श्रीविश्वकर्मा पूजन विधि कथा एवं आरती।। Shri Vishwakarma Puja katha and Aarati.
लेख का परिचय।। Introduction.
मित्रों, सनातन परंपरा में जितने भी देवी-देवताओं की उपासना की जाती है। उनमें भगवान विश्वकर्मा का स्थान अत्यंत विशिष्ट माना गया है। क्योंकि इन्हें संपूर्ण सृष्टि के निर्माण-कार्य के अधिष्ठाता देवता के रूप में पूजा जाता है। जहाँ अन्य देवी-देवताओं की उपासना सुख, समृद्धि तथा मोक्ष के लिए की जाती है। वहीं भगवान विश्वकर्मा की उपासना विशेष रूप से कारीगरों, शिल्पकारों, इंजीनियरों, तकनीशियनों तथा उन सभी लोगों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। जो अपने हाथों तथा कौशल से किसी वस्तु का निर्माण करते हैं। हर वर्ष कन्या संक्रांति के दिन मनाई जाने वाली विश्वकर्मा पूजा, वर्ष 2026 में गुरुवार, 17 सितंबर को मनाई जाएगी। जिस दिन कारखानों, दुकानों, कार्यालयों तथा घरों में मशीनों, औजारों तथा वाहनों की विधिवत पूजा की जाती है।।
यह पर्व केवल औद्योगिक अथवा तकनीकी क्षेत्र से जुड़े लोगों तक ही सीमित नहीं है। बल्कि इसका महत्व प्रत्येक उस व्यक्ति के लिए है, जो अपने काम, अपने औजार तथा अपने साधनों के प्रति कृतज्ञता का भाव रखता है। पुराणों में भगवान विश्वकर्मा को देवताओं का शिल्पकार तथा वास्तुकला का जनक माना गया है। तथा यह भी वर्णित है कि उन्होंने ही स्वर्गलोक, द्वारका नगरी, इंद्रप्रस्थ तथा लंका जैसे भव्य नगरों का निर्माण किया था। इसके साथ ही देवताओं के अनेक दिव्य अस्त्र-शस्त्र तथा विमान भी उन्हीं की रचनात्मक प्रतिभा का परिणाम माने जाते हैं। इसीलिए उन्हें सृजन तथा निर्माण का साक्षात प्रतीक माना जाता है।।
मित्रों, इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे कि भगवान विश्वकर्मा कौन हैं। तथा शास्त्रों में उनका क्या स्वरूप वर्णित है। विश्वकर्मा पूजा की तिथि तथा इसका महत्व क्या है। इस पूजा की संपूर्ण विधि किस प्रकार संपन्न की जाती है। भगवान विश्वकर्मा जी से जुड़ी पौराणिक कथा क्या है। तथा उनकी आरती किस प्रकार गाई जाती है। यह संपूर्ण जानकारी आपको इस पावन पर्व को श्रद्धा तथा सही विधि के साथ मनाने में सहायक सिद्ध होगी। तथा आपके कार्यक्षेत्र में सफलता, सुरक्षा तथा समृद्धि लाने में भी उपयोगी सिद्ध होगी।।
भगवान विश्वकर्मा कौन हैं।। Who Is Lord Vishwakarma.
मित्रों, पौराणिक ग्रंथों के अनुसार भगवान विश्वकर्मा को सृष्टि के प्रथम शिल्पकार तथा वास्तुकार के रूप में वर्णित किया गया है। तथा इन्हें ब्रह्मा जी के मानस-पुत्र भी माना जाता है। ऋग्वेद में भी विश्वकर्मा नामक देवता का उल्लेख मिलता है। जिन्हें समस्त संसार के रचयिता तथा दृष्टा के रूप में वर्णित किया गया है। स्थापत्य वेद, जो वास्तु तथा भवन-निर्माण से जुड़ा शास्त्र है। उसे भी विश्वकर्मा जी की ही देन माना जाता है। इसीलिए आज भी भवन-निर्माण, मूर्तिकला तथा शिल्पकला से जुड़े लोग उन्हें अपना आराध्य मानते हैं।।
पुराणों में यह भी वर्णित है कि भगवान विश्वकर्मा ने ही भगवान शिव के लिए त्रिशूल, भगवान विष्णु के लिए सुदर्शन चक्र, तथा इंद्र देवता के लिए वज्र जैसे दिव्य अस्त्रों का निर्माण किया था। इसके साथ ही उन्होंने ही पुष्पक विमान का भी निर्माण किया था। जिसका उल्लेख रामायण में मिलता है। तथा जिस पर सवार होकर भगवान श्रीराम माता सीता तथा लक्ष्मण जी के साथ अयोध्या लौटे थे। महाभारत में भी वर्णन मिलता है कि पांडवों की भव्य इंद्रप्रस्थ नगरी तथा उनकी राजसभा का निर्माण भी भगवान विश्वकर्मा जी ने ही किया था। जिसकी सुंदरता तथा भव्यता देखकर स्वयं दुर्योधन भी चकित रह गए थे।।
मित्रों, इसके अतिरिक्त द्वारकाधीश भगवान श्रीकृष्ण की प्रसिद्ध द्वारका नगरी का निर्माण भी विश्वकर्मा जी की ही अद्भुत शिल्पकला का परिणाम मानी जाती है। जो समुद्र के मध्य बसाई गई थी। इन सभी पौराणिक संदर्भों से यह स्पष्ट होता है कि भगवान विश्वकर्मा केवल एक देवता नहीं। बल्कि सृजन, नवाचार तथा तकनीकी कौशल के प्रतीक माने जाते हैं। यही कारण है कि आज के आधुनिक युग में भी इंजीनियर, आर्किटेक्ट, मैकेनिक, बढ़ई, लोहार तथा समस्त तकनीकी क्षेत्र से जुड़े लोग उन्हें अपना आदर्श तथा आराध्य देवता मानते हुए श्रद्धापूर्वक उनकी पूजा करते हैं।।
विश्वकर्मा पूजा की तिथि एवं महत्व।। Date And Importance Of Vishwakarma Puja.
मित्रों, विश्वकर्मा पूजा प्रतिवर्ष कन्या संक्रांति के दिन मनाई जाती है। अर्थात जिस दिन सूर्य देव कन्या राशि में प्रवेश करते हैं। उसी दिन इस पर्व को मनाने की परंपरा है। यह पर्व सौर पंचांग पर आधारित है। इसीलिए यह प्रतिवर्ष लगभग निश्चित तिथि, अर्थात सितंबर मास के मध्य में ही पड़ता है। वर्ष 2026 में यह पर्व गुरुवार, 17 सितंबर को मनाया जाएगा। तथा इस दिन कन्या संक्रांति का क्षण प्रातः लगभग 7 बजकर 58 मिनट पर बताया गया है। तथा पूजा का शुभ मुहूर्त प्रातः 7 बजकर 58 मिनट से दोपहर लगभग 12 बजकर 40 मिनट तक रहेगा। जिसमें अभिजीत मुहूर्त प्रातः 11 बजकर 51 मिनट से दोपहर 12 बजकर 40 मिनट तक सर्वाधिक शुभ माना गया है।।
इस पर्व का सर्वाधिक महत्व औद्योगिक तथा तकनीकी क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए है। जैसे इंजीनियर, आर्किटेक्ट, बढ़ई, लोहार, मैकेनिक, बुनकर, दर्जी तथा समस्त प्रकार के कारीगर, जो प्रतिदिन अपने औजारों तथा मशीनों की सहायता से आजीविका कमाते हैं। इस दिन कारखानों, फैक्ट्रियों, कार्यशालाओं तथा दुकानों में मशीनों, औजारों तथा वाहनों की विधिवत सफाई करके, उन पर तिलक लगाकर तथा फूल-माला अर्पित करके उनकी पूजा की जाती है। ताकि आने वाले समय में कार्य में सफलता, सुरक्षा तथा उन्नति प्राप्त हो सके।।
मित्रों, यह पर्व केवल पूजा-अर्चना तक ही सीमित नहीं, बल्कि इसके पीछे एक गहरा दार्शनिक भाव भी छिपा हुआ है। जो हमें अपने कार्य, अपने साधनों तथा अपने कौशल के प्रति सम्मान तथा कृतज्ञता का भाव सिखाता है। जिस मशीन अथवा औजार की सहायता से हम अपनी आजीविका कमाते हैं। उसकी देखभाल तथा सम्मान करना, तथा वर्ष में एक दिन विशेष रूप से उसकी स्वच्छता तथा पूजा करना। हमारे भीतर श्रम तथा कर्म के प्रति आदर का भाव उत्पन्न करता है। यही कारण है कि यह पर्व भारत के कई राज्यों, विशेष रूप से पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, ओडिशा तथा उत्तर भारत के औद्योगिक क्षेत्रों में अत्यंत भव्यता तथा उत्साह के साथ मनाया जाता है।।
पूजन विधि विस्तार से।। Detailed Puja Vidhi.
मित्रों, विश्वकर्मा पूजा के दिन सबसे पहले प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान करना चाहिए। तथा स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। इसके पश्चात घर के पूजा-स्थल तथा कार्यस्थल दोनों की भली-भांति साफ-सफाई करनी चाहिए। क्योंकि अस्वच्छ स्थान पर देवताओं का आह्वान करना उचित नहीं माना जाता। पूजा आरंभ करने के लिए एक चौकी पर पीले अथवा सफेद रंग का स्वच्छ वस्त्र बिछाकर, उस पर भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा अथवा तस्वीर स्थापित करनी चाहिए। तथा उनके समक्ष घी का दीपक प्रज्वलित करना चाहिए।।
इसके पश्चात भगवान विश्वकर्मा को चंदन, हल्दी, रोली, अक्षत, पुष्प, पान, सुपारी, मौली तथा फल-मिठाई अर्पित करने चाहिए। इसी के साथ-साथ कार्यस्थल पर उपयोग होने वाली सभी मशीनों, औजारों तथा उपकरणों को भी भली-भांति साफ करके, उन्हें उसपर भी तिलक लगाना चाहिए। तथा उन पर पुष्प एवं माला अर्पित करनी चाहिए। जो लोग वाहन चलाते हैं अथवा जिनकी आजीविका वाहनों से जुड़ी होती है, उन्हें अपने वाहनों को भी स्वच्छ करके उनकी पूजा करनी चाहिए। तथा उन पर स्वास्तिक बनाना अत्यंत शुभ माना जाता है।।
मित्रों, पूजा के दौरान ‘ॐ विश्वकर्मणे नमः’ मंत्र का जप करना अत्यंत शुभ माना जाता है। तथा भगवान विश्वकर्मा की कथा सुनने अथवा पढ़ने की भी परंपरा है। इसके पश्चात धूप-दीप दिखाकर, तथा नीचे दी गई आरती के साथ भगवान विश्वकर्मा जी की आरती करनी चाहिए। पूजा के अंत में प्रसाद वितरित किया जाता है। तथा कार्यस्थल पर उपस्थित सभी कर्मचारियों तथा सहयोगियों के साथ मिलकर भोजन ग्रहण करने की भी परंपरा है। जिसे सामूहिक सद्भावना तथा कार्यस्थल में सकारात्मकता बढ़ाने वाला माना जाता है। कुछ स्थानों पर इस दिन पतंग उड़ाने की भी विशेष परंपरा प्रचलित है। विशेष रूप से उत्तर भारत के कुछ क्षेत्रों में।।
विश्वकर्मा जी से जुड़ी पौराणिक कथा।। The Legend Associated With Lord Vishwakarma.
मित्रों, भगवान विश्वकर्मा से जुड़ी एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा के अनुसार, जब देवताओं तथा असुरों के बीच अनेक युद्ध हुआ करते थे। तब देवताओं को शक्तिशाली अस्त्र-शस्त्रों की आवश्यकता महसूस हुई। ऐसे समय में ब्रह्मा जी ने अपने मानस-पुत्र विश्वकर्मा को आदेश दिया कि वे देवताओं के लिए ऐसे दिव्य अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण करें, जो किसी भी शत्रु को परास्त करने में सक्षम हों। भगवान विश्वकर्मा ने अपनी अद्भुत शिल्पकला तथा दिव्य ज्ञान का प्रयोग करते हुए भगवान शिव के लिए त्रिशूल, भगवान विष्णु के लिए सुदर्शन चक्र तथा देवराज इंद्र के लिए वज्र जैसे शक्तिशाली अस्त्रों का निर्माण किया। जिनकी सहायता से देवताओं ने अनेक असुरों पर विजय प्राप्त की।।
एक अन्य कथा के अनुसार, जब भगवान श्रीकृष्ण ने द्वारका में अपना नया राज्य स्थापित करने का निश्चय किया। तब उन्होंने भगवान विश्वकर्मा से समुद्र के मध्य एक ऐसी भव्य तथा सुरक्षित नगरी बनाने का अनुरोध किया, जहाँ यदुवंशी समाज सुरक्षित रूप से निवास कर सके। भगवान विश्वकर्मा ने समुद्र देवता की सहायता से समुद्र में भूमि प्राप्त की, तथा वहाँ स्वर्णमयी, भव्य तथा सुव्यवस्थित द्वारका नगरी का निर्माण किया। जिसमें चौड़ी सड़कें, सुंदर भवन तथा विशाल राजमहल सम्मिलित थे। इस नगरी की भव्यता का वर्णन आज भी पुराणों में अत्यंत श्रद्धा के साथ किया जाता है।।
मित्रों, इसी प्रकार महाभारत काल में जब पांडवों को उनका राज्य मिला, तब भगवान श्रीकृष्ण के परामर्श पर विश्वकर्मा जी ने ही पांडवों के लिए इंद्रप्रस्थ नामक भव्य नगरी तथा उसमें एक अद्भुत राजसभा का निर्माण किया। जिसमें जल तथा स्थल का ऐसा अद्भुत भ्रम उत्पन्न किया गया था कि स्वयं दुर्योधन भी उस सभा में भ्रमित होकर जल समझकर स्थल पर से हट गए। तथा स्थल समझकर जल में गिर पड़े थे। इस घटना ने आगे चलकर महाभारत के युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार करने में भी एक भूमिका निभाई। इन सभी कथाओं से यह स्पष्ट होता है कि भगवान विश्वकर्मा की शिल्पकला ना केवल भौतिक निर्माण तक सीमित थी। बल्कि उसका प्रभाव इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाओं पर भी पड़ा।।
भगवान विश्वकर्मा की आरती।। Aarti Of Lord Vishwakarma.
मित्रों, भगवान विश्वकर्मा की पूजा के अंत में उनकी आरती करने की परंपरा है। जिसे संपूर्ण श्रद्धा तथा भक्ति-भाव के साथ गाया जाता है। आरती का आरंभ इस प्रकार किया जा सकता है।।
जय जय श्री विश्वकर्मा प्रभु, जय जय शिल्पी भगवान।।
सकल सृष्टि के रचयिता तुम, तुम ही जग के निर्माण।।
जय जय श्री विश्वकर्मा प्रभु, जय जय शिल्पी भगवान।।
त्रिशूल शिव को तुमने दिया, चक्र दिया भगवान।।
वज्र इंद्र के हाथ थमाया, रचे अनेकों धाम।।
जय जय श्री विश्वकर्मा प्रभु, जय जय शिल्पी भगवान।।
द्वारका नगरी रची तुमने, इंद्रप्रस्थ महान।।
जय जय श्री विश्वकर्मा प्रभु, जय जय शिल्पी भगवान।।
यंत्र औज़ार मशीन सभी में, बसते हो भगवान।।
कारीगर शिल्पी सब जन को, देते सुख वरदान।।
आरती जो कोई गावे, पावे सुख कल्याण।।
जय जय श्री विश्वकर्मा प्रभु, जय जय शिल्पी भगवान।।
इस आरती को गाते समय भक्तगण दीपक तथा घंटी का प्रयोग करते हैं। तथा अंत में सभी उपस्थित भक्त मिलकर भगवान विश्वकर्मा की जय-जयकार करते हैं। तथा प्रसाद भी ग्रहण करते हैं। इसी प्रकार आरती आगे दुसरे पेज पर आपको मिल जाएगी। आरती का समापन इस प्रकार किया जाता है।।
ध्यान रखने योग्य कुछ ज़रूरी बातें।। A Few Important Points To Keep In Mind.
मित्रों, विश्वकर्मा पूजा मनाते समय यह ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है कि पूजा से पूर्व मशीनों तथा औजारों को अच्छी तरह साफ करते समय उनकी सुरक्षा-व्यवस्था का भी पूरा ध्यान रखा जाए। विशेष रूप से बिजली से चलने वाली मशीनों की सफाई करते समय बिजली की आपूर्ति बंद रखनी चाहिए। ताकि कोई दुर्घटना ना हो। इसके साथ ही पूजा में उपयोग होने वाले दीपक तथा अगरबत्ती को भी सावधानीपूर्वक जलाना चाहिए। विशेष रूप से उन स्थानों पर जहाँ ज्वलनशील पदार्थ अथवा रसायन रखे गए हों।।
यह भी स्मरण रखना चाहिए कि यह पर्व केवल एक दिन की पूजा तक सीमित नहीं। बल्कि इसका वास्तविक संदेश यही है कि हमें वर्षभर अपने कार्य, अपने औजारों तथा अपने कौशल के प्रति सम्मान तथा जिम्मेदारी का भाव बनाए रखना चाहिए। मशीनों तथा उपकरणों का नियमित रख-रखाव करना, कार्यस्थल पर स्वच्छता तथा अनुशासन बनाए रखना। साथ ही सहकर्मियों के साथ मिलकर काम करने की भावना रखना। यह सभी विश्वकर्मा जी की सच्ची उपासना का हिस्सा माना जाता है।।
मित्रों, अंत में यह भी ध्यान रखें कि पूजा की तिथि तथा मुहूर्त स्थान के अनुसार कुछ मिनटों तक भिन्न हो सकते हैं। इसलिए अपने शहर के स्थानीय पंचांग से समय की पुष्टि अवश्य कर लेनी चाहिए। इसके साथ ही यह भी समझना आवश्यक है कि यह पर्व श्रद्धा तथा कृतज्ञता का प्रतीक होता है। इसलिए इसे मनाते समय दिखावे के बजाय सच्चे मन तथा भक्ति-भाव को प्राथमिकता देनी चाहिए। ताकि इस पर्व का संपूर्ण तथा वास्तविक लाभ प्राप्त हो सके।।
निष्कर्ष, सृजन तथा कौशल के देवता की आराधना।। Conclusion, Worship Of The God Of Creation And Craftsmanship.
मित्रों, तो अब स्पष्ट है कि विश्वकर्मा पूजा केवल मशीनों तथा औजारों की पूजा तक सीमित नहीं, बल्कि यह श्रम, कौशल तथा सृजन के प्रति सम्मान व्यक्त करने का एक संपूर्ण तथा सार्थक पर्व है। भगवान विश्वकर्मा, जिन्होंने देवताओं के अस्त्र-शस्त्र से लेकर भव्य नगरों तक का निर्माण किया। वे आज भी हर उस व्यक्ति के प्रेरणा-स्रोत हैं। जो अपने हाथों तथा अपनी बुद्धि से कुछ नया रचना चाहता है।।
इस पूरे लेख का सार यही है कि इस वर्ष विश्वकर्मा पूजा मनाते समय सही तिथि, सही मुहूर्त तथा शास्त्र-सम्मत पूजन-विधि का पालन करें। भगवान विश्वकर्मा की कथा तथा आरती का श्रद्धापूर्वक पाठ करें। तथा अपने कार्यस्थल एवं उपकरणों के प्रति सम्मान का भाव बनाए रखें। जब यह सभी बातें श्रद्धा तथा नियमितता के साथ अपनाई जाती हैं, तभी इस पर्व का संपूर्ण फल प्राप्त होता है।।
मित्रों, हमारे पूर्वजों ने इस पर्व को हज़ारों वर्षों के अनुभव तथा आस्था के आधार पर स्थापित किया। तथा इसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी सहेजकर रखा। आज के औद्योगिक तथा तकनीकी युग में भी यह पर्व उतना ही प्रासंगिक बना हुआ है, जितना पहले था। क्योंकि आज भी हर कारखाना, हर कार्यशाला तथा हर कार्यस्थल किसी ना किसी मशीन अथवा औजार पर निर्भर करता है। इसलिए श्रद्धा तथा कृतज्ञता के साथ इस पर्व को मनाकर, हम भगवान विश्वकर्मा की कृपा प्राप्त कर सकते हैं। तथा अपने कार्यक्षेत्र में सुरक्षा, सफलता तथा समृद्धि का आशीर्वाद पा सकते हैं।।
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