पूजा घर का वास्तु।। Puja Room Vastu.
पूजा घर और वास्तु शास्त्र का संबंध।। Introduction.
मित्रों, वास्तु शास्त्र में पूजा घर को संपूर्ण भवन का सबसे पवित्र तथा ऊर्जावान स्थान माना गया है। क्योंकि यहीं से घर की आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार संपूर्ण भवन में होता है। पूजा घर केवल मूर्ति अथवा तस्वीर स्थापित करने का स्थान मात्र नहीं है। बल्कि यह वह केंद्र माना जाता है, जहाँ से परिवार के प्रत्येक सदस्य को मानसिक शांति, सकारात्मकता तथा दैवीय आशीर्वाद प्राप्त होता है।।
पूजा घर का संबंध मुख्यतः जल तथा अग्नि दोनों तत्वों के संतुलन से माना जाता है। क्योंकि यहाँ दीपक की अग्नि तथा जल का कलश दोनों साथ-साथ विराजमान होते हैं। यही कारण है कि इसकी दिशा तथा संरचना का निर्धारण अत्यंत सूक्ष्मता से किया जाना चाहिए। क्योंकि यदि यह स्थान सही दिशा में न हो, तो घर की सकारात्मक ऊर्जा बाधित हो सकती है। तथा परिवार को मानसिक अशांति अथवा पारिवारिक कलह जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।।
इसके विपरीत यदि पूजा घर वास्तु के अनुरूप सही दिशा तथा संरचना में बना हो, तो यह संपूर्ण भवन में सकारात्मक तथा दैवीय ऊर्जा का संचार करता है। जिससे परिवार में सुख-शांति, स्वास्थ्य तथा समृद्धि बनी रहती है। यही कारण है कि प्राचीन वास्तु ग्रंथों में पूजा घर के निर्माण को अत्यंत गंभीरता से लिया गया है। तथा इसकी दिशा से लेकर मूर्ति-स्थापना तक का सूक्ष्म वर्णन किया गया है।।
पूजा घर के लिए सर्वाधिक शुभ दिशा।। Most Auspicious Direction for the Puja Room.
मित्रों, वास्तु शास्त्र के अनुसार पूजा घर के लिए सर्वाधिक शुभ दिशा ईशान कोण अर्थात उत्तर-पूर्व दिशा मानी गई है। क्योंकि यह दिशा स्वयं देवताओं की दिशा कही जाती है। तथा इसे सर्वाधिक पवित्र तथा ऊर्जावान दिशा माना गया है। इस दिशा में पूजा घर होने पर संपूर्ण भवन में सकारात्मक तथा आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रवाह स्वाभाविक रूप से बना रहता है। तथा परिवार के सदस्यों को मानसिक शांति एवं दैवीय कृपा सहज ही प्राप्त होती है।।
यदि किसी कारणवश ईशान कोण में पूजा घर बनाना संभव न हो, तो पूर्व दिशा अथवा उत्तर दिशा को भी द्वितीय विकल्प के रूप में स्वीकार्य माना गया है। क्योंकि ये दोनों दिशाएँ भी सूर्य तथा कुबेर देवता से संबंधित होने के कारण शुभ मानी जाती हैं। पूजा घर को दक्षिण दिशा में बनाने से पूर्णतः बचना चाहिए। क्योंकि यह दिशा यमराज की दिशा मानी जाती है। तथा यहाँ पूजा घर होने पर परिवार को मानसिक अशांति तथा स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।।
पूजा घर को कभी भी शौचालय, सीढ़ी के नीचे अथवा शयनकक्ष के भीतर बनाने से भी बचना चाहिए। क्योंकि ये सभी स्थान पूजा घर की पवित्रता तथा शांति के प्रतिकूल माने जाते हैं। यदि पूजा घर शयनकक्ष में ही बनाना अनिवार्य हो, तो इसे पूर्व अथवा उत्तर-पूर्व दिशा की दीवार के निकट ही स्थापित करना चाहिए।।
मूर्ति तथा तस्वीर की स्थापना संबंधी नियम।। Rules for Idol and Picture Placement.
मित्रों, पूजा घर में देवी-देवताओं की मूर्ति अथवा तस्वीर स्थापित करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि पूजा करते समय व्यक्ति का मुख पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर हो। तथा मूर्तियों का मुख पश्चिम अथवा दक्षिण दिशा की ओर न हो। मूर्तियों को दीवार से सटाकर नहीं, बल्कि कुछ दूरी पर स्थापित करना चाहिए। तथा इन्हें भूमि से कम से कम कुछ ऊँचाई पर ही रखना उचित माना जाता है।।
मूर्तियों का आकार अत्यधिक बड़ा नहीं होना चाहिए। तथा एक ही देवता की दो मूर्तियाँ अथवा तस्वीरें एक साथ स्थापित करने से बचना चाहिए। खंडित अथवा टूटी हुई मूर्तियों को पूजा घर में कदापि नहीं रखना चाहिए। तथा ऐसी मूर्तियों को श्रद्धापूर्वक किसी पवित्र नदी अथवा जलाशय में विसर्जित कर देना चाहिए। क्योंकि खंडित मूर्तियाँ नकारात्मक ऊर्जा का कारण बन जाती हैं।।
पूर्वजों की तस्वीरों को पूजा घर में स्थापित करने से बचना चाहिए। तथा यदि रखना ही हो तो इन्हें देवी-देवताओं की मूर्तियों से थोड़ी दूरी पर तथा दक्षिण दिशा की दीवार पर लगाना उचित माना जाता है।।
दीपक, अगरबत्ती तथा अन्य पूजन-सामग्री का स्थान।। Placement of Lamp, Incense and Other Worship Items.
मित्रों, पूजा घर में दीपक जलाने का स्थान अग्नि-कोण अर्थात दक्षिण-पूर्व दिशा में रखना शुभ माना जाता है। क्योंकि यह दिशा स्वयं अग्नि तत्व की दिशा है। घी का दीपक भगवान की दाहिनी ओर तथा तेल का दीपक बायीं ओर रखना पारंपरिक रूप से उचित माना गया है। अखंड ज्योति को भी सामान्यतः इसी दिशा में स्थापित करना शुभ रहता है।।
जल-कलश तथा शंख को पूजा घर के उत्तर-पूर्व अर्थात ईशान कोण में रखना सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है। क्योंकि यह दिशा जल-तत्व की दिशा है। पूजा घर में धूप-अगरबत्ती तथा अन्य सुगंधित सामग्री का उपयोग नियमित रूप से करना चाहिए। क्योंकि इससे वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। तथा नकारात्मकता दूर होती है।।
पूजा घर से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण वास्तु नियम।। Other Important Vastu Rules Related to Puja Room.
मित्रों, पूजा घर के द्वार सदैव लकड़ी के तथा सुंदर नक्काशीदार होने चाहिए। तथा इस स्थान पर धातु के भारी दरवाजों का प्रयोग करने से बचना चाहिए। पूजा घर की दीवारों के लिए सफेद, हल्के पीले अथवा हल्के गुलाबी रंग को शुभ माना गया है। क्योंकि ये रंग पवित्रता तथा शांति के प्रतीक होते हैं। जबकि गहरे तथा काले रंगों से इस स्थान पर बचना चाहिए।।
पूजा घर के ऊपर अथवा नीचे शौचालय अथवा रसोईघर होने से भी बचना चाहिए। तथा इस स्थान को सदैव स्वच्छ, सुव्यवस्थित एवं अव्यवस्था से मुक्त रखना चाहिए। पूजा घर में जूते-चप्पल पहनकर प्रवेश करना भी वर्जित माना गया है। तथा नियमित रूप से इस स्थान की सफाई करना भी अत्यंत आवश्यक बताया गया है।।
और मेरी सलाह तो यही रहेगी कि पूजा घर को केवल एक औपचारिक स्थान न मानकर, इसे श्रद्धा तथा नियमितता के साथ प्रतिदिन प्रातःकाल एवं संध्याकाल पूजन का केंद्र बनाएं। क्योंकि यहाँ बनी हुई सकारात्मक ऊर्जा ही संपूर्ण घर तथा परिवार के जीवन में सुख-शांति का संचार करती है।।
पूजा घर वास्तु दोष के निवारण के उपाय।। Remedies for Puja Room Vastu Dosha.
मित्रों, यदि किसी कारणवश पूजा घर गलत दिशा में बना हो, तो उसे तोड़कर पुनर्निर्माण करने की बजाय कुछ सरल उपायों से भी इसके दोष को काफी हद तक संतुलित किया जा सकता है। पूजा घर में नियमित रूप से कपूर जलाना, शंखनाद करना तथा घंटी बजाना नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने में विशेष रूप से सहायक माना जाता है।।
यदि पूजा घर सही दिशा में न हो, तो कम से कम पूजा करते समय अपना मुख पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर रखने का प्रयास अवश्य करना चाहिए। इसके साथ ही पूजा घर में नियमित रूप से वैदिक मंत्रों का उच्चारण तथा हवन करना भी वहाँ की ऊर्जा को शुद्ध तथा संतुलित करने में सहायक सिद्ध होता है।।
शास्त्रीय प्रमाण।। Scriptural References.
मित्रों, मयमतम् तथा विश्वकर्मा वास्तुशास्त्र जैसे प्राचीन ग्रंथों में पूजा घर के लिए ईशान कोण को ही सर्वोत्तम दिशा बताया गया है। तथा यह भी स्पष्ट किया गया है कि यह स्थान संपूर्ण भवन में सबसे अधिक पवित्र तथा ऊर्जावान माना जाता है। इसलिए इसकी शुद्धता का सदैव ध्यान रखना चाहिए।।
बृहत्संहिता में भी गृह-निर्माण के प्रसंग में देव-स्थान की चर्चा करते हुए यह उल्लेख किया गया है कि घर में देवताओं का स्थान सूर्योदय की दिशा के निकट होना चाहिए। ताकि प्रातःकाल की प्रथम किरणें सीधे पूजा घर में प्रवेश कर सकें। जिससे वहाँ की ऊर्जा निरंतर शुद्ध तथा जाग्रत बनी रहे।।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न।। Frequently Asked Questions. (FAQ)
प्रश्न 1. पूजा घर के लिए सबसे शुभ दिशा कौन-सी मानी जाती है।। Which direction is considered most auspicious for the puja room.
उत्तर:- ईशान कोण अर्थात उत्तर-पूर्व दिशा पूजा घर के लिए सर्वाधिक शुभ मानी जाती है। क्योंकि यह दिशा स्वयं देवताओं की दिशा कही जाती है।।
प्रश्न 2. पूजा करते समय मुख किस दिशा में होना चाहिए।। Which direction should one face while worshipping.
उत्तर:- पूजा करते समय व्यक्ति का मुख पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर होना शुभ माना जाता है।।
प्रश्न 3. क्या पूजा घर शयनकक्ष में बनाया जा सकता है।। Can the puja room be built inside a bedroom.
उत्तर:- यदि अनिवार्य हो तो शयनकक्ष में भी पूजा घर बनाया जा सकता है। परन्तु इसे पूर्व अथवा उत्तर-पूर्व दिशा की दीवार के निकट ही स्थापित करना चाहिए।।
प्रश्न 4. खंडित मूर्तियों का क्या करना चाहिए।। What should be done with broken idols.
उत्तर:- खंडित अथवा टूटी हुई मूर्तियों को पूजा घर में नहीं रखना चाहिए। तथा इन्हें श्रद्धापूर्वक किसी पवित्र नदी अथवा जलाशय में विसर्जित कर देना चाहिए।।
प्रश्न 5. यदि पूजा घर गलत दिशा में बना हो तो क्या उपाय करना चाहिए।। What remedies should be done if the puja room is in the wrong direction.
उत्तर:- नियमित रूप से कपूर जलाना, शंखनाद करना, घंटी बजाना तथा पूजा करते समय मुख पूर्व अथवा उत्तर दिशा में रखना इस दोष को कम करने में सहायक माना जाता है।।
लेख का निष्कर्ष।। Conclusion.
मित्रों, पूजा घर का वास्तु घर की आध्यात्मिक ऊर्जा तथा पारिवारिक सुख-शांति से गहरा संबंध रखता है। क्योंकि यही वह स्थान है, जहाँ से संपूर्ण भवन में दैवीय तथा सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। ईशान कोण में पूजा घर, पूर्वाभिमुख होकर पूजन, तथा मूर्ति-स्थापना एवं सामग्री-व्यवस्था के सूक्ष्म नियमों का पालन करना, ये सभी मिलकर घर में एक शुद्ध तथा शांतिपूर्ण वातावरण का निर्माण करते हैं।।
वैदिक वास्तु परंपरा के अनुसार पूजा घर को केवल एक कक्ष न मानकर, इसे संपूर्ण भवन की आत्मा के समान समझना चाहिए। तथा इसकी पवित्रता, स्वच्छता एवं वास्तु-संतुलन का सदैव विशेष ध्यान रखना चाहिए। इससे न केवल परिवार को मानसिक शांति प्राप्त होती है। बल्कि दीर्घकालिक सुख, स्वास्थ्य तथा समृद्धि भी सुरक्षित रहती है।।
परन्तु किसी भी नवीन भवन-निर्माण अथवा पूजा घर के पुनर्निर्माण से पूर्व किसी योग्य तथा शास्त्र-सम्मत वास्तुविद् अथवा ज्योतिषी से अवश्य परामर्श करना चाहिए। ताकि सही तथा व्यक्तिगत मार्गदर्शन प्राप्त हो सके।।
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