Home Articles Astro Articles पार्टनरशिप के व्यापार में घाटे का कारण तथा उपाय।।

पार्टनरशिप के व्यापार में घाटे का कारण तथा उपाय।।

पार्टनरशिप के व्यापार में घाटे का कारण तथा उपाय।। Why Loss in Partnership Business
पार्टनरशिप के व्यापार में घाटे का कारण तथा उपाय।। Why Loss in Partnership Business

पार्टनरशिप के व्यापार में घाटे का कारण तथा उपाय।। Why Loss in Partnership Business.

पार्टनरशिप और कुंडली का संबंध।। Introduction.

मित्रों, आजकल बहुत से लोग अकेले व्यवसाय शुरू करने की बजाय साझेदारी में व्यवसाय आरंभ करना पसंद करते हैं। क्योंकि इससे पूँजी, अनुभव तथा जोखिम तीनों बँट जाते हैं। आरंभ में सबकुछ बड़ा सुंदर तथा उत्साहवर्धक लगता है। दोनों साझेदार मिलकर सपने बुनते हैं, योजनाएं बनाते हैं। परन्तु कुछ ही समय पश्चात अचानक विवाद, अविश्वास, हिसाब-किताब की गड़बड़ी अथवा घाटे जैसी समस्याएँ सिर उठाने लगती हैं। और अंततः जो साझेदारी बड़ी उम्मीदों के साथ शुरू हुई थी, वह कड़वाहट के साथ टूट जाती है।।

वैदिक ज्योतिष में ऐसी परिस्थितियों का विश्लेषण करने के लिए सप्तम भाव को सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना गया है। क्योंकि यही भाव विवाह के साथ-साथ व्यापारिक साझेदारी का भी प्रतिनिधित्व करता है। इसके अतिरिक्त सप्तमेश अर्थात सप्तम भाव के स्वामी ग्रह की स्थिति। शुक्र ग्रह का बल, तथा साझेदारी के समय चल रही महादशा-अंतर्दशा। इन सभी का गहन अध्ययन करने पर ही यह समझा जा सकता है कि किसी विशेष साझेदारी में विवाद अथवा हानि क्यों उत्पन्न हो रही है।।

मित्रों, यह समझना भी आवश्यक है कि पार्टनरशिप के बिगड़ने के पीछे केवल एक ही कारण नहीं होता। अपितु कई ग्रह-दोष एक साथ मिलकर इस परिस्थिति को जन्म देते हैं। कभी सप्तम भाव पापग्रहों से पीड़ित होता है। तो कभी सप्तमेश किसी त्रिक भाव में जाकर निर्बल हो जाता है। कभी-कभी शुक्र ग्रह के अशुभ होने के कारण सामंजस्य तथा कूटनीति की कमी हो जाती है। जो किसी भी साझेदारी की सबसे बड़ी आवश्यकता मानी जाती है।।

आज हम विस्तार से समझेंगे कि साझेदारी में बिजनेस बिगड़ने के प्रमुख ज्योतिषीय कारण कौन-कौन से होते हैं। तथा इन्हें संतुलित बनाकर साझेदारी को दीर्घकालिक तथा सफल बनाने के लिए कौन-कौन से वैदिक उपाय अपनाए जा सकते हैं। परन्तु यह ध्यान रहे कि यह एक सामान्य ज्योतिषीय रूपरेखा है। वास्तविक निदान के लिए संपूर्ण जन्मकुंडली का अध्ययन आवश्यक होता है।।

सप्तम भाव का पीड़ित होना।। Afflicted Seventh House.

मित्रों, सप्तम भाव सीधे तौर पर साझेदारी तथा अनुबंधों का भाव माना जाता है। इसलिए यदि यह सप्तम भाव राहु, केतु, मंगल अथवा शनि जैसे पापग्रहों से पीड़ित हो, तो साझेदारी में विवाद अथवा अविश्वास की स्थिति स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होती है। विशेषकर राहु-केतु की युति अथवा दृष्टि से यह भाव प्रभावित हो, तो साझेदार के इरादों को लेकर भ्रम अथवा छल की आशंका बढ़ जाती है।।

यदि सप्तम भाव पर मंगल का प्रभाव हो, तो साझेदारों के बीच अहंकार-टकराव, गुस्सा तथा जल्दबाजी में लिए गए निर्णय विवाद का कारण बनते हैं। वहीं शनि का प्रभाव होने पर साझेदारी में देरी, मतभेद तथा दीर्घकालिक तनाव देखने को मिलता है। कई बार सप्तम भाव के दोनों ओर पापग्रह हों, जिसे पापकर्तरी योग कहा जाता है। तो यह स्थिति साझेदारी के लिए विशेष रूप से प्रतिकूल मानी जाती है।।

सप्तमेश की निर्बल अथवा त्रिक भाव में स्थिति।। Weak Placement of the Seventh Lord.

मित्रों, केवल सप्तम भाव ही नहीं, अपितु सप्तम भाव के स्वामी ग्रह अर्थात सप्तमेश की स्थिति भी उतनी ही महत्वपूर्ण मानी जाती है। यदि सप्तमेश छठे, आठवें अथवा बारहवें भाव जैसे त्रिक भावों में जाकर बैठ जाए। तो साझेदारी में गुप्त शत्रुता, अचानक विवाद अथवा आर्थिक हानि की प्रबल संभावना बन जाती है। इसलिए इन ग्रहों को भी ध्यानपूर्वक देखना चाहिए।।

इसी प्रकार यदि सप्तमेश नीच राशि में हो अथवा सूर्य के अत्यंत निकट होकर अस्त हो जाए। तो साझेदार की निर्णय-क्षमता तथा नीयत दोनों पर प्रश्नचिन्ह लग सकता है। ऐसी स्थिति में साझेदारी शुरू होने से पहले ही सावधानीपूर्वक अनुबंध तथा शर्तें स्पष्ट कर लेनी चाहिए। ताकि भविष्य में होने वाले किसी भी प्रकार के विवाद के लिए किसी भी प्रकार की किसी गुंजाइश की आशंका ना रहे।।

शुक्र ग्रह का अशुभ होना।। Afflicted Venus.

मित्रों, शुक्र ग्रह को कूटनीति, सामंजस्य तथा साझेदारी में संतुलन बनाए रखने का प्रमुख कारक ग्रह माना गया है। यदि जन्मकुंडली में शुक्र पीड़ित, नीच राशि में अथवा पापग्रहों से युक्त हो, तो जातक में समझौता करने तथा दूसरे का दृष्टिकोण समझने की क्षमता कम हो जाती है। जिस कारण छोटी-छोटी बातें भी बड़े विवाद का रूप ले लेती हैं।।

अशुभ शुक्र से जातक की व्यवहार-कुशलता प्रभावित होती है। तथा साझेदार के साथ भरोसे का रिश्ता बनाए रखना कठिन हो जाता है। इसके विपरीत यदि शुक्र बलवान हो, तो साझेदारी में सामंजस्य, विश्वास तथा दीर्घकालिक स्थिरता बनी रहती है। इसलिए साझेदारी में आ रही किसी भी समस्या का विश्लेषण करते समय शुक्र की स्थिति अवश्य देखनी चाहिए।।

अशुभ दशा-अंतर्दशा का प्रभाव।। Effect of Inauspicious Dasha-Antardasha.

मित्रों, कई बार जन्मकुंडली में सप्तम भाव सामान्य स्थिति में होते हुए भी, साझेदारी शुरू करते समय अथवा उसके संचालन के दौरान जातक की राहु, केतु, शनि अथवा किसी पीड़ित ग्रह की महादशा अथवा अंतर्दशा चल रही होती है। ऐसी अवधि में सप्तम भाव तथा साझेदारी से जुड़े मामले विशेष रूप से प्रभावित हो जाते हैं। भले ही मूल कुंडली में कोई बड़ा दोष न भी हो तो भी।।

इसी प्रकार गोचर में शनि अथवा राहु का सप्तम भाव अथवा सप्तमेश पर अशुभ प्रभाव भी साझेदारी में अचानक तनाव उत्पन्न कर देता है। इसलिए कोई भी बड़ी साझेदारी अथवा व्यावसायिक अनुबंध करने से पहले चल रही दशा तथा गोचर का विश्लेषण करवाना भी अत्यंत उपयोगी सिद्ध होता है।।

साझेदारी को सफल बनाने के वैदिक उपाय।। Vedic Remedies to Strengthen Business Partnership.

मित्रों, साझेदारी में सामंजस्य तथा स्थिरता बनाए रखने के लिए सर्वप्रथम शुक्रवार के दिन “ॐ शुं शुक्राय नमः” इस शुक्र देवता के मंत्र का श्रद्धापूर्वक नियमित जप करना चाहिए। तथा माँ लक्ष्मी की उपासना करनी चाहिए। इसके साथ ही यदि सप्तम भाव पर राहु-केतु का प्रभाव हो, तो “ॐ रां राहवे नमः” तथा “ॐ कें केतवे नमः” इन मंत्रों का जप भी अवश्य करना चाहिए।।

किसी भी बड़ी साझेदारी अथवा व्यावसायिक अनुबंध का आरंभ भगवान गणेश की पूजा तथा शुभ मुहूर्त देखकर ही करना चाहिए। क्योंकि गणेश जी को समस्त विघ्नों को दूर करने वाला देवता माना जाता है। बुधवार के दिन गणेश जी की पूजा करना तथा साझेदारी के दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर से पहले शुभ मुहूर्त का ध्यान रखना भी अत्यंत लाभकारी सिद्ध होता है।।

इसके अतिरिक्त सप्तमेश की स्थिति के अनुसार संबंधित ग्रह के उपाय भी करने चाहिए। तथा साझेदारी के अनुबंध लिखित रूप में, स्पष्ट शर्तों के साथ तैयार करने चाहिए। और यहाँ मैं यही कहूँगा कि ज्योतिषीय उपाय के साथ-साथ पारदर्शिता, नियमित हिसाब-किताब तथा खुला संवाद बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है। क्योंकि आध्यात्मिक उपाय व्यावहारिक सावधानी का स्थान नहीं ले सकते। बल्कि उसके साथ मिलकर ही पूर्ण फल देते हैं।।

शास्त्रीय प्रमाण।। Scriptural References.

मित्रों, बृहत्पाराशर होरा शास्त्र में सप्तम भाव को कलत्र तथा साझेदारी दोनों का प्रमुख भाव बताया गया है। तथा यह भी स्पष्ट किया गया है कि इस भाव तथा इसके स्वामी की स्थिति के अनुसार ही जातक के सभी प्रकार के पारस्परिक संबंधों का फल निर्धारित होता है। फलदीपिका के अनुसार पीड़ित सप्तमेश जातक को साझेदारी में विवाद तथा हानि की ओर संकेत करता है।।

सारावली में भी यह उल्लेख मिलता है कि शुक्र ग्रह की शुभता किसी भी प्रकार की साझेदारी अथवा समझौते की सफलता के लिए अनिवार्य मानी गई है। तथा यह भी स्पष्ट किया गया है कि किसी भी अंतिम निष्कर्ष के लिए सप्तम भाव, सप्तमेश, शुक्र तथा संबंधित दशा-अंतर्दशा, इन सभी का समन्वित अध्ययन आवश्यक होता है।।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न।। Frequently Asked Questions. (FAQ)

प्रश्न 1. साझेदारी में विवाद के लिए कुंडली का कौन-सा भाव उत्तरदायी होता है।। Which House in Kundli Is Responsible for Partnership Disputes.

उत्तर:- सप्तम भाव सीधे तौर पर साझेदारी का भाव माना गया है। इसलिए इसकी तथा इसके स्वामी ग्रह की पीड़ित स्थिति ही साझेदारी में विवाद का मुख्य कारण मानी जाती है।।

प्रश्न 2. साझेदारी में विवाद के पीछे कौन-कौन से ग्रह प्रमुख उत्तरदायी होते हैं।। Which Planets Are Mainly Responsible for Partnership Disputes.

उत्तर:- राहु, केतु, मंगल तथा शनि का सप्तम भाव पर अशुभ प्रभाव। तथा पीड़ित शुक्र, यह सभी साझेदारी में विवाद के प्रमुख कारक माने जाते हैं।।

प्रश्न 3. साझेदारी में विवाद से बचने के लिए सबसे प्रभावी वैदिक उपाय क्या है।। What Is the Most Effective Vedic Remedy to Avoid Partnership Disputes.

उत्तर:- शुक्र मंत्र का जप, भगवान गणेश की पूजा, शुभ मुहूर्त में अनुबंध करना तथा स्पष्ट एवं लिखित शर्तें रखना सबसे प्रभावी उपाय माने जाते हैं।।

प्रश्न 4. क्या साझेदारी शुरू करने से पहले कुंडली मिलान करवाना उचित है।। Is It Advisable to Match Kundlis Before Starting a Business Partnership.

उत्तर:- हाँ, विशेषकर बड़ी अथवा दीर्घकालिक साझेदारी के लिए दोनों साझेदारों की कुंडली का मैत्री-विश्लेषण करवाना तथा शुभ मुहूर्त देखना अत्यंत लाभकारी माना जाता है।।

प्रश्न 5. क्या ज्योतिषीय उपाय अपनाने से साझेदारी में विवाद पूरी तरह समाप्त हो जाते हैं।। Do Vedic Remedies Completely Eliminate Partnership Disputes.

उत्तर:- ज्योतिषीय उपाय स्थिति को संतुलित तथा अनुकूल बनाने में सहायक होते हैं। परंतु इसके साथ-साथ पारदर्शिता, स्पष्ट अनुबंध तथा व्यावहारिक सावधानी बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है।।

लेख का निष्कर्ष।। Conclusion.

मित्रों, साझेदारी में बिजनेस बिगड़ने के पीछे प्रायः सप्तम भाव की पीड़ा, सप्तमेश की निर्बल स्थिति, अशुभ शुक्र अथवा प्रतिकूल दशा-अंतर्दशा जैसे ज्योतिषीय कारण उत्तरदायी होते हैं। इन कारणों को समझकर तथा उचित वैदिक उपाय अपनाकर साझेदारी को अधिक स्थिर, पारदर्शी तथा दीर्घकालिक बनाया जा सकता है।।

वैदिक ज्योतिष के अनुसार शुक्र तथा गणेश जी की उपासना, शुभ मुहूर्त में अनुबंध तथा संबंधित ग्रहों के उपाय इस स्थिति को संतुलित बनाने में सहायक माने गए हैं। और यहाँ मैं यही कहूँगा कि आध्यात्मिक उपाय भी तभी पूर्ण फल देते हैं। जब इनके साथ-साथ स्पष्ट संवाद, पारदर्शी हिसाब-किताब तथा पारस्परिक सम्मान भी बनाए रखा जाए।।

परन्तु मेरी आपको यही सलाह है कि किसी भी बड़ी साझेदारी अथवा व्यावसायिक अनुबंध से पहले किसी विद्वान, योग्य, अनुभवी वैदिक ज्योतिषी से अपनी तथा अपने साझेदार दोनों की कुंडली का विश्लेषण विधिपूर्वक अवश्य करवाना चाहिए। ताकि सही एवं व्यक्तिगत मार्गदर्शन प्राप्त हो सके।।

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