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बहुला संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी व्रत कथा।।

बहुला संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी व्रत कथा।। Bahula Sankashti Ganesh Chaturthi Vrat
बहुला संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी व्रत कथा।। Bahula Sankashti Ganesh Chaturthi Vrat

बहुला संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी व्रत कथा।। Bahula Sankashti Ganesh Chaturthi Vrat.

बहुला संकष्टी चतुर्थी का परिचय।। Introduction.

मित्रों, सनातनी पञ्चांगों के अनुसार भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को बहुला चतुर्थी अथवा बहुला चौथ के नाम से जाना जाता है। इसी तिथि को यह पर्व संकष्टी गणेश चतुर्थी के रूप में भी मनाया जाता है। क्योंकि प्रत्येक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। और इस तिथि के स्वामी स्वयं भगवान श्रीगणेश जी हैं। इसीलिए इस विशेष तिथि को बहुला संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी कहा जाता है। जो एक ही दिन में दो पवित्र परंपराओं का अद्भुत संगम प्रस्तुत करती है।।

इस दिन एक ओर भगवान श्रीगणेश का विधिवत पूजन कर संकटों से मुक्ति की कामना की जाती है। तो दूसरी ओर गौ-माता तथा उनके बछड़े की पूजा कर संतान की रक्षा एवं दीर्घायु की प्रार्थना भी की जाती है। इसी कारण इस पर्व को गौ-पूजन व्रत भी कहा जाता है। मान्यता है कि जो माताएँ श्रद्धापूर्वक यह व्रत रखती हैं। उनकी संतान पर आने वाले सभी संकट टल जाते हैं। तथा भगवान श्रीकृष्ण, जिन्हें गोपाल भी कहा जाता है, प्रसन्न होकर संतान की रक्षा करते हैं।।

वर्ष 2026 में बहुला संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी की तिथि एवं शुभ मुहूर्त।। Date and Auspicious Time for Bahula Sankashti Ganesh Chaturthi 2026.

पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में भाद्रपद कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि 31 अगस्त, सोमवार को प्रातः लगभग 08 बजकर 50 मिनट से आरंभ होगी, तथा यह तिथि 1 सितंबर, मंगलवार को प्रातः लगभग 07 बजकर 41 मिनट तक रहेगी। चूँकि संकष्टी चतुर्थी का व्रत सदैव उस दिन रखा जाता है, जिस दिन चतुर्थी तिथि में चंद्रोदय होता है। इसलिए यह व्रत 31 अगस्त, सोमवार के दिन ही रखा जाएगा।।

इस दिन चंद्रोदय का समय रात्रि लगभग 8 बजकर 30 मिनट से 9 बजे के आसपास माना जा रहा है। यद्यपि यह समय प्रत्येक शहर की भौगोलिक स्थिति के अनुसार भिन्न-भिन्न हो सकता है। इसलिए भक्तों को अपने नगर के अनुसार स्थानीय पंचांग से चंद्रोदय का सटीक समय अवश्य देख लेना चाहिए। पूजा के लिए प्रातःकाल तथा संध्याकाल दोनों ही समय शुभ माने जाते हैं। तथा अभिजित मुहूर्त में पूजा करना भी विशेष फलदायी माना जाता है।।

बहुला संकष्टी चतुर्थी का धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व।। Religious and Spiritual Significance.

मित्रों, बहुला संकष्टी चतुर्थी का महत्व केवल एक कर्मकांड तक सीमित नहीं है। इसके आध्यात्मिक मायने अत्यंत गहरे हैं। एक वर्ष में चार प्रमुख चतुर्थी विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। और भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी भी इन्हीं में से एक है। इसे बहुला चतुर्थी, बहुला चौथ, हेरंब चतुर्थी तथा संकष्टी चतुर्थी जैसे कई नामों से जाना जाता है। ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति इन चारों प्रमुख चतुर्थी तिथियों पर श्रद्धापूर्वक व्रत रखता है। उसे संपूर्ण वर्ष के चतुर्थी-व्रतों के समान ही पुण्य-फल की प्राप्ति होती है।।

संतान की रक्षा इस व्रत का सबसे प्रमुख फल माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि जो माताएँ इस दिन विधिपूर्वक व्रत रखती हैं। उनके बच्चों पर आने वाले समस्त संकट स्वतः ही टल जाते हैं। साथ ही, भगवान श्रीकृष्ण को गोपाल कहा जाता है। और गौ-सेवा करने से कान्हा अत्यंत प्रसन्न होकर भक्त की हर मनोकामना पूर्ण करते हैं। यह व्रत हमें यह भी सिखाता है कि जो गौ-माता हमें दूध तथा पोषण प्रदान करती हैं। उनके प्रति हमारा भी कुछ कर्तव्य बनता है। और यही कृतज्ञता का भाव इस पर्व की भी आत्मा है।।

चूँकि यह तिथि संकष्टी चतुर्थी भी है, अतः भगवान श्रीगणेश की उपासना से बुद्धि, समृद्धि, सुख तथा जीवन के समस्त विघ्नों से मुक्ति की प्राप्ति होती है। श्रद्धा एवं विश्वास के साथ यह व्रत करने वाले भक्तों को सुख, समृद्धि, सफलता तथा विघ्नों से मुक्ति का आशीर्वाद प्राप्त होता है। ऐसा शास्त्रों में वर्णित है।।

बहुला संकष्टी चतुर्थी की पूजा-विधि।। Puja Vidhi of Bahula Sankashti Chaturthi.

मित्रों, इस व्रत में प्रातःकाल स्नान-ध्यान के पश्चात व्रत का संकल्प लेना चाहिए। पूजा-स्थान में भगवान श्रीगणेश की प्रतिमा अथवा चित्र स्थापित करके, धूप, दीप, दूर्वा, मोदक तथा लाल फूल अर्पित करने चाहिए। तत्पश्चात गाय तथा बछड़े की मिट्टी की प्रतिमा बनाकर, अथवा जीवित गौ-माता एवं बछड़े का विधिवत पूजन करना चाहिए। क्योंकि इसे गौ-पूजा व्रत भी कहा जाता है।।

इस दिन गेहूँ तथा चावल से निर्मित वस्तुओं का सेवन वर्जित माना गया है। तथा गौ-उत्पादों के सेवन से भी परहेज करने की परंपरा है। क्योंकि यह मान्यता है कि गाय के दूध पर केवल उसके बछड़े का ही प्रथम अधिकार होता है। संध्याकाल में चंद्रमा के उदय होने पर, चंद्रदेव को अर्घ्य देकर तथा भगवान श्रीगणेश एवं भगवान श्रीकृष्ण की आरती करके ही व्रत का पारण करना चाहिए। संकष्टी चतुर्थी की व्रत-कथा का श्रवण करना भी इस पूजा-विधि का अभिन्न अंग माना जाता है।।

बहुला संकष्टी चतुर्थी की पौराणिक व्रत-कथा।। Puranic Vrat Katha of Bahula Sankashti Chaturthi.

मित्रों, बहुला चतुर्थी की कथा एक बहुला नामक गौ-माता से जुड़ी हुई है। जो अपनी सत्यनिष्ठा तथा वचन-पालन के लिए विख्यात है। कथा के अनुसार एक बार एक सिंह को अत्यंत भूख लगी। और उसने बहुला नामक गाय को अपना आहार बनाने का निश्चय किया। बहुला ने सिंह से विनती की कि उसे अपने छोटे बछड़े से एक बार अंतिम भेंट कर लेने दी जाए। तथा वचन दिया कि वह भेंट करने के पश्चात स्वयं ही लौटकर सिंह के समक्ष उपस्थित हो जाएगी।।

सिंह को पहले तो इस पर विश्वास नहीं हुआ, परन्तु बहुला की सच्चाई से प्रभावित होकर उसने उसे जाने की अनुमति दे दी। बहुला अपने बछड़े के पास गई, उसे स्नेहपूर्वक दूध पिलाया तथा समस्त वात्सल्य उड़ेल दिया। और फिर अपने दिए हुए वचन के अनुसार स्वयं ही सिंह के पास लौट आई। बहुला की इस असाधारण सत्यनिष्ठा तथा वचन-पालन को देखकर सिंह का हृदय द्रवित हो उठा। और वह उसे खाए बिना ही वहाँ से चला गया। कहा जाता है कि यह सिंह स्वयं भगवान श्रीकृष्ण का ही एक रूप थे। जिन्होंने बहुला की परीक्षा ली थी।।

इसी घटना की स्मृति में भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी को बहुला चतुर्थी के रूप में मनाया जाने लगा। जिसमें गौ-माता तथा उसके बछड़े की पूजा कर संतान-रक्षा तथा सत्यनिष्ठा के इस अमर आदर्श को स्मरण किया जाता है।।

संकष्टी गणेश चतुर्थी की पौराणिक कथा।। Puranic Katha of Sankashti Ganesh Chaturthi.

मित्रों, संकष्टी गणेश चतुर्थी से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा राजा हरिश्चंद्र से संबंधित है। कथा के अनुसार राजा हरिश्चंद्र ने कठिन परिस्थितियों के कारण अपना राज्य, धन तथा परिवार सबकुछ खो दिया था। अपनी इस पीड़ा का समाधान खोजने के लिए उन्होंने महर्षि लोमश से मार्गदर्शन प्राप्त किया। ऋषि ने उन्हें श्रद्धापूर्वक संकष्टी गणेश चतुर्थी का व्रत करने की सलाह दी।।

राजा हरिश्चंद्र ने ऋषि के निर्देशानुसार विधिपूर्वक यह व्रत किया। तथा भगवान श्रीगणेश की कृपा से उन्हें अपना खोया हुआ राज्य, धन तथा परिवार पुनः प्राप्त हुआ। इसी कथा के आधार पर यह मान्यता प्रचलित हुई कि जो भी भक्त श्रद्धा एवं विश्वास के साथ संकष्टी चतुर्थी का व्रत करता है। उसके जीवन के समस्त संकट भगवान श्रीगणेश की कृपा से दूर हो जाते हैं।।

व्रत के नियम तथा सावधानियाँ।। Rules and Precautions of the Vrat.

मित्रों, इस व्रत में तामसिक भोजन से पूर्णतः परहेज करना चाहिए। फलाहार में साबूदाना खिचड़ी, कुट्टू की पूरी, मखाना, दही अथवा फल ग्रहण किए जा सकते हैं। परन्तु चावल तथा गेहूँ से बनी वस्तुओं का सेवन वर्जित माना गया है। व्रत के दौरान मन, वचन तथा कर्म से पवित्रता बनाए रखनी चाहिए। तथा किसी को भी अपशब्द अथवा कटु वचन नहीं कहने चाहिए।।

गौ-माता का अपमान अथवा उनके प्रति कठोरता इस व्रत के दौरान विशेष रूप से वर्जित मानी गई है। क्योंकि यह पर्व स्वयं गौ-कृतज्ञता पर आधारित है। संध्याकाल में चंद्र-दर्शन के पश्चात ही व्रत का पारण करना चाहिए। तथा इससे पूर्व व्रत तोड़ने से इसका पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता, ऐसा शास्त्रों में वर्णित है।।

बहुला संकष्टी चतुर्थी के लिए वैदिक उपाय।। Vedic Remedies for Bahula Sankashti Chaturthi.

मित्रों, इस पावन तिथि पर भगवान श्रीगणेश को प्रसन्न करने के लिए तीन प्रकार के मंत्रों का श्रद्धापूर्वक जप करना विशेष फलदायी माना गया है — वैदिक मंत्र, लौकिक (पौराणिक) मंत्र तथा तांत्रिक बीज मंत्र। वैदिक मंत्र के रूप में गणेश गायत्री मंत्र “ॐ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दन्तिः प्रचोदयात्॥” का नियमित जप करना चाहिए। लौकिक अर्थात पौराणिक मंत्र के रूप में “वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥” का पाठ करना चाहिए। और तांत्रिक बीज मंत्र के रूप में “ॐ गं गणपतये नमः” का जप करना चाहिए। जो गणेश जी की कृपा शीघ्रता से प्राप्त करने में सहायक माना जाता है।।

इन तीनों मंत्रों में से किसी एक अथवा तीनों का नियमित जप करने से संकटों से शीघ्र मुक्ति मिलती है। साथ ही गौ-माता की सेवा, दूर्वा तथा मोदक का भोग तथा संतान की दीर्घायु हेतु संतान गोपाल मंत्र का जप भी इस दिन विशेष रूप से फलदायी माना जाता है।।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न।। Frequently Asked Questions. (FAQ)

प्रश्न 1. वर्ष 2026 में बहुला संकष्टी चतुर्थी कब है।। When Is Bahula Sankashti Chaturthi in 2026.

उत्तर:- वर्ष 2026 में बहुला संकष्टी चतुर्थी का व्रत 31 अगस्त, सोमवार के दिन रखा जाएगा, क्योंकि इसी दिन चतुर्थी तिथि में चंद्रोदय होगा।।

प्रश्न 2. बहुला चतुर्थी को यह नाम क्यों मिला।। Why Is It Called Bahula Chaturthi.

उत्तर:- यह नाम बहुला नामक गौ-माता की कथा से जुड़ा है। जिन्होंने अपने वचन का पालन करते हुए सत्यनिष्ठा का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया था। इसीलिए इस तिथि को उन्हीं के नाम पर बहुला चतुर्थी कहा जाता है।।

प्रश्न 3. इस दिन क्या खाना चाहिए तथा क्या वर्जित है।। What Should Be Eaten and Avoided on This Day.

उत्तर:- इस दिन साबूदाना खिचड़ी, कुट्टू की पूरी, मखाना, दही तथा फल ग्रहण किए जा सकते हैं। जबकि गेहूँ, चावल तथा गौ-उत्पादों का सेवन वर्जित माना गया है।।

प्रश्न 4. बहुला संकष्टी चतुर्थी का व्रत किसे रखना चाहिए।। Who Should Observe the Bahula Sankashti Chaturthi Vrat.

उत्तर:- यह व्रत विशेष रूप से संतान की रक्षा तथा दीर्घायु की कामना करने वाली माताओं के लिए बताया गया है। परन्तु संकष्टी चतुर्थी होने के कारण कोई भी भक्त भगवान श्रीगणेश की कृपा हेतु इसे रख सकता है।।

प्रश्न 5. व्रत का पारण कब करना चाहिए।। When Should the Vrat Be Concluded.

उत्तर:- संकष्टी चतुर्थी का व्रत सदैव संध्याकाल में चंद्रोदय के पश्चात, चंद्रदेव को अर्घ्य देकर ही तोड़ा जाना चाहिए। तभी इसका पूर्ण फल प्राप्त होता है।।

लेख का निष्कर्ष।। Conclusion.

मित्रों, बहुला संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी एक ऐसा अनूठा पर्व है। जिसमें भगवान श्रीगणेश की संकट-हरण शक्ति तथा गौ-माता बहुला की सत्यनिष्ठा, दोनों की ही एक साथ आराधना की जाती है। यह व्रत हमें यह सिखाता है कि सच्चाई, वचन-पालन तथा कृतज्ञता का भाव जीवन के हर संकट को दूर करने की क्षमता रखता है। तथा भगवान श्रीगणेश की कृपा से बुद्धि, समृद्धि एवं संतान-सुख की प्राप्ति होती है।।

वैदिक ज्योतिष के अनुसार वैदिक, लौकिक तथा तांत्रिक — तीनों प्रकार के मंत्रों का श्रद्धापूर्वक जप, साथ ही गौ-सेवा एवं व्रत-कथा का श्रवण, इस दिन को अत्यंत फलदायी बनाने में सहायक माना गया है। परन्तु व्रत तथा पूजा-विधि के संदर्भ में किसी भी विशेष शंका के समाधान हेतु अपने स्थानीय पंडित अथवा विद्वान ज्योतिषी से परामर्श अवश्य लेना चाहिए।।

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