाहिए। नौ दिनों में किन-किन नियमों का पालन आवश्यक माना गया है। ज्योति बुझ जाए तो क्या करें। तथा नवरात्रि के समापन पर उसे किस विधि से शांत करना चाहिए।।

अखंड ज्योति का अर्थ एवं महत्व।। Meaning and Significance of Akhand Jyoti.

मित्रों, अखंड का अर्थ है जो खंडित न हो अर्थात निरंतर जलती रहे। अतः अखंड ज्योति वह दीपक है जो कलश-स्थापना के क्षण से लेकर नवरात्रि की पूर्णाहुति तक बिना रुके जलता रहता है। इसे साधक के संकल्प, श्रद्धा तथा निरंतरता का जीवंत प्रतीक माना जाता है। क्योंकि जिस प्रकार ज्योति नौ दिन तक जगी रहती है, उसी प्रकार साधक का मन भी माता के चरणों में लगा रहता है।।

मान्यता है कि अखंड ज्योति की उपस्थिति में किया गया पाठ, जप तथा पूजन अधिक शुभ फलदायी होता है। यह भी माना जाता है कि इस ज्योति से घर का वातावरण शुद्ध बना रहता है तथा परिवार में सुख, शांति एवं सकारात्मकता का संचार होता है। परंतु यह सब तभी सार्थक होता है, जब ज्योति को केवल परंपरा-निर्वाह के लिए नहीं, अपितु पूर्ण श्रद्धा तथा नियमों के साथ जलाया जाए।।

यहाँ यह भी समझना आवश्यक है कि अखंड ज्योति नवरात्रि-पूजन की अनिवार्य शर्त नहीं है। अनेक परिवारों में केवल प्रातः तथा सायं दीपक जलाकर भी नौ दिन की पूजा पूर्ण श्रद्धा से की जाती है। और वह भी उतनी ही शास्त्र-सम्मत मानी जाती है। अखंड ज्योति एक विशेष संकल्प होती है। जिसे वही लें जो इसके सभी नियमों को निभा सकें।।

संकल्प तथा स्थापना का सही क्रम।। Correct Sequence of Sankalp and Sthapana.

मित्रों, अखंड ज्योति का आरंभ प्रतिपदा के दिन कलश-स्थापना के शुभ मुहूर्त में किया जाता है। सर्वप्रथम प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें तथा पूजा-स्थान को गंगाजल से शुद्ध करें। इसके पश्चात श्रीगणेश जी का पूजन करके कलश-स्थापना करें। और फिर हाथ में जल, अक्षत तथा पुष्प लेकर नौ दिन अखंड ज्योति जलाने का संकल्प लें।।

संकल्प के पश्चात ही दीपक को प्रज्वलित किया जाता है। ज्योति जलाते समय सर्वप्रथम माता दुर्गा तथा अग्नि देवता का स्मरण करें। साथ ही यह प्रार्थना करें कि नौ दिनों तक यह ज्योति निर्विघ्न जलती रहे तथा आपकी साधना में कोई बाधा न आए। इस क्रम का पालन करने से ज्योति का आरंभ विधिपूर्वक तथा शुभ माना जाता है।।

ज्योति जलाते समय “शुभं करोति कल्याणं आरोग्यं धनसंपदा। शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते।।” इस दीप-मंत्र का उच्चारण करना भी शुभ फलदायी माना जाता है। इसके बाद “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे” इस नवार्ण मंत्र का जप करना भी परंपरा में विशेष महत्व रखता है।।

दीपक की दिशा तथा स्थान।। Direction and Place of the Lamp.

मित्रों, वास्तु तथा पूजा-परंपरा दोनों के अनुसार अखंड ज्योति को पूजा-स्थान के आग्नेय कोण अर्थात दक्षिण-पूर्व दिशा में रखना शुभ माना जाता है, क्योंकि यह दिशा अग्नि तत्व की मानी गई है। यदि घर में आग्नेय कोण में स्थान उपलब्ध न हो, तो माता की प्रतिमा के सामने दाईं ओर दीपक रखा जा सकता है। ज्योति की लौ पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर रहे, तो इसे विशेष रूप से अनुकूल कहा गया है।।

परंपरा के अनुसार घी का दीपक देवी की दाईं ओर तथा तेल का दीपक बाईं ओर रखा जाता है। अखंड ज्योति के लिए सामान्यतः शुद्ध गाय का घी सर्वोत्तम माना जाता है। दीपक को कभी सीधे भूमि अथवा लकड़ी की सतह पर न रखें। उसके नीचे थाली, चावल अथवा अक्षत की एक छोटी ढेरी बनाकर रखना उचित होता है। जिससे दीपक स्थिर रहे तथा पूजा-स्थान सुरक्षित बना रहे।।

दीपक को ऐसे स्थान पर रखें, जहाँ सीधी हवा अथवा पंखे का झोंका न लगे। इसके लिए काँच की चिमनी अथवा जाली का आवरण प्रयोग करना व्यावहारिक उपाय है। साथ ही पर्दे, कागज, सजावटी कपड़े तथा अन्य ज्वलनशील वस्तुएँ दीपक से सुरक्षित दूरी पर रखनी चाहिए। क्योंकि नौ दिन तक जलने वाली ज्योति में सावधानी भी पूजा का ही अंग होता है।।

दीपक, घी, बाती तथा सामग्री के नियम।। Rules for Lamp, Ghee, Wick and Materials.

मित्रों, अखंड ज्योति के लिए मिट्टी, पीतल अथवा ताँबे का स्वच्छ तथा सुदृढ़ दीपक लेना चाहिए। टूटा अथवा चटका हुआ दीपक पूजा में वर्जित माना गया है। दीपक इतना बड़ा हो कि उसमें पर्याप्त मात्रा में घी आ सके। ताकि बार-बार घी डालने की आवश्यकता कम से कम पड़े। नए दीपक को पहले जल से धोकर शुद्ध कर लेना चाहिए।।

बाती के लिए शुद्ध रुई की लंबी बाती उपयुक्त मानी जाती है। कई परिवार रक्षा-सूत्र अर्थात मौली से बनी लाल बाती का भी प्रयोग करते हैं। बाती इतनी मोटी तथा लंबी रखें कि वह आसानी से न जले-गले, और बीच-बीच में उसे थोड़ा आगे सरकाने की सुविधा बनी रहे। अतिरिक्त बातियाँ तथा घी पहले से तैयार रखना बुद्धिमानी माना जाता है।।

घी अथवा तेल में किसी भी प्रकार की मिलावट न हो, इसका ध्यान अवश्य रखें। यदि घी का दीपक जलाना संभव न हो, तो शुद्ध तिल अथवा सरसों के तेल का दीपक भी जलाया जा सकता है। परंतु शुभ तथा उत्तम फल के लिए घी को ही श्रेष्ठ कहा गया है। ज्योति में कभी भी बासी, अशुद्ध अथवा जूठे हाथ से स्पर्श किया हुआ घी न डालें।।

नौ दिनों में पालन करने योग्य नियम।। Rules to Follow During the Nine Days.

मित्रों, अखंड ज्योति जलाने वाले को इन नौ दिनों में पवित्रता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। प्रतिदिन स्नान के पश्चात ही दीपक को स्पर्श करना चाहिए। सात्त्विक भोजन करना चाहिए तथा प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा एवं तामसिक पदार्थों से पूर्णतः दूर रहें। संयम, ब्रह्मचर्य तथा सत्य-भाषण का पालन करना भी इस साधना का आवश्यक अंग माना गया है।।

इन नौ दिनों में घर को कभी भी पूर्णतः सूना न छोड़ें। परिवार का कोई न कोई सदस्य ज्योति के समीप अथवा घर में अवश्य उपस्थित रहे। क्योंकि निरंतरता ही इस साधना का मूल है। रात्रि में सोने से पूर्व घी की मात्रा देखकर पर्याप्त घी डाल दें। यदि परिवार में कई सदस्य हों, तो बारी-बारी से ज्योति की देखभाल का दायित्व बाँट लेना सुविधाजनक रहता है।।

प्रतिदिन प्रातः तथा सायं माता की आरती करें, दुर्गा सप्तशती अथवा दुर्गा चालीसा का पाठ करें तथा नवार्ण मंत्र का जप करें। घर में क्लेश, कटु वचन तथा किसी का अपमान करने से बचें। चमड़े की वस्तुओं का प्रयोग पूजा-स्थान के समीप न करें। सबसे बढ़कर, ज्योति के सामने मन को शांत रखें। क्योंकि भाव की शुद्धता ही सभी नियमों का सार होता है।।

ज्योति बुझ जाए तो क्या करें।। What to Do If the Flame Goes Out.

मित्रों, यह प्रश्न सर्वाधिक पूछा जाता है। और इसी से लोगों के मन में सबसे अधिक भय भी रहता है। यदि हवा के झोंके, घी समाप्त हो जाने अथवा किसी अन्य कारण से ज्योति बुझ जाए। तो घबराने की आवश्यकता नहीं है। इसे अपशकुन समझकर अनावश्यक चिंता न करें। क्योंकि शास्त्र श्रद्धा तथा भाव को प्रधानता देते हैं, भय को नहीं।।

ऐसी स्थिति में सर्वप्रथम माता से क्षमा-याचना करें। दीपक में शुद्ध घी तथा नई बाती डालें। और किसी अन्य जलते हुए दीपक अथवा शुद्ध अग्नि से उसे पुनः प्रज्वलित करें। तत्पश्चात “ॐ दूं दुर्गायै नमः” इस मंत्र का जप करके माता से प्रार्थना करें कि अनजाने में हुई त्रुटि को क्षमा करें। साथ ही माता से भावपूर्वक प्रार्थना करें कि साधना को निर्विघ्न रखें।।

परंपरा में कुछ परिवार ऐसी स्थिति में आगे की पूजा के लिए ब्राह्मण से परामर्श लेना भी उचित मानते हैं। यदि ज्योति बार-बार बुझ रही हो, तो उसका कारण खोजें, जैसे वायु का प्रवाह, दीपक की बनावट अथवा बाती की मोटाई, और उसे सुधारें। यह व्यावहारिक समाधान भी साधना को निर्विघ्न बनाने का ही एक रूप है।।

किन परिस्थितियों में अखंड ज्योति का संकल्प न लें।। When Not to Take the Vow of Akhand Jyoti.

मित्रों, अखंड ज्योति का संकल्प तभी लें, जब आप नौ दिन तक उसकी देखभाल निभा सकें। यदि घर में कोई सदस्य सदैव उपस्थित नहीं रह सकता, अथवा आपको बीच में यात्रा करनी पड़ेगी, तो ऐसी स्थिति में संकल्प लेकर उसे अधूरा छोड़ने की अपेक्षा सामान्य दीपक जलाकर पूजा करना अधिक उचित माना जाता है।।

इसी प्रकार यदि परिवार में सूतक अर्थात जन्म अथवा मृत्यु संबंधी अशौच की स्थिति हो, तो पूजा-विधान में परिवर्तन हो सकता है। ऐसे में अपनी कुल-परंपरा के अनुसार किसी विद्वान ब्राह्मण से मार्गदर्शन अवश्य लें। मित्रों, श्रद्धा की सच्चाई संकल्प के आकार से कहीं अधिक महत्वपूर्ण होती है।।

अखंड ज्योति के समापन की विधि।। Method of Concluding Akhand Jyoti.

मित्रों, नवरात्रि की पूर्णाहुति अर्थात नवमी के हवन तथा आरती के पश्चात अखंड ज्योति का समापन किया जाता है। समापन से पूर्व माता की विशेष आरती करें। उन्हें भोग अर्पित करें तथा नौ दिनों में हुई किसी भी त्रुटि के लिए क्षमा-प्रार्थना भी करें। कन्या-पूजन तथा दान-दक्षिणा के पश्चात ही विसर्जन की प्रक्रिया आरंभ करें।।

ध्यान रहे कि ज्योति को कभी मुँह से फूँककर नहीं बुझाना चाहिए। उसे स्वयं शांत होने दें, अथवा पुष्प या स्वच्छ आवरण से धीरे-धीरे शांत करें। इसे श्रेयस्कर माना जाता है। दीपक के पूर्णतः ठंडा होने के पश्चात उसकी सामग्री तथा अवशेष को बहते जल में प्रवाहित करें। अथवा किसी पवित्र वृक्ष के नीचे श्रद्धापूर्वक रख दें।।

शास्त्रीय प्रमाण।। Scriptural References.

मित्रों, दुर्गा सप्तशती में शरद ऋतु की वार्षिक महापूजा का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। जहाँ देवी स्वयं कहती हैं कि शरत्काल में की जाने वाली महापूजा में उनके माहात्म्य का श्रवण करने वाला भक्त समस्त बाधाओं से मुक्त होता है। देवीभागवत पुराण में भी शारदीय तथा वासंतिक नवरात्रि की उपासना की महिमा विस्तार से वर्णित है।।

पुराणों में दीपदान की महिमा अनेक स्थानों पर बताई गई है। तथा दीप को अंधकार-नाशक तथा पापहारी माना गया है। धर्मसिंधु तथा निर्णयसिंधु जैसे निबंध-ग्रंथों में नवरात्रि की तिथि-निर्णय तथा पूजन-विधि का विवेचन मिलता है। यह भी स्पष्ट है कि अखंड ज्योति के स्थानीय नियम कुल-परंपरा तथा क्षेत्र के अनुसार कुछ भिन्न भी हो सकते हैं। अतः अपने ब्राह्मण का मार्गदर्शन लेना उचित होता है।।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न।। Frequently Asked Questions. (FAQ)

प्रश्न 1. अखंड ज्योति कब जलानी चाहिए।। When Should Akhand Jyoti Be Lit.

उत्तर:- अखंड ज्योति प्रतिपदा के दिन कलश-स्थापना तथा संकल्प के पश्चात जलाई जाती है। तथा नवरात्रि की पूर्णाहुति तक निरंतर जलती रहती है।।

प्रश्न 2. अखंड ज्योति किस दिशा में रखनी चाहिए।। In Which Direction Should Akhand Jyoti Be Placed.

उत्तर:- अखंड ज्योति को आग्नेय कोण अर्थात दक्षिण-पूर्व दिशा में अथवा माता की प्रतिमा के दाईं ओर रखना शुभ माना जाता है। तथा लौ पूर्व अथवा उत्तर की ओर रहे तो उत्तम है।।

प्रश्न 3. अखंड ज्योति में घी का प्रयोग आवश्यक है अथवा तेल का भी हो सकता है।। Is Ghee Necessary or Can Oil Also Be Used.

उत्तर:- शुद्ध गाय का घी सर्वोत्तम माना गया है। परंतु यदि यह संभव न हो, तो शुद्ध तिल अथवा सरसों के तेल का दीपक भी जलाया जा सकता है।।

प्रश्न 4. यदि अखंड ज्योति बुझ जाए तो क्या करना चाहिए।। What Should Be Done If Akhand Jyoti Goes Out.

उत्तर:- घबराएँ नहीं। माता से क्षमा-याचना करके दीपक में नई बाती तथा शुद्ध घी डालें। उसे पुनः प्रज्वलित करें और देवी के मंत्र का जप करें। आवश्यकता होने पर विद्वान ब्राह्मण से परामर्श लें।।

प्रश्न 5. क्या अखंड ज्योति जलाना नवरात्रि-पूजन के लिए अनिवार्य है।। Is Lighting Akhand Jyoti Compulsory for Navratri Worship.

उत्तर:- नहीं, यह अनिवार्य नहीं है। केवल प्रातः-सायं दीपक जलाकर भी नवरात्रि की पूजा पूर्ण श्रद्धा से की जा सकती है। तथा अखंड ज्योति उन्हीं के लिए है जो इसके नियम निभा सकें।।

लेख का निष्कर्ष।। Conclusion.

मित्रों, अखंड ज्योति केवल एक दीपक नहीं, अपितु साधक के संकल्प, निरंतरता तथा श्रद्धा का प्रतीक भी होता है। इसके लिए उचित समय पर संकल्प, सही दिशा तथा स्थान, शुद्ध घी, मजबूत दीपक, पर्याप्त बाती तथा नौ दिनों तक पवित्र आचरण होना चाहिए। यह सभी नियम इसी निरंतरता को बनाए रखने के साधन होते हैं।।

वैदिक परंपरा के अनुसार माता दुर्गा की नियमित आरती, सप्तशती का पाठ तथा नवार्ण मंत्र का जप इस साधना को पूर्णता प्रदान करते हैं। और यहाँ मैं यही कहूँगा कि नियम चाहे कितने भी हों, उनका उद्देश्य भय उत्पन्न करना नहीं। अपितु मन को माता के चरणों में स्थिर रखना है। यदि कभी चूक हो भी जाए, तो सच्चे हृदय से की गई क्षमा-प्रार्थना को माता अवश्य स्वीकार करती हैं।।

परन्तु मेरी आपको यही सलाह है कि अपनी कुल-परंपरा तथा विशेष परिस्थिति के अनुसार किसी विद्वान, योग्य तथा अनुभवी ब्राह्मण से मार्गदर्शन अवश्य लेना चाहिए। ताकि अखंड ज्योति का संकल्प पूर्ण विधि-विधान तथा निश्चिंत मन से संपन्न हो सके। आप सभी सनातनियों को नवरात्रि के इस पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनायें।।

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