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लोलार्क षष्ठी पर संतान प्राप्ति एवं धार्मिक कृत्य।।

लोलार्क षष्ठी पर संतान प्राप्ति एवं धार्मिक कृत्य।। Lolark Shashti Child Blessings And Rituals

लोलार्क षष्ठी पर संतान प्राप्ति एवं धार्मिक कृत्य।। Lolark Shashti Child Blessings And Rituals.

लेख का परिचय।। Introduction.

मित्रों, हर वर्ष भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को काशी नगरी में एक ऐसा मेला लगता है। जिसमें दूर-दूर से निःसंतान दंपति अपनी सबसे बड़ी मनोकामना लेकर पहुंचते हैं। यह पर्व है लोलार्क षष्ठी, जिसे लोलार्क छठ के नाम से भी जाना जाता है। वर्ष 2026 में यह पावन पर्व 17 सितंबर के दिन मनाया जा रहा है। भदैनी क्षेत्र में स्थित ऐतिहासिक लोलार्क कुंड में इस दिन आस्था का ऐसा सैलाब उमड़ता है। जो देखने में ही अद्भुत प्रतीत होता है। आइए आज इसी पर्व के इतिहास, इसकी पौराणिक कथा, पूजा-विधि तथा शास्त्रीय महत्व को विस्तार से समझते हैं।।

लोलार्क षष्ठी 2026 की सही तिथि तथा शुभ मुहूर्त।। Exact Date And Auspicious Muhurat Of Lolark Shashti 2026.

मित्रों, पंचांग के अनुसार भाद्रपद शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि इस वर्ष 17 सितंबर 2026 के दिन पड़ रही है। और इसी दिन काशी में लोलार्क छठ का प्रसिद्ध मेला भी आयोजित किया जाएगा। स्नान तथा पूजा के लिए इस दिन ब्रह्म मुहूर्त प्रातः 3 बजकर 55 मिनट से लेकर 5 बजकर 40 मिनट तक रहेगा। जिसे स्नान के लिए सर्वाधिक पवित्र समय माना जाता है। इसके पश्चात प्रातः 5 बजकर 41 मिनट से 6 बजकर 30 मिनट तक विजय मुहूर्त रहेगा। जो शारीरिक बाधाओं को दूर करने तथा शत्रुओं पर विजय प्राप्ति के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है। इसके बाद प्रातः 6 बजकर 31 मिनट से 10 बजकर 26 मिनट तक का समय सर्वोत्तम मुहूर्त बताया गया है। इसके पश्चात सूर्योदय काल से लेकर सूर्यास्त तक स्नान, दान, दर्शन तथा पूजन का क्रम पूरे दिन निरंतर चलता रहता है।।

ज्योतिष के अनुसार इस वर्ष का लोलार्क षष्ठी पर्व और भी अधिक विशिष्ट है। क्योंकि लगभग सात वर्षों के पश्चात इस दिन एक साथ सात महायोगों का दुर्लभ संयोग बन रहा है। ऐसी मान्यता है कि जब भी किसी शुभ तिथि पर इस प्रकार के दुर्लभ ग्रह-योग बनते हैं। तो उस दिन किए गए स्नान, दान तथा पूजन का फल कई गुना अधिक बढ़ जाता है। यही कारण है कि इस वर्ष लोलार्क कुंड में श्रद्धालुओं की संख्या पहले से भी कहीं अधिक रहने की संभावना जताई जा रही है।।

लोलार्क कुंड का परिचय।। Introduction To Lolark Kund.

मित्रों, वाराणसी के तुलसीघाट के निकट भदैनी क्षेत्र में स्थित लोलार्क कुंड को काशी के सबसे प्राचीन तथा सबसे चमत्कारी कुंडों में गिना जाता है। इसे सूर्य कुंड के नाम से भी जाना जाता है। क्योंकि सूर्योदय होते ही सूर्य की पहली किरण सबसे पहले इसी कुंड के जल पर पड़ती है। इस कुंड का उल्लेख महाभारत जैसे प्राचीनतम ग्रंथ में भी मिलता है। जिससे इसकी प्राचीनता तथा शास्त्रीय प्रामाणिकता दोनों ही स्पष्ट हो जाती हैं।।

कालांतर में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने इस कुंड के चारों ओर बहुमूल्य पत्थरों से भव्य सज्जा करवाई थी। जिससे इसका वर्तमान स्वरूप और भी अधिक निखर गया। इसी कुंड के समीप लोलार्केश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर भी स्थित है। जहाँ स्नान के पश्चात श्रद्धालु दर्शन-पूजन करते हैं।।

लोलार्क कुंड से जुड़ी पौराणिक कथा।। The Mythological Story Behind Lolark Kund.

मित्रों, लोलार्क कुंड की उत्पत्ति से जुड़ी एक अत्यंत प्राचीन तथा रोचक कथा प्रचलित है। मान्यता है कि देवासुर संग्राम के दौरान भगवान सूर्य के रथ का एक पहिया इसी स्थान पर आकर गिर गया था। और इसी कारण यहाँ इस कुंड का निर्माण हुआ तथा इसका नाम लोलार्क कुंड पड़ गया। एक अन्य प्रचलित कथा के अनुसार स्वयं भगवान सूर्य ने इसी स्थान पर सैकड़ों वर्षों तक कठोर तपस्या करके यहाँ शिवलिंग की स्थापना की थी। जो आगे चलकर लोलार्केश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध हुआ।।

इस कुंड की चमत्कारिक शक्ति से जुड़ी एक ऐतिहासिक कथा भी विशेष रूप से प्रचलित है। लोलार्केश्वर मंदिर के महंतों के अनुसार पश्चिम बंगाल स्थित कूचबिहार राज्य के एक राजा गंभीर चर्मरोग से पीड़ित थे। और साथ ही वे निःसंतान भी थे। किसी विद्वान के परामर्श पर जब उन्होंने इस लोलार्क कुंड में स्नान किया। तो ना केवल उनका चर्मरोग पूर्ण रूप से ठीक हो गया। बल्कि उन्हें पुत्र-रत्न की भी प्राप्ति हुई। इसी कृतज्ञता स्वरूप उन्होंने इस कुंड का जीर्णोद्धार सोने के कलश तथा भव्य सज्जा के साथ करवाया था। तभी से यह मान्यता और भी दृढ़ हो गई कि लोलार्क कुंड में स्नान करने से निःसंतान दंपतियों को संतान-सुख की प्राप्ति अवश्य होती है।।

काशी खंड में भी इस कुंड की महिमा का वर्णन करते हुए एक श्लोक मिलता है। जिसका आशय यह है कि जो व्यक्ति वाराणसी में निवास करते हुए भी लोलार्क का सेवन अर्थात दर्शन-स्नान नहीं करता। उसे निश्चय ही क्षुधा एवं व्याधि जैसे कष्टों का सामना करना पड़ता है। इसी प्रकार एक लोकोक्ति भी प्रचलित है। जिसमें कहा गया है कि जो व्यक्ति प्रत्येक रविवार को इस लोलार्क कुंड में स्नान करता है। उसे कुष्ठ जैसे रोगों से मुक्ति मिलती है तथा उसकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं।।

लोलार्क षष्ठी पर स्नान तथा पूजा की विधि।। Method Of Snan And Puja On Lolark Shashti.

मित्रों, लोलार्क षष्ठी के दिन श्रद्धालु ब्रह्म मुहूर्त में ही उठकर स्वच्छ होकर लोलार्क कुंड की ओर प्रस्थान करते हैं। सर्वप्रथम कुंड में स्नान किया जाता है। और इस दौरान भगवान सूर्य को अर्घ्य देने की भी परंपरा है। क्योंकि सूर्योदय की प्रथम किरण इसी कुंड पर पड़ने के कारण यह स्थान सूर्य देव को विशेष रूप से प्रिय माना जाता है। स्नान के पश्चात श्रद्धालु समीप स्थित लोलार्केश्वर महादेव के मंदिर में जाकर भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। तथा संतान-प्राप्ति की कामना के साथ विधिपूर्वक पूजा-अर्चना करते हैं।।

जो दंपति संतान-सुख की कामना से यह व्रत रखते हैं। वे विशेष रूप से श्रद्धा तथा संयम के साथ इस अनुष्ठान को संपन्न करते हैं। पूजा के दौरान रोली, चावल, फूल, फल तथा दीप अर्पित किए जाते हैं। और यथाशक्ति दान-पुण्य भी किया जाता है। अनेक श्रद्धालु इस दिन उपवास भी रखते हैं। तथा शाम को सूर्यास्त के पश्चात ही अन्न ग्रहण करते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन तथा पूर्ण श्रद्धा के साथ किया गया यह स्नान-पूजन निश्चय ही संतान-सुख का आशीर्वाद प्रदान करता है।।

लोलार्क षष्ठी का शास्त्रीय तथा सामाजिक महत्व।। Scriptural And Social Significance Of Lolark Shashti.

मित्रों, लोलार्क षष्ठी केवल एक स्थानीय मेला मात्र नहीं है। बल्कि यह भारतीय संस्कृति में सूर्य-उपासना, संतान-प्राप्ति की कामना तथा आस्था की गहनता का प्रतीक पर्व है। भाद्रपद मास को स्वयं ही आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत पवित्र माना जाता है। और इसी मास में पड़ने वाली षष्ठी तिथि को संतान से संबंधित व्रतों के लिए विशेष रूप से उपयुक्त समझा जाता है। यही कारण है कि इसी अवधि में हल षष्ठी अर्थात हरछठ जैसा पर्व भी मनाया जाता है। जो संतान की दीर्घायु तथा सुरक्षा के लिए रखा जाता है।।

चिकित्सकीय दृष्टिकोण से भी कुछ विद्वान इस मान्यता की व्याख्या इस प्रकार करते हैं कि सूर्य की प्रातःकालीन किरणों में विटामिन डी तथा अन्य लाभकारी तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। और नियमित रूप से इन किरणों के संपर्क में आना शारीरिक स्वास्थ्य तथा प्रजनन-क्षमता दोनों के लिए लाभकारी सिद्ध होता है। भले ही यह वैज्ञानिक व्याख्या हो अथवा पौराणिक आस्था। परंतु सैकड़ों वर्षों से चली आ रही यह परंपरा आज भी लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बनी हुई है।।

लेख का निष्कर्ष।। Conclusion.

मित्रों, लोलार्क षष्ठी 2026 का यह पावन पर्व 17 सितंबर के दिन काशी नगरी को एक बार पुनः आस्था तथा श्रद्धा के सागर में डुबोने जा रहा है। महाभारत काल से चली आ रही यह परंपरा, भगवान सूर्य की तपस्या तथा कूचबिहार के राजा की चमत्कारिक कथा के साथ जुड़कर आज भी उतनी ही जीवंत तथा प्रभावशाली बनी हुई है। जो दंपति सच्चे मन, पूर्ण श्रद्धा तथा संयमित आचरण के साथ इस दिन लोलार्क कुंड में स्नान करते हैं। तथा लोलार्केश्वर महादेव का विधिपूर्वक पूजन करते हैं। उन्हें शास्त्रों की मान्यता के अनुसार अवश्य ही संतान-सुख की प्राप्ति होती है।।

परन्तु मेरी आपको यही सलाह है कि इस प्रकार की किसी भी धार्मिक यात्रा अथवा व्रत-अनुष्ठान से पूर्व अपने स्वास्थ्य तथा परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ही निर्णय लें। तथा आवश्यकता पड़ने पर किसी अनुभवी पंडित अथवा विद्वान से सही विधि की जानकारी अवश्य प्राप्त कर लें। ताकि यह पावन अनुष्ठान पूर्ण श्रद्धा तथा सही विधि के साथ संपन्न हो सके ऐसा करें।।

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