Home Devi Devata Bhagwan Shiva अथ श्री काशी विश्वनाथ सुप्रभातम्।।

अथ श्री काशी विश्वनाथ सुप्रभातम्।।

Shri Kashi Vishvanatha Suprabhatam
Shri Kashi Vishvanatha Suprabhatam

अथ श्री काशी विश्वनाथ सुप्रभातम्।। Shri Kashi Vishvanatha Suprabhatam.

श्रीकाशीविश्वनाथसुप्रभातम्:-

॥ श्रीगुरुभ्यो नमः॥

विश्वेशं माधवं ढुण्ढिं दण्डपाणिं च भैरवम्।
वन्दे काशीं गुहां गङ्गां भवानीं मणिकर्णिकाम्॥१॥

उत्तिष्ठ काशि भगवान् प्रभुविश्वनाथो
गङ्गोर्मि-संगति-शुभैः परिभूषितोऽब्जैः।
श्रीढुण्ढि-भैरव-मुखैः सहिताऽऽन्नपूर्णा
माता च वाञ्छति मुदा तव सुप्रभातम्॥२॥

ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारिः
भानुः शशी भूमिसुतो बुधश्च।
गुरुश्च शुक्रः शनि-राहु-केतवः
कुर्वन्तु सर्वे भुवि सुप्रभातम्॥३॥

वाराणसी-स्थित-गजानन-ढुण्ढिराज
तापत्रयापहरणे प्रथित-प्रभाव।
आनन्द-कन्दलकुल-प्रसवैकभूमे
नित्यं समस्त-जगतः कुरु सुप्रभातम्॥४॥

ब्रह्मद्रवोपमित-गाङ्ग-पयः-प्रवाहैः
पुण्यैः सदैव परिचुंबित-पादपद्मे।
मध्ये-ऽखिलामरगणैः परिसेव्यमाने
श्रीकाशिके कुरु सदा भुवि सुप्रभातम्॥५॥

प्रत्नैरसंख्य-मठ-मन्दिर-तीर्थ-कुण्ड-
प्रासाद-घट्ट-निवहैः विदुषां वरैश्च
आवर्जयस्यखिल-विश्व-मनांसि नित्यं
श्रीकाशिके कुरु सदा भुवि सुप्रभातम्॥६॥।

के वा नरा नु सुधियः कुधियोऽधियो वा
वाञ्छन्ति नान्तसमये शरणं भवत्याः।
हे कोटि-कोटि-जन-मुक्ति-विधान-दक्षे
श्रीकाशिके कुरु सदा भुवि सुप्रभातम्॥७॥

या देवैरसुरैर्मुनीन्द्रतनयैर्गन्धर्व-यक्षोरगैः
नागैर्भूतलवासिभिर्द्विजवरैस्संसेविता सिद्धये।
या गङ्गोत्तरवाहिनी-परिसरे तीर्थैरसंख्यैर्वृता
सा काशी त्रिपुरारिराज-नगरी देयात् सदा मङ्गलम्॥८॥

तीर्थानां प्रवरा मनोरथकरी संसार-पारापरा
नन्दा-नन्दि-गणेश्वरैरुपहिता देवैरशेषैः-स्तुता।
या शंभोर्मणि-कुण्डलैक-कणिका विष्णोस्तपो-दीर्घिका
सेयं श्रीमणिकर्णिका भगवती देयात् सदा मङ्गलम्॥९॥

अभिनव-बिस-वल्ली पाद-पद्मस्य विष्णोः
मदन-मथन-मौलेर्मालती पुष्पमाला।
जयति जय-पताका काप्यसौ मोक्षलक्ष्म्याः
क्षपित-कलि-कलङ्का जाह्नवी नः पुनातु॥१०॥

गाङ्गं वारि मनोहारि मुरारि-चरणच्युतम्।
त्रिपुरारि-शिरश्चारि पापहारि पुनातु माम्॥११॥

विघ्नावास-निवासकारण-महागण्डस्थलालंबितः
सिन्दूरारुण-पुञ्ज-चन्द्रकिरण-प्रच्छादि-नागच्छविः।
श्रीविघ्नेश्वर-वल्लभो गिरिजया सानन्दमानन्दितः (पाठभेद विश्वेश्वर)
स्मेरास्यस्तव ढुण्ढिराज-मुदितो देयात् सदा मङ्गलम्॥१२॥

कण्ठे यस्य लसत्कराल-गरलं गङ्गाजलं मस्तके
वामाङ्गे गिरिराजराज-तनया जाया भवानी सती।
नन्दि-स्कन्द-गणाधिराज-सहितः श्रीविश्वनाथप्रभुः
काशी-मन्दिर-संस्थितोऽखिलगुरुः देयात् सदा मङ्गलम्॥१३॥

श्रीविश्वनाथ करुणामृत-पूर्ण-सिन्धो
शीतांशु-खण्ड-समलंकृत-भव्यचूड।
उत्तिष्ठ विश्वजन-मङ्गल-साधनाय
नित्यं सर्वजगतः कुरु सुप्रभातम्॥१४॥

श्रीविश्वनाथ वृषभ-ध्वज विश्ववन्द्य
सृष्टि-स्थिति-प्रलय-कारक देवदेव।
वाचामगोचर महर्षि-नुताङ्घ्रि-पद्म
वाराणसीपुरपते कुरु सुप्रभातम्॥१५॥

श्रीविश्वनाथ भवभञ्जन दिव्यभाव
गङ्गाधर प्रमथ-वन्दित सुन्दराङ्ग।
नागेन्द्र-हार नत-भक्त-भयापहार
वाराणसीपुरपते कुरु सुप्रभातम्॥१६॥

श्रीविश्वनाथ तव पादयुगं नमामि
नित्यं तवैव शिव नाम हृदा स्मरामि।
वाचं तवैव यशसाऽनघ भूषयामि
वाराणसीपुरपते कुरु सुप्रभातम्॥१७॥

काशी-निवास-मुनि-सेवित-पाद-पद्म
गङ्गा-जलौघ-परिषिक्त-जटाकलाप।
अस्याखिलस्य जगतः सचराचरस्य
वाराणसीपुरपते कुरु सुप्रभातम्॥१८॥

गङ्गाधराद्रितनया-प्रिय शान्तमूर्ते
वेदान्त-वेद्य सकलेश्वर विश्वमूर्ते।
कूटस्थ नित्य निखिलागम-गीत-कीर्ते
वाराणसीपुरपते कुरु सुप्रभातम्॥१९॥

विश्वं समस्तमिदमद्य घनान्धकारे
मोहात्मके निपतितं जडतामुपेतम्।
भासा विभास्य परया तदमोघ-शक्ते
वाराणसीपुरपते कुरु सुप्रभातम्॥२०॥

सूनुः समस्त-जन-विघ्न-विनाश-दक्षो
भार्याऽन्नदान-निरता-ऽविरतं जनेभ्यः।
ख्यातः स्वयं च शिवकृत् सकलार्थि-भाजां
वाराणसीपुरपते कुरु सुप्रभातम्॥२१॥

ये नो नमन्ति न जपन्ति न चामनन्ति
नो वा लपन्ति विलपन्ति निवेदयन्ति।
तेषामबोध-शिशु-तुल्य-धियां नराणां
वाराणसीपुरपते कुरु सुप्रभातम्॥२२॥

श्रीकण्ठ कण्ठ-धृत-पन्नग नीलकण्ठ
सोत्कण्ठ-भक्त-निवहोपहितोप-कण्ठ।
भस्माङ्गराग-परिशोभित-सर्वदेह
वाराणसीपुरपते कुरु सुप्रभातम्॥२३॥

श्रीपार्वती-हृदय-वल्लभ पञ्च-वक्त्र
श्रीनील-कण्ठ नृ-कपाल-कलाप-माल।
श्रीविश्वनाथ मृदु-पङ्कज-मञ्जु-पाद
वाराणसीपुरपते कुरु सुप्रभातम्॥२४॥

दुग्ध-प्रवाह-कमनीय-तरङ्ग-भङ्गे
पुण्य-प्रवाह-परिपावित-भक्त-सङ्गे।
नित्यं तपस्वि-जन-सेवित-पाद-पद्मे
गङ्गे शरण्य-शिवदे कुरु सुप्रभातम्॥२५॥

सानन्दमानन्द-वने वसन्तं आनन्द-कन्दं हत-पाप-वृन्दम्।
वाराणसी-नाथमनाथ-नाथं श्रीविश्वनाथं शरणं प्रपद्ये॥२६॥

।। इति श्रीकाशीविश्वनाथसुप्रभातं सम्पूर्णम्।।

==============================================

बृहत्पाराशर होराशास्त्रम् के 19वें अध्याय में वर्णित अनेकयोगाध्यायः में ज्योतिष के सभी महत्वपूर्ण योगों का विस्तृत वर्णन किया गया है । जातक के जीवन में इन योगों का क्या असर होता है, इस बात का विस्तृत वर्णन हम कर रहे हैं । तो आइये जानें इस विडियो टुटोरियल में मृदंग योग एवं उसके फल के विषय में – मृदंग योग एवं उसके फल.

बृहत्पाराशर होराशास्त्रम् के 19वें अध्याय में वर्णित अनेकयोगाध्यायः में ज्योतिष के सभी महत्वपूर्ण योगों का विस्तृत वर्णन किया गया है । जातक के जीवन में इन योगों का क्या असर होता है, इस बात का विस्तृत वर्णन हम कर रहे हैं । तो आइये जानें इस विडियो टुटोरियल में शारदा योग एवं उसके फल के विषय में – शारदा योग एवं उसके फल .

बृहत्पाराशर होराशास्त्रम् के 19वें अध्याय में वर्णित अनेकयोगाध्यायः में ज्योतिष के सभी महत्वपूर्ण योगों का विस्तृत वर्णन किया गया है । जातक के जीवन में इन योगों का क्या असर होता है, इस बात का विस्तृत वर्णन हम कर रहे हैं । तो आइये जानें इस विडियो टुटोरियल में श्रीनाथ योग एवं उसके फल के विषय में – श्रीनाथ योग एवं उसके फल .

ज्योतिष के सभी पहलू पर विस्तृत समझाकर बताया गया बहुत सा हमारा विडियो हमारे YouTube के चैनल पर देखें । इस लिंक पर क्लिक करके हमारे सभी विडियोज को देख सकते हैं – Watch YouTube Video’s.

इस तरह की अन्य बहुत सारी जानकारियों, ज्योतिष के बहुत से लेख, टिप्स & ट्रिक्स पढने के लिये हमारे ब्लॉग एवं वेबसाइट पर जायें तथा हमारे फेसबुक पेज को अवश्य लाइक करें, प्लीज – My facebook Page.

वास्तु विजिटिंग के लिये तथा अपनी कुण्डली दिखाकर उचित सलाह लेने एवं अपनी कुण्डली बनवाने अथवा किसी विशिष्ट मनोकामना की पूर्ति के लिए संपर्क करें।।

किसी भी तरह के पूजा-पाठ, विधी-विधान, ग्रह दोष शान्ति आदि के लिए तथा बड़े से बड़े अनुष्ठान हेतु योग्य एवं विद्वान् ब्राह्मण हमारे यहाँ उपलब्ध हैं।।

सिलवासा ऑफिस:- बालाजी ज्योतिष केन्द्र, गायत्री मंदिर के सामने, मेन रोड़, मन्दिर फलिया, आमली, सिलवासा।।

सिलवासा ऑफिस में प्रतिदिन मिलने का समय:-
10:30 AM to 01:30 PM And 05:30 PM to 08:30 PM.

WhatsAap & Call: +91 – 8690 522 111.
E-Mail :: balajijyotish11@gmail.com 

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

error: Content is protected !!
Exit mobile version