भूखंड या प्लॉट चयन के वास्तु के नियम।। Vastu Rules For Selecting Plot Or Land.
भूखंड चयन का महत्व।। Introduction to Plot Selection.
मित्रों, वास्तु शास्त्र के अनुसार किसी भी भवन की समग्र शुभता उस भूमि पर ही निर्भर करती है। जिस पर वह भवन निर्मित होता है। यही कारण है कि भवन-निर्माण की संपूर्ण प्रक्रिया में सबसे पहला तथा सबसे महत्वपूर्ण चरण भूखंड का चयन ही माना जाता है। यदि भूमि स्वयं वास्तु के अनुकूल न हो, तो उस पर बनने वाला भवन चाहे कितना भी सुंदर अथवा भव्य क्यों न हो, उसमें वास्तु दोष बने रहने की संभावना सदैव बनी रहती है।।
प्राचीन वास्तु ग्रंथों में भूमि को माता का स्वरूप माना गया है। तथा यह मान्यता है कि जिस भूमि पर मनुष्य निवास करता है। वह भूमि उसके जीवन की दिशा तथा उसके भाग्य को भी गहराई से प्रभावित करती है। इसीलिए किसी भी नवीन भूखंड को क्रय करने से पूर्व उसकी आकृति, दिशा, ढलान, मिट्टी तथा आस-पास के वातावरण का सूक्ष्मता से अध्ययन करना अत्यंत आवश्यक माना जाता है। आइए अब हम भूखंड चयन से जुड़े शास्त्रीय नियमों को विस्तार से समझने का प्रयास करते हैं।।
भूखंड की आकृति से जुड़े नियम।। Rules Related to the Shape of the Plot.
मित्रों, वास्तु शास्त्र के अनुसार भूखंड की आकृति का सबसे अधिक महत्व माना गया है। शास्त्रों में वर्गाकार अर्थात चौकोर भूमि को सर्वाधिक शुभ तथा सर्वश्रेष्ठ माना गया है। क्योंकि यह आकृति संतुलन, स्थिरता तथा सौभाग्य की प्रतीक मानी जाती है। इसके पश्चात आयताकार भूमि को भी शुभ माना जाता है। परंतु इसके लिए एक विशेष शर्त यह है कि भूमि की लंबाई पूर्व-पश्चिम दिशा में हो, तथा चौड़ाई की तुलना में लंबाई का अनुपात भी अत्यधिक असंतुलित न हो।।
इसके विपरीत त्रिकोणाकार, वृत्ताकार अथवा किसी भी असामान्य एवं अनियमित आकृति वाली भूमि को वास्तु शास्त्र में अशुभ माना गया है। ऐसी भूमि पर निर्मित भवन में रहने वाले परिवार को पारिवारिक तनाव, आर्थिक अस्थिरता तथा मानसिक अशांति जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसी प्रकार जिस भूखंड का कोई भी कोण कटा हुआ अथवा अनावश्यक रूप से बढ़ा हुआ हो, उसे भी दोषपूर्ण माना जाता है। हाँ, यदि भूमि का विस्तार ईशान कोण अर्थात उत्तर-पूर्व दिशा की ओर हो, तो इसे अपवाद स्वरूप शुभ माना जाता है।।
भूखंड की दिशा से जुड़े नियम।। Rules Related to the Direction of the Plot.
मित्रों, भूखंड की दिशा भी वास्तु शास्त्र में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। पूर्वमुखी तथा उत्तरमुखी भूमि को धन, प्रगति तथा सुख-समृद्धि प्रदान करने वाली भूमि माना गया है। क्योंकि इन दिशाओं से सूर्य की सकारात्मक ऊर्जा तथा प्रकाश भवन में प्रचुर मात्रा में प्रवेश करता है। पश्चिममुखी भूमि को सामान्य फल देने वाली भूमि माना जाता है। जबकि दक्षिणमुखी भूमि के चयन में विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है।।
यह ध्यान रखना भी आवश्यक है कि यद्यपि दक्षिण, पश्चिम, नैऋत्य तथा वायव्य दिशा को स्वाभाविक रूप से उत्तर, पूर्व तथा ईशान की तुलना में कम शुभ माना जाता है। परंतु यदि इन दिशाओं में स्थित भूखंडों का निर्माण भी वास्तु के समुचित नियमों के अनुसार किया जाए। तो वे भी संतोषजनक तथा शुभ फल प्रदान करते हैं। अतः दिशा के साथ-साथ निर्माण की विधि का भी उतना ही महत्वपूर्ण माना जाता है।।
भूखंड की ढलान से जुड़े नियम।। Rules Related to the Slope of the Plot.
मित्रों, वास्तु शास्त्र में भूमि की ढलान को भी अत्यंत सूक्ष्मता से देखा जाता है। शास्त्रों के अनुसार जिस भूखंड की ढलान उत्तर, पूर्व अथवा ईशान कोण की ओर हो, उसे सर्वाधिक शुभ माना जाता है। क्योंकि इस ढलान के कारण जल स्वाभाविक रूप से इन्हीं शुभ दिशाओं की ओर प्रवाहित होता है। जो सकारात्मक ऊर्जा के संचार का प्रतीक माना जाता है। यदि किसी भूमि की प्राकृतिक ढलान इन दिशाओं की ओर न हो, तो मिट्टी भराव के माध्यम से इसे कृत्रिम रूप से समुचित बनाया जा सकता है।।
इसके विपरीत दक्षिण, पश्चिम अथवा नैऋत्य कोण की ओर ढलान वाली भूमि को वास्तु शास्त्र में अशुभ माना गया है। क्योंकि इस दिशा में जल-प्रवाह होने से घर में नकारात्मक ऊर्जा तथा आर्थिक अस्थिरता उत्पन्न होने की आशंका बताई गयी है। इसी प्रकार समतल भूमि को भी सामान्यतः अत्यंत उपयुक्त तथा शुभ माना जाता है। और ऐसी भूमि पर निर्माण-कार्य भी अपेक्षाकृत सरल तथा कम व्ययसाध्य सिद्ध होता है।।
भूखंड की मिट्टी तथा भूमि-परीक्षण।। Soil Quality and Land Testing.
मित्रों, प्राचीन वास्तु ग्रंथों में भूमि क्रय करने से पूर्व मिट्टी की गुणवत्ता की भी विशेष परीक्षा करने की सलाह दी गई है। शास्त्रों के अनुसार जिस भूमि की मिट्टी में मधुर सुगंध हो, जो चिकनी, दृढ़ तथा उपजाऊ प्रकृति की हो, उसे सर्वाधिक शुभ माना जाता है। इसके विपरीत जिस भूमि की मिट्टी में दुर्गंध हो, जो अत्यधिक रेतीली, पथरीली अथवा बंजर हो, उसे निर्माण हेतु अनुपयुक्त माना जाता है।।
इसके साथ ही यह भी देखा जाता है कि भूमि के भीतर जल-स्तर कितनी गहराई पर स्थित है। जिस भूमि में पर्याप्त गहराई पर स्वच्छ तथा मीठा जल उपलब्ध हो, उसे अत्यंत शुभ माना जाता है। कुछ पारंपरिक विधियों में भूमि-परीक्षण के लिए वहाँ एक गड्ढा खोदकर उसे जल से भरने तथा कुछ समय पश्चात उस जल के स्तर का अवलोकन करने की परंपरा भी प्रचलित रही है। जिससे भूमि की जल-धारण क्षमता का आकलन किया जाता था।।
भूखंड के आस-पास के वातावरण से जुड़े नियम।। Rules Related to the Surroundings of the Plot.
मित्रों, भूखंड की आकृति, दिशा तथा मिट्टी के साथ-साथ उसके आस-पास के वातावरण का भी वास्तु शास्त्र में विशेष महत्व बताया गया है। जो भूखंड किसी बंद गली के अंतिम छोर पर स्थित हो, उसे शुभ नहीं माना जाता, क्योंकि ऐसी स्थिति में ऊर्जा का समुचित प्रवाह अवरुद्ध हो जाता है। इसी प्रकार श्मशान, अस्पताल अथवा किसी नकारात्मक निर्माण के अत्यंत निकट स्थित भूमि को भी वास्तु शास्त्र में उपयुक्त नहीं माना जाता।।
इसके अतिरिक्त विद्युत ट्रांसफार्मर, मोबाइल टावर अथवा अन्य किसी विद्युत स्रोत के अत्यंत समीप स्थित भूमि से भी बचने की सलाह दी जाती है। क्योंकि ऐसे स्रोतों से उत्पन्न होने वाली विद्युत-चुंबकीय तरंगों को भी वास्तु की दृष्टि से अशुभ माना गया है। यह भी देखा जाता है कि भूखंड के दक्षिण अथवा पश्चिम दिशा में स्थित क्षेत्र, उत्तर तथा पूर्व दिशा की अपेक्षा अधिक खुला अथवा रिक्त होना चाहिए। ताकि भवन में सूर्य का प्रकाश तथा वायु का प्रवाह समुचित रूप से बना रहे।।
भूखंड के कोणों से जुड़े विशेष नियम।। Special Rules Related to the Corners of the Plot.
मित्रों, वास्तु शास्त्र में भूखंड के चारों कोणों का भी अत्यंत सूक्ष्मता से अध्ययन किया जाना चाहिए। यदि किसी भूखंड का आग्नेय कोण अर्थात दक्षिण-पूर्व दिशा कटी हुई हो, तो इसे अग्नि तत्व से जुड़ा दोष माना जाता है। जिससे घर में क्रोध तथा स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ उत्पन्न होने की सम्भावना होती है। इसी प्रकार यदि नैऋत्य कोण अर्थात दक्षिण-पश्चिम दिशा कटी हुई हो, तो इसे घर की स्थिरता तथा दीर्घायु के लिए अशुभ माना जाता है।।
वायव्य कोण अर्थात उत्तर-पश्चिम दिशा के कटे होने से पारिवारिक संबंधों में अस्थिरता उत्पन्न होती है। जबकि ईशान कोण अर्थात उत्तर-पूर्व दिशा का कटा होना सर्वाधिक अशुभ माना जाता है। क्योंकि यह दिशा स्वयं देवताओं की दिशा मानी गई है। इसके विपरीत यदि भूखंड का विस्तार ईशान कोण की ओर अतिरिक्त रूप से बढ़ा हुआ हो, तो इसे शुभ मानकर स्वीकार किया जाता है। क्योंकि यह देवताओं के स्थान में वृद्धि का प्रतीक समझा जाता है।।
भूखंड चयन के पश्चात भूमि-पूजन का महत्व।। Importance of Bhoomi Pujan After Selecting the Plot.
मित्रों, वास्तु शास्त्र के अनुसार उपयुक्त भूखंड के चयन के पश्चात निर्माण-कार्य आरंभ करने से पूर्व विधिपूर्वक भूमि-पूजन करना भी अत्यंत आवश्यक माना जाता है। इस पूजन में विशेषकर ईशान कोण में कलश की स्थापना तथा नाग-नागिन के प्रतीकों की पूजा की परंपरा प्रचलित है। जो वास्तु पुरुष को प्रसन्न करने के उद्देश्य से की जाती है। यह पूजन भूमि की नकारात्मक ऊर्जा को शांत कर वहाँ सकारात्मकता का संचार करने में सहायक माना जाता है।।
निर्माण-कार्य आरंभ करने से पूर्व शुभ मुहूर्त का चयन करना भी उतना ही महत्वपूर्ण समझा जाता है। जितना कि भूमि का चयन का। अनेक विद्वान ज्योतिषी तथा वास्तुशास्त्री इस बात पर बल देते हैं कि सही भूमि, सही दिशा तथा सही मुहूर्त का त्रिवेणी संगम ही किसी भी भवन को दीर्घकाल तक सुख, समृद्धि तथा स्थायित्व प्रदान करने में सक्षम होता है।।
लेख का निष्कर्ष।। Conclusion.
मित्रों, भूखंड अर्थात प्लॉट का चयन किसी भी भवन-निर्माण की सबसे प्रथम तथा सबसे महत्वपूर्ण नींव माना जाता है। भूमि की आकृति, दिशा, ढलान, मिट्टी तथा आस-पास के वातावरण का सूक्ष्मता से अध्ययन करके ही एक ऐसा भूखंड चुना जा सकता है। जो आगे चलकर परिवार को स्थायी सुख, समृद्धि तथा मानसिक शांति प्रदान कर सके। वर्गाकार अथवा पूर्व-पश्चिम विस्तार वाली आयताकार भूमि, उत्तर अथवा पूर्व की ओर ढलान तथा शुद्ध एवं उपजाऊ मिट्टी को शास्त्रों में सर्वाधिक शुभ माना गया है।।
वैदिक वास्तु परंपरा के अनुसार भूमि-पूजन तथा शुभ मुहूर्त में निर्माण-कार्य का आरंभ भी इन शास्त्रीय नियमों का ही एक अभिन्न भाग माना जाता है। और यहाँ मैं यही कहूँगा कि जो व्यक्ति भूखंड चयन के समय ही इन नियमों का सम्मानपूर्वक पालन कर लेता है। उसे आगे चलकर भवन में किसी बड़े वास्तु दोष का सामना करने की संभावना बहुत कम रह जाती है।।
परन्तु मेरी आपको यही सलाह है कि किसी भी भूखंड को क्रय करने अथवा उस पर निर्माण-कार्य आरंभ करने से पूर्व किसी अनुभवी, योग्य एवं विद्वान वास्तु विशेषज्ञ से उस भूमि का विश्लेषण अथवा निरिक्षण विधिपूर्वक अवश्य करवाना चाहिए। ताकि सही एवं व्यक्तिगत मार्गदर्शन प्राप्त हो सके।।
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