श्री गणेश चतुर्थी पूजन का शुभ मुहूर्त एवं पूजन विधि।। Ganesh Chaturthi Muhurat And Puja Vidhi.
लेख का परिचय।। Introduction.
मित्रों, सनातन परंपरा में जितने भी पर्व मनाए जाते हैं, उनमें गणेश चतुर्थी का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। क्योंकि यह पर्व विघ्नहर्ता, बुद्धि तथा समृद्धि के देवता श्री गणेश जी के प्राकट्य-दिवस के रूप में मनाया जाता है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व, वर्ष 2026 में सोमवार, 14 सितंबर को पड़ रहा है। तथा इसी दिन से देशभर में दस दिवसीय गणेशोत्सव का शुभारंभ होगा। जो अनंत चतुर्दशी के दिन गणपति विसर्जन के साथ संपन्न होगा। इस पर्व की मान्यता भविष्य पुराण, गणेश पुराण तथा स्कंद पुराण जैसे प्राचीन ग्रंथों में विस्तार से वर्णित है। जिसमें बताया गया है कि माता पार्वती ने भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के मध्याह्न काल में श्री गणेश जी को उत्पन्न किया था। इसीलिए इस तिथि को गणेश जी का जन्मोत्सव माना जाता है।।
यह पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि विघ्नों के नाश तथा नई शुरुआत के संकल्प का प्रतीक भी माना जाता है। शास्त्रों में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जो व्यक्ति श्रद्धा तथा विधि-विधान से श्रीगणेश चतुर्थी का व्रत तथा पूजन करता है। उसके जीवन की समस्त बाधाएं दूर होती हैं। तथा उसे बुद्धि, विद्या एवं सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। इसके साथ ही इस दिन से जुड़ा एक अत्यंत महत्वपूर्ण नियम भी है। जिसे चंद्र दर्शन दोष अथवा मिथ्या कलंक दोष भी कहा जाता है। जिसके अनुसार इस तिथि को चंद्रमा का दर्शन वर्जित माना गया है। यह नियम धर्मसिंधु जैसे ग्रंथों में विस्तार से वर्णित है। तथा इसके पीछे भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी स्यमंतक मणि की प्रसिद्ध कथा भी शास्त्रों में उल्लेखित है।।
मित्रों, इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे कि गणेश चतुर्थी 2026 किस तिथि तथा किस दिन मनाई जाएगी। गणपति स्थापना तथा पूजन के लिए शुभ मुहूर्त क्या है। शास्त्रों में इस पर्व का क्या महत्व वर्णित है। गणपति स्थापना के क्या नियम हैं। संपूर्ण पूजन विधि किस प्रकार संपन्न की जाए। चंद्र दर्शन दोष की कथा तथा इसका शास्त्रीय आधार क्या है। तथा भूलवश चंद्र दर्शन हो जाने पर इसके निवारण के कौन से उपाय शास्त्रों में बताए गए हैं। यह संपूर्ण जानकारी आपको इस पावन पर्व को शास्त्र-सम्मत ढंग से, पूर्ण श्रद्धा तथा सही विधि के साथ मनाने में सहायक सिद्ध होगी।।
गणेश चतुर्थी 2026 की तिथि एवं शुभ मुहूर्त।। Ganesh Chaturthi 2026 Date And Shubh Muhurat.
मित्रों, पञ्चांग के अनुसार वर्ष 2026 में भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया उपरान्त चतुर्थी तिथि सोमवार, 14 सितंबर 2026 को प्रातः लगभग 7 बजकर 6 मिनट पर आरंभ होगी। तथा यह तिथि अगले दिन अर्थात 15 सितंबर 2026 को प्रातः लगभग 7 बजकर 44 मिनट तक रहेगी। चूँकि गणेश जी का जन्म मध्याह्न काल में हुआ माना जाता है। तथा चतुर्थी तिथि 14 सितंबर के दिन मध्याह्न-काल को पूर्ण रूप से व्याप्त कर रही है। इसीलिए गणेश चतुर्थी का पर्व तथा गणपति-स्थापना 14 सितंबर, सोमवार के दिन ही की जाएगी। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि तिथि से जुड़े यह समय स्थान के अनुसार कुछ मिनटों तक भिन्न हो सकते हैं। इसलिए अपने शहर के स्थानीय पंचांग से भी इसकी पुष्टि अवश्य कर लेनी चाहिए।।
गणपति स्थापना तथा पूजन के लिए मध्याह्न काल का समय सर्वाधिक शुभ माना जाता है। तथा पंचांग की गणना के अनुसार 14 सितंबर 2026 को यह शुभ मुहूर्त लगभग सुबह 11 बजे से दोपहर 1 बजकर 30 मिनट के आस-पास तक बताया गया है। इस अवधि में गणपति की स्थापना करना, तथा प्राण-प्रतिष्ठा का संपूर्ण अनुष्ठान संपन्न करना अत्यंत फलदायी माना जाता है। क्योंकि यही वह समय है, जिसमें स्वयं गणेश जी का प्राकट्य हुआ था। भविष्य पुराण में इस मध्याह्न-काल की महिमा का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है। तथा कहा गया है कि इस काल में की गई पूजा से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।।
मित्रों, इसके साथ ही गणेश चतुर्थी 2026 के दिन चंद्र-दर्शन से बचने का समय भी पंचांग में विशेष रूप से बताया गया है। जो लगभग सुबह 9 बजे से रात्रि लगभग 8 बजे तक रहता है। अर्थात इस संपूर्ण अवधि में चंद्रमा के दर्शन से बचने की सलाह दी जाती है। दस दिवसीय गणेशोत्सव का समापन अनंत चतुर्दशी के दिन, अर्थात 25 सितंबर 2026, शुक्रवार को गणपति विसर्जन के साथ होगा। इस प्रकार 14 सितंबर से 25 सितंबर तक का यह संपूर्ण काल भक्तों के लिए अत्यंत पावन तथा उत्सवमय माना जाता है। जिसमें प्रतिदिन गणपति की आरती, पूजा तथा भोग अर्पित किया जाता है।।
शास्त्रों में गणेश चतुर्थी का महत्व।। Importance Of Ganesh Chaturthi As Described In Scriptures.
मित्रों, भविष्य पुराण के अनुसार माता पार्वती ने स्नान करते समय अपने शरीर के मैल से एक पुतला बनाया। तथा उसमें प्राण डालकर उसे अपना द्वारपाल नियुक्त किया, यही बालक आगे चलकर श्रीगणेश के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यह घटना भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के मध्याह्न-काल में घटित हुई मानी जाती है। इसीलिए इस तिथि को गणेश जी का जन्मोत्सव अर्थात गणेश चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। स्कंद पुराण तथा गणेश पुराण में भी इस कथा का विस्तार से वर्णन मिलता है। तथा इन ग्रंथों में गणेश जी को प्रथम पूज्य देवता के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। अर्थात किसी भी शुभ कार्य के आरंभ में सबसे पहले गणेश जी की पूजा करने का विधान बताया गया है।।
मित्रों, गणेश पुराण में यह भी वर्णित है कि जो व्यक्ति श्रद्धा तथा नियमपूर्वक गणेश चतुर्थी का व्रत रखता है। तथा विधि-विधान से गणपति की पूजा-अर्चना करता है। उसके जीवन में आने वाली समस्त बाधाएं तथा विघ्न दूर हो जाते हैं। इसी कारण गणेश जी को ‘विघ्नहर्ता’ तथा ‘विघ्नविनायक’ जैसे नामों से भी संबोधित किया जाता है। मुद्गल पुराण में गणेश जी के आठ अवतारों तथा उनकी महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है। जिसमें यह स्पष्ट किया गया है कि गणेश जी की उपासना बुद्धि, विद्या, समृद्धि तथा सिद्धि, इन सभी की प्राप्ति का सरलतम मार्ग है।।
मित्रों, यह भी उल्लेखनीय है कि गणेश चतुर्थी का पर्व केवल घरेलू स्तर पर ही नहीं। बल्कि सामाजिक तथा सार्वजनिक स्तर पर भी अत्यंत हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। विशेष रूप से महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक तथा अन्य कई राज्यों में यह पर्व दस दिनों तक भव्य रूप से मनाया जाता है। इतिहास में इस सार्वजनिक गणेशोत्सव को समाज को एकजुट करने तथा राष्ट्रीय चेतना जगाने के उद्देश्य से भी बड़े स्तर पर प्रोत्साहित किया जाता है। तथा आज भी यह परंपरा उसी श्रद्धा और भव्यता के साथ जीवित है। शास्त्रीय दृष्टि से देखा जाए तो यह पर्व व्यक्तिगत आध्यात्मिक साधना तथा सामाजिक एकता, दोनों का ही अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है।।
गणपति स्थापना के नियम।। Rules For Ganpati Sthapana.
मित्रों, गणपति स्थापना के लिए सबसे पहले घर के ईशान कोण अर्थात उत्तर-पूर्व दिशा, अथवा उत्तर दिशा को सर्वाधिक शुभ माना जाता है। क्योंकि यह दिशा देवताओं के वास की दिशा मानी जाती है। मूर्ति की स्थापना करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि मूर्ति का मुख पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर ही रहे। तथा जिस स्थान पर मूर्ति स्थापित की जा रही हो, वह स्वच्छ, शांत तथा शोरगुल से दूर हो। मूर्ति स्थापना से पूर्व उस स्थान को गंगाजल से शुद्ध करना, तथा वहाँ एक चौकी पर लाल अथवा पीले रंग का स्वच्छ वस्त्र बिछाकर उस पर अक्षत रखकर मूर्ति स्थापित करना शास्त्र-सम्मत विधि मानी जाती है।।
गणपति की मूर्ति के चयन में भी शास्त्रों में कुछ महत्वपूर्ण नियम बताए गए हैं। जैसे मूर्ति की सूंड बाईं ओर मुड़ी हुई होनी चाहिए। जिसे घर के लिए शुभ तथा सौम्य रूप माना जाता है। जबकि दाईं ओर मुड़ी हुई सूंड वाली मूर्ति को अधिक कठोर पूजा-विधि वाला रूप माना जाता है। जो सामान्यतः मंदिरों में स्थापित की जाती है। इसके साथ ही मूर्ति मिट्टी अथवा पर्यावरण-अनुकूल सामग्री से बनी होनी चाहिए। ताकि विसर्जन के समय जल-स्रोतों को किसी प्रकार की हानि ना पहुँचे। यह नियम आज के समय में पर्यावरण-संरक्षण की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।।
मित्रों, स्थापना के दिन घर के सभी सदस्यों को प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। तथा घर की समुचित साफ-सफाई करके ही मूर्ति की स्थापना करनी चाहिए। क्योंकि अस्वच्छ तथा अव्यवस्थित वातावरण में देवताओं का आह्वान करना शास्त्रों में उचित नहीं माना जाता। मूर्ति स्थापना से पूर्व घर के मुख्य द्वार को तोरण तथा रंगोली से सजाना चाहिए। तथा वहाँ शुभ-लाभ लिखना भी परंपरा का एक अभिन्न हिस्सा माना जाता है। इसके अतिरिक्त स्थापना स्थल के आस-पास केले के पत्ते, आम के पत्तों का तोरण तथा फूल-मालाओं से सजावट करना भी अत्यंत शुभ तथा पारंपरिक माना जाता है।।
पूजन विधि विस्तार से।। Detailed Puja Vidhi.
मित्रों, गणेश चतुर्थी की पूजन-विधि आरंभ करने से पूर्व सबसे पहले संकल्प लेना आवश्यक होता है। जिसमें व्यक्ति अपने नाम, गोत्र तथा पूजा के उद्देश्य का उच्चारण करते हुए भगवान गणेश से पूजा संपन्न करने की प्रार्थना करता है। संकल्प के पश्चात सर्वप्रथम गणपति की मूर्ति को गंगाजल तथा पंचामृत, अर्थात दूध, दही, घी, शहद तथा शक्कर के मिश्रण से स्नान कराया जाता है। तत्पश्चात शुद्ध जल से पुनः स्नान कराकर मूर्ति को स्वच्छ वस्त्र से पोंछकर चौकी पर विराजमान किया जाता है। इसके बाद मूर्ति को नवीन वस्त्र, जनेऊ तथा आभूषण अर्पित किए जाते हैं।।
इसके पश्चात गणपति को चंदन, अक्षत, सिंदूर तथा हल्दी का तिलक लगाया जाता है। तथा उन्हें लाल अथवा पीले रंग के फूल, विशेष रूप से गेंदे के फूल तथा दूर्वा अर्पित की जाती है। दूर्वा को गणपति जी को अत्यंत प्रिय माना जाता है। इसीलिए इक्कीस दूर्वा की गांठ बनाकर उन्हें अर्पित करने की विशेष परंपरा है। इसके बाद धूप तथा दीप जलाकर गणेश जी की आरती की जाती है। तथा उन्हें मोदक, लड्डू अथवा अन्य मिष्ठान्न का भोग अर्पित किया जाता है। क्योंकि मोदक को गणपति जी का अत्यंत प्रिय प्रसाद माना जाता है।।
मित्रों, पूजा के दौरान ‘ॐ गं गणपतये नमः’ मंत्र का जप करना अत्यंत शुभ तथा फलदायी माना जाता है। तथा इक्कीस अथवा एक सौ आठ बार इस मंत्र का जप करने की परंपरा है। इसके साथ ही गणेश-स्तुति, गणेश-चालीसा तथा गणेश-अष्टोत्तरशतनामावली का पाठ करना भी अत्यंत शुभ माना जाता है। पूजा के अंत में गणपति की आरती करके, तथा उपस्थित सभी भक्तों में प्रसाद वितरित करके पूजा का समापन किया जाता है। दस दिवसीय उत्सव के दौरान प्रतिदिन प्रातः तथा संध्या इसी प्रकार पूजा एवं आरती करने की परंपरा है। तथा प्रत्येक दिन गणपति को अलग-अलग भोग अर्पित करने की भी प्रथा प्रचलित है।।
चंद्र दर्शन दोष: मिथ्या कलंक की कथा।। Chandra Darshan Dosh: The Story Of Mithya Kalank.
मित्रों, गणेश चतुर्थी से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण तथा अनूठा नियम यह है कि इस तिथि को चंद्रमा का दर्शन करना वर्जित माना गया है। तथा इस नियम के पीछे एक अत्यंत प्रसिद्ध पौराणिक कथा शास्त्रों में वर्णित है। कथा के अनुसार एक बार चंद्रमा को अपने सौंदर्य पर अत्यधिक अहंकार हो गया था। तथा उसने गणेश जी के स्थूल शरीर तथा वाहन को देखकर उनका उपहास किया। इससे क्रुद्ध होकर गणेश जी ने चंद्रमा को शाप दिया कि जो भी व्यक्ति भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को उसका दर्शन करेगा। उस पर मिथ्या कलंक अर्थात झूठा आरोप लगेगा। इतना ही नहीं वह समाज में अपमानित भी होगा।।
इसी शाप से जुड़ी एक अत्यंत प्रसिद्ध कथा भगवान श्रीकृष्ण से भी संबंधित है। जो पुराणों में स्यमंतक मणि की कथा के नाम से वर्णित है। कथा के अनुसार एक बार भूलवश भगवान श्रीकृष्ण ने भी भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को चंद्र-दर्शन कर लिया था। जिसके परिणामस्वरूप उन पर स्यमंतक नामक मणि की चोरी का झूठा आरोप लगा दिया गया। इस आरोप से मुक्त होने के लिए, तथा सत्य को उजागर करने के लिए स्वयं भगवान श्रीकृष्ण को भी अत्यंत कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। अंततः नारद मुनि के परामर्श पर उन्होंने विधि-विधान से गणेश चतुर्थी का व्रत किया। जिसके पश्चात वे इस मिथ्या कलंक से पूर्णतः मुक्त हो गए।।
मित्रों, धर्मसिंधु नामक ग्रंथ में इस नियम को और अधिक विस्तार से स्पष्ट किया गया है। जिसमें कहा गया है कि संपूर्ण चतुर्थी तिथि के दौरान चंद्र-दर्शन का निषेध रहता है। अर्थात जब तक चतुर्थी तिथि प्रभावी रहे, तब तक चंद्रमा को देखने से बचना चाहिए। चूँकि चतुर्थी तिथि के आरंभ तथा समाप्ति के समय के अनुसार यह निषेध कभी-कभी लगातार दो दिनों तक भी प्रभावी हो सकता है। इसलिए इस विषय में अपने स्थानीय पंचांग से समय की पुष्टि अवश्य कर लेनी चाहिए। यह परंपरा इतनी प्रचलित है कि कुछ स्थानों पर गणेश चतुर्थी को ‘कलंक चतुर्थी’ के नाम से भी जाना जाता है।।
चंद्र दर्शन दोष के निवारण के उपाय।। Remedies For Chandra Darshan Dosh.
मित्रों, यदि किसी व्यक्ति से भूलवश अथवा अनजाने में गणेश चतुर्थी के दिन चंद्रमा का दर्शन हो जाए। तो घबराने की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि शास्त्रों में इस दोष के निवारण के लिए स्पष्ट तथा सरल उपाय बताए गए हैं। सबसे प्रमुख तथा प्रभावी उपाय यह है कि व्यक्ति को स्यमंतक मणि की कथा से जुड़ा प्रसिद्ध श्लोक, जिसे ‘स्यमंतक श्लोक’ कहा जाता है, श्रद्धापूर्वक पढ़ना अथवा सुनना चाहिए। यह श्लोक इस प्रकार है, “सिंहः प्रसेनमवधीत् सिंहो जाम्बवता हतः, सुकुमारक मारोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः।” इस श्लोक के पाठ मात्र से ही मिथ्या कलंक दोष का निवारण हो जाता है। ऐसा शास्त्रों में स्पष्ट रूप से वर्णित है।।
इस श्लोक के अतिरिक्त कुछ अन्य उपाय भी परंपरा में प्रचलित हैं। जैसे भूलवश चंद्र-दर्शन हो जाने पर व्यक्ति को गणेश जी के समक्ष क्षमा-प्रार्थना करनी चाहिए, तथा ‘ॐ गं गणपतये नमः’ इस मंत्र का यथाशक्ति जप करना चाहिए। इसके साथ ही उस दिन गणेश जी को दूर्वा तथा मोदक अर्पित करना, तथा गणेश चालीसा अथवा गणेश स्तुति का पाठ करना भी इस दोष के प्रभाव को शांत करने में सहायक माना जाता है। कुछ विद्वान यह भी सलाह देते हैं कि यदि संभव हो, तो उस दिन ब्राह्मणों को भोजन अथवा दान देना भी इस दोष के निवारण का एक उपयुक्त उपाय बताया गया है।।
मित्रों, यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि यह दोष केवल जानबूझकर अथवा भूलवश आकाश में चंद्रमा को देखने पर ही लागू माना जाता है। अनजाने में जल में अथवा किसी दर्पण में चंद्रमा का प्रतिबिंब दिखने पर इतना कठोर प्रभाव नहीं माना जाता। फिर भी सावधानी बरतना तथा उपरोक्त उपाय अपनाना उचित रहता है। आधुनिक युग में भी लाखों श्रद्धालु इस परंपरा का पालन करते हैं। तथा चंद्रोदय के समय अपने घरों की खिड़कियाँ तथा पर्दे भी बंद कर देते हैं। ताकि अनजाने में भी चंद्र-दर्शन ना हो सके। यह परंपरा भले ही आज वैज्ञानिक तर्क से परे लगे। परंतु शास्त्रीय तथा सांस्कृतिक दृष्टि से इसका पालन आज भी श्रद्धा के साथ किया जाता है।।
व्रत तथा विसर्जन से जुड़े नियम।। Rules Related To Fasting And Immersion.
मित्रों, गणेश चतुर्थी के दिन व्रत रखने की भी परंपरा प्रचलित है। तथा जो व्यक्ति यह व्रत रखते हैं, उन्हें प्रातःकाल स्नान करके संकल्प लेना चाहिए। तथा दिनभर सात्विक आहार अथवा फलाहार ग्रहण करना चाहिए। व्रत के दौरान तामसिक भोजन, प्याज़-लहसुन तथा मदिरा का सेवन पूर्णतः वर्जित माना जाता है। तथा व्रत रखने वाले व्यक्ति को मन, वचन तथा कर्म से पवित्रता बनाए रखनी चाहिए। मध्याह्न-काल में गणपति की पूजा के पश्चात ही व्रत का पारण करने की परंपरा है। तथा कुछ श्रद्धालु संपूर्ण दिवस निर्जला व्रत भी रखते हैं।।
दस दिवसीय गणेशोत्सव के दौरान प्रतिदिन गणपति की विधिवत पूजा, आरती तथा भोग अर्पित करने की परंपरा है। तथा अंतिम दिन अर्थात अनंत चतुर्दशी के दिन गणपति विसर्जन किया जाता है। जो वर्ष 2026 में 25 सितंबर, शुक्रवार को होगा। विसर्जन से पूर्व गणपति की अंतिम पूजा तथा आरती की जाती है। तथा उन्हें भावभीनी विदाई देते हुए ‘गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ’ का उद्घोष किया जाता है। विसर्जन के लिए स्वच्छ जल-स्रोत, जैसे नदी, तालाब अथवा समुद्र का चयन करना चाहिए। तथा आज के पर्यावरण-सजग युग में कृत्रिम तालाबों में विसर्जन को भी बढ़ावा दिया जा रहा है।।
मित्रों, विसर्जन के समय मूर्ति के साथ-साथ पूजा में उपयोग हुई सामग्री, जैसे फूल, दूर्वा तथा वस्त्र को भी श्रद्धापूर्वक जल में प्रवाहित करने की परंपरा है। परंतु आज के समय में पर्यावरण-संरक्षण की दृष्टि से यह सलाह दी जाती है कि प्लास्टिक अथवा अन्य अजैविक वस्तुओं को जल में ना प्रवाहित करें। इसके स्थान पर मिट्टी की मूर्ति तथा जैविक सामग्री का ही प्रयोग करना उचित माना जाता है। ताकि परंपरा का पालन भी हो सके और जल-स्रोतों का संरक्षण भी बना रहे। यह संतुलित दृष्टिकोण आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता भी है।।
ध्यान रखने योग्य कुछ ज़रूरी बातें।। A Few Important Points To Keep In Mind.
मित्रों, गणेश चतुर्थी का पर्व मनाते समय यह ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है कि सभी मुहूर्त तथा समय स्थान के अनुसार कुछ मिनटों तक भिन्न हो सकते हैं। इसलिए किसी भी अनुष्ठान से पूर्व अपने शहर के स्थानीय पंचांग से समय की पुष्टि अवश्य कर लेनी चाहिए। इसके साथ ही यह भी स्मरण रखें कि पूजा-विधि तथा परंपराएं क्षेत्रीय तथा पारिवारिक रीति-रिवाजों के अनुसार थोड़ी-बहुत भिन्न हो सकती हैं। परंतु मूल भावना सदैव एक ही रहती है। वह है श्रद्धा तथा भक्ति के साथ गणपति का आह्वान तथा पूजन।।
यह भी आवश्यक है कि चंद्र दर्शन दोष जैसे नियमों का पालन करते समय अनावश्यक भय अथवा चिंता में ना पड़ें। बल्कि शास्त्रों में बताए गए सरल उपायों पर विश्वास रखें। क्योंकि भूलवश हुई किसी भी त्रुटि का निवारण श्रद्धापूर्ण प्रार्थना तथा उचित उपाय से संभव है। इसके साथ ही गणेशोत्सव के दौरान पर्यावरण-अनुकूल मूर्तियों तथा सामग्री का ही प्रयोग करना चाहिए। ताकि यह पावन पर्व प्रकृति के संरक्षण के साथ-साथ मनाया जा सके। जो आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता भी है।।
मित्रों, अंत में यह भी स्मरण रखें कि गणेश चतुर्थी का वास्तविक महत्व केवल बाहरी अनुष्ठानों में नहीं, बल्कि भीतर की श्रद्धा, विनम्रता तथा विघ्नों का सामना करने के संकल्प में निहित है। इसलिए इस पर्व को मनाते समय केवल पूजा-विधि का पालन ही नहीं, बल्कि गणेश जी के गुणों, जैसे बुद्धिमत्ता, विनम्रता तथा धैर्य को भी अपने जीवन में आत्मसात करने का प्रयास करना चाहिए। ताकि इस पर्व का संपूर्ण तथा वास्तविक लाभ प्राप्त हो सके।।
निष्कर्ष, विघ्नहर्ता की आराधना का महापर्व।। Conclusion, The Great Festival Of Worshipping The Remover Of Obstacles.
मित्रों, तो अब स्पष्ट है कि गणेश चतुर्थी 2026, जो 14 सितंबर, सोमवार को मनाई जाएगी। तथा यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि शास्त्र-सम्मत विधि, सही मुहूर्त तथा श्रद्धापूर्ण भक्ति के संगम से मनाया जाने वाला एक संपूर्ण आध्यात्मिक पर्व है। सही समय पर गणपति की स्थापना, विधिवत पूजन, तथा चंद्र दर्शन दोष जैसे नियमों का सम्मान करना। यह सभी मिलकर इस पर्व को शास्त्रों के अनुरूप तथा पूर्ण फलदायी बनाते हैं।।
इस पूरे लेख का सार यही है कि विघ्नहर्ता गणेश जी की आराधना जितनी अधिक श्रद्धा, नियम तथा शास्त्र-सम्मत विधि से की जाएगी, उतना ही अधिक लाभ भक्तों को प्राप्त होगा। इसलिए इस वर्ष गणेश चतुर्थी मनाते समय शुभ मुहूर्त, स्थापना नियम, संपूर्ण पूजन-विधि तथा चंद्र दर्शन से जुड़ी सावधानियों का ध्यान अवश्य रखें। ताकि यह पर्व आपके तथा आपके परिवार के लिए सुख, समृद्धि तथा विघ्न-नाश का माध्यम बन सके।।
मित्रों, हमारे ऋषि-मुनियों ने इन नियमों तथा परंपराओं को हज़ारों वर्षों के गहन शास्त्र-चिंतन के आधार पर स्थापित किया। तथा इन्हें पीढ़ी-दर-पीढ़ी सहेजकर रखा। आज के आधुनिक युग में भी यह परंपराएं उतनी ही श्रद्धा तथा भव्यता के साथ निभाई जाती हैं। जितनी पहले निभाई जाती थीं। इसलिए श्रद्धा, शास्त्र-सम्मत विधि तथा सही जानकारी के साथ इस पावन पर्व को मनाकर। हम विघ्नहर्ता गणेश जी की कृपा तथा आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं। गणपति बप्पा मोरया।।
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