जीवित्पुत्रिका (जितिया) व्रत कथा एवं विधि।। Jivitputrika Jitiya Vrat.
जितिया व्रत और मातृत्व के अटूट रिश्ते का परिचय।। Introduction.
मित्रों, संतान के लिए एक माँ किस सीमा तक जा सकती है। इसका सबसे सुंदर तथा कठोर प्रमाण जीवित्पुत्रिका व्रत में देखने को मिलता है। इसे जितिया अथवा जिउतिया के नाम से भी जाना जाता है। यह व्रत अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। तथा इसमें माताएं अपनी संतान की दीर्घायु, अच्छे स्वास्थ्य तथा सुखी जीवन की कामना से चौबीस घंटे से भी अधिक समय तक निर्जला व्रत रखती हैं। इस अवधि में जल की एक बूंद तक ग्रहण नहीं की जाती। इसी कारण इसे सबसे कठिन व्रतों में गिना जाता है।।
इस व्रत की पौराणिक कथा राजा जीमूतवाहन से जुड़ी हुई है। कथा के अनुसार जीमूतवाहन ने नागों की रक्षा हेतु स्वयं को गरुड़ के समक्ष बलिदान के लिए प्रस्तुत कर दिया था। उनके इस असाधारण त्याग तथा करुणा से प्रभावित होकर देवताओं ने उन्हें पुनर्जीवित कर दिया। इसी घटना की स्मृति में यह व्रत आरंभ हुआ। तथा इसे संतान की रक्षा तथा दीर्घायु से जोड़कर देखा जाने लगा।।
मित्रों, यह व्रत तीन दिवसीय व्रत-अनुष्ठान के रूप में मनाया जाता है। पहले दिन नहाय-खाय होता है। जिसमें व्रती पवित्र नदी अथवा जलाशय में स्नान करके सात्विक भोजन ग्रहण करती हैं। दूसरे दिन अष्टमी तिथि में पूर्ण निर्जला व्रत रखा जाता है। तथा तीसरे दिन नवमी तिथि में विधिपूर्वक पारण किया जाता है। यह व्रत मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश के कई भागों तथा नेपाल में विशेष रूप से प्रचलित है।।
तो आज हम विस्तार से जानेंगे कि वर्ष 2026 में जीवित्पुत्रिका व्रत कब मनाया जाएगा। तीनों दिनों का शुभ मुहूर्त क्या रहेगा। संपूर्ण व्रत-विधि किस प्रकार संपन्न की जाती है। तथा जीमूतवाहन की पौराणिक कथा क्या है।।
वर्ष 2026 में तिथि एवं मुहूर्त।। Date and Muhurat in 2026.
मित्रों, पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में अष्टमी तिथि 3 अक्तूबर की प्रातः लगभग 7:59 बजे से आरंभ होकर 4 अक्तूबर की प्रातः लगभग 5:51 बजे तक रहेगी। उदयातिथि तथा प्रदोष-काल में पूजा की परंपरा के अनुसार, इस वर्ष जीवित्पुत्रिका व्रत शनिवार, 3 अक्तूबर 2026 को रखा जाएगा।।
इससे पहले नहाय-खाय शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2026 को मनाया जाएगा। जिस दिन व्रती स्नान करके सात्विक भोजन ग्रहण करेंगी। व्रत का पारण रविवार, 4 अक्तूबर 2026 को नवमी तिथि लगने के पश्चात प्रातः लगभग 7:28 बजे के बाद किया जाएगा। पूजा हेतु इस दिन ब्रह्ममुहूर्त प्रातः लगभग 4:38 बजे से 5:26 बजे तक। तथा अभिजीत मुहूर्त दोपहर लगभग 11:46 बजे से 12:34 बजे तक रहेगा। जो पूजा के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है।।
मित्रों, यहाँ यह भी बता दूँ कि इन समयों में स्थान-विशेष के पंचांग, विशेषकर काशी तथा मिथिला पंचांग के अनुसार, कुछ घंटों का अंतर संभव है। इसलिए अपने क्षेत्र के पंचांग अथवा स्थानीय पुरोहित से एक बार अवश्य पुष्टि कर लें।।
तीन दिवसीय व्रत-विधि।। The Three-Day Vrat Vidhi.
मित्रों, नहाय-खाय के दिन व्रती प्रातःकाल पवित्र नदी अथवा जलाशय में स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करती हैं। तथा दिनभर सात्विक तथा हल्का भोजन ग्रहण करती हैं। इस दिन विशेष रूप से नोनी का साग, मडुआ की रोटी तथा मरुआ जैसे पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं। जो इस क्षेत्र की सांस्कृतिक परंपरा का अभिन्न अंग माने जाते हैं।।
अष्टमी तिथि के दिन, अर्थात मुख्य व्रत के दिन, व्रती प्रातःकाल से ही पूर्ण निर्जला उपवास आरंभ करती हैं। इस दिन घर के पूजा-स्थान में जीमूतवाहन देवता की प्रतिमा अथवा चित्र स्थापित करके विधिवत पूजा की जाती है। पूजा में जीमूतवाहन तथा चील-सियारिन की कथा का श्रवण किया जाता है। तथा संतान की दीर्घायु हेतु व्रत का संकल्प लिया जाता है। संध्याकाल में भी विशेष पूजा-अर्चना तथा कथा-श्रवण का आयोजन होता है।।
व्रत के तीसरे दिन अर्थात नवमी तिथि को, निर्धारित शुभ मुहूर्त पर व्रती जल ग्रहण करके तथा पारंपरिक व्यंजनों का भोग लगाकर व्रत का पारण करती हैं। पारण में मडुआ की रोटी, नोनी का साग तथा अन्य सात्विक व्यंजन विशेष रूप से बनाए जाते हैं। जिन्हें व्रती तथा परिजन प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।।
जीमूतवाहन की पौराणिक कथा।। The Legendary Story of Jimutavahana.
मित्रों, इस व्रत से जुड़ी कथा राजा जीमूतवाहन की है। जो अत्यंत दयालु तथा परोपकारी स्वभाव के थे। एक बार उन्होंने देखा कि गरुड़ देवता प्रतिदिन एक नाग को भोजन के रूप में ले जाते थे। जिस कारण नाग-जाति में भय तथा शोक व्याप्त था। जीमूतवाहन ने यह दृश्य देखकर स्वयं को नाग के स्थान पर गरुड़ को अर्पित करने का निश्चय किया। ताकि एक निर्दोष प्राणी की रक्षा हो सके।।
जब गरुड़ जीमूतवाहन को ले जाने लगे, तो उनके इस असाधारण त्याग तथा करुणा को देखकर गरुड़ अत्यंत प्रभावित हुए। जीमूतवाहन के रक्त की एक बूंद देखकर गरुड़ को अपने कृत्य पर गहरा पश्चाताप हुआ। तथा उन्होंने न केवल जीमूतवाहन को पुनर्जीवित किया। अपितु भविष्य में कभी भी किसी नाग का भक्षण न करने का वचन भी दिया।।
इसी घटना की स्मृति में जीवित्पुत्रिका व्रत आरंभ हुआ। तथा इसे संतान की सुरक्षा, दीर्घायु तथा त्याग की भावना से जोड़कर देखा जाने लगा। यही कारण है कि यह व्रत विशेष रूप से माताओं द्वारा अपनी संतान की भलाई की कामना से रखा जाता है।।
लेख का निष्कर्ष।। Conclusion.
मित्रों, जीवित्पुत्रिका व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, अपितु एक माँ के त्याग, प्रेम तथा अपनी संतान की भलाई के प्रति अटूट समर्पण का प्रतीक है। जीमूतवाहन की कथा हमें यह सिखाती है, कि करुणा तथा परोपकार की भावना अंततः सर्वोच्च फल प्रदान करती है।।
जो माताएं इस पावन व्रत को पूर्ण श्रद्धा तथा नियम-संयम के साथ करती हैं, वे न केवल अपनी संतान की दीर्घायु तथा सुख की कामना पूर्ण होते देखती हैं। अपितु स्वयं भी आध्यात्मिक संतोष तथा शक्ति का अनुभव करती हैं। इसलिए इस वर्ष 3 अक्तूबर को श्रद्धापूर्वक इस व्रत को करें। तथा अपनी संतान के लिए दीर्घायु का आशीर्वाद प्राप्त करें।।
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