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राज योग।। Raj yoga.

Raj yoga
Raj yoga

राजयोग।। Raj yoga.

हैल्लो फ्रेण्ड्सzzz,

मित्रों, ज्योतिष शास्त्र में “राजयोग” शब्द सुनते ही मन में एक अपूर्व उत्साह जाग उठता है। राजयोग वह दिव्य योग है जो जातक को सामान्य जन से उठाकर असाधारण ऊँचाइयों तक पहुँचा देता है। आज हम इसी राजयोग के विषय में विस्तार से जानेंगे।।

मित्रों, राजयोग की उत्पत्ति तब होती है जब जन्म कुण्डली में केन्द्र भाव (१, ४, ७, १०) के स्वामी और त्रिकोण भाव (१, ५, ९) के स्वामी आपस में किसी प्रकार सम्बन्ध स्थापित करते हैं। यह सम्बन्ध युति, दृष्टि अथवा परस्पर राशि परिवर्तन के द्वारा हो सकता है।।

केन्द्र के स्वामी को विष्णु स्थान का स्वामी और त्रिकोण के स्वामी को लक्ष्मी स्थान का स्वामी कहा जाता है। जब विष्णु और लक्ष्मी दोनों एक साथ होते हैं तो जातक के जीवन में क्या नहीं हो सकता! यही राजयोग का मूल सिद्धान्त है।।

मित्रों, राजयोग वाले जातक जीवन में अत्यन्त उच्च पद और प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं। ये अपने कार्यक्षेत्र में एक अलग पहचान बनाते हैं। इनके कार्यों की लोग सराहना करते हैं और इनका अनुसरण करते हैं। राजनीति, व्यापार, प्रशासन, खेल या कला — किसी भी क्षेत्र में राजयोग वाला जातक शीर्ष पर पहुँचता है।।

राजयोग कई प्रकार के होते हैं मित्रों। पञ्चमेश और नवमेश की युति एक प्रबल राजयोग बनाती है जिसे “धर्म-कर्म राजयोग” भी कहते हैं। इसी प्रकार लग्नेश और पञ्चमेश की युति, लग्नेश और नवमेश की युति भी अत्यन्त शुभ राजयोग होते हैं।।

मित्रों, यह भी जानना आवश्यक है कि राजयोग का फल दशा-अन्तर्दशा के अनुसार मिलता है। यदि राजयोग बनाने वाले ग्रहों की दशा आए तब ही इस योग का पूर्ण फल जातक के जीवन में प्रकट होता है। बिना योगकारक ग्रह की दशा के राजयोग का फल सुप्त ही रहता है।।

जिन जातकों की कुण्डली में राजयोग हो, उन्हें नित्य श्री विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना चाहिए। श्री लक्ष्मी की उपासना भी इस योग को और प्रबल बनाती है। परिश्रम, ईमानदारी और सकारात्मक सोच के साथ यदि राजयोग वाला जातक अपना जीवन जीये तो उसकी सफलता को कोई नहीं रोक सकता।।

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